उत्तराखंडः स्पीकर पर आरोपों को लेकर HC ने की केंद्र की खिंचाई
- भीमलाल आर्य के निलंबन न करने के आरोप पर पूछा
- राष्ट्रपति शासन लगने के बाद क्यों की शिकायत
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नैनीताल हाईकोर्ट ने उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष पर लगाए आरोप को लेकर केंद्र की जमकर खिंचाई की। केंद्र की तरफ से दावा किया गया था कि भाजपा विधायक भीम लाल आर्य को अयोग्य करार दिए जाने की शिकायत को स्पीकर ने लटकाए रखा, जबकि हकीकत में भीम लाल के खिलाफ शिकायत राष्ट्रपति शासन लागू करने के बाद की गई थी।
कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि राष्ट्रपति शासन लगाने के बाद शिकायत 5 अप्रैल को क्यों दी गई। हम सोच रहे थे कि स्पीकर ने दोहरे मापदंड क्यों अपनाए (कि कांग्रेस के नौ बागी विधायकों को निलंबित कर दिया, लेकिन भीम लाल पर फैसले को लंबित रखा। यह बहुत खतरनाक है। आप स्पीकर पर खतरनाक आरोप लगा रहे हैं।
क्या भारत की सरकार इस तरह काम करती है। आपको इस बारे में क्या कहना है। इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता क्योंकि राष्ट्रपति ने इसे (स्पीकर के आचरण को) भी राष्ट्रपति शासन की मंजूरी के लिए आधार माना है। एडिशनल सॉलिसिटर जनरल बृहस्पतिवार को इस मामले में केंद्र की ओर से अदालत में सफाई पेश करेंगे।
कोर्ट ने स्टिंग को लेकर रावत पर उठाए सवाल
स्टिंग ऑपरेशन को लेकर कोर्ट ने हरीश रावत पर भी सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि रावत के आचरण के देखते हुए अनुच्छेद 356 लागू करना क्यों गलत है।
इस पर सिंघवी ने रावत के स्टिंग ऑपरेशन को ब्लैकमेलिंग का तरीका बताते हुए हरियाणा के बूटा सिंह गवर्नमेंट का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि वहां 6 हफ्ते तक स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर ब्लैकमेलिंग का कार्य चलता रहा।
उन्होंने न्यायालय से कर्नाटक के एसआर बोम्मई केस का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां मुख्यमंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद फ्लोर टेस्ट का मौका दिया गया था।