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ये होंगे हरीश रावत की राह के रोड़े

Sat, 01 Feb 2014 06:58 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली, देहरादून
अमर उजाला, नई दिल्ली, देहरादून Updated Sat, 01 Feb 2014 06:58 PM IST
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harish rawat will face this problem
उत्तराखंड के नए मुख्यमंत्री की कमान संभालने जा रहे कांग्रेस नेता हरीश रावत अपनी नई जिम्मेदारी को लेकर उत्साहित हैं। वे स्वीकारते हैं कि बड़ी चुनौती है, लेकिन चुनौतियां तो हमेशा ही रहेंगी।
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इस चुनौती को किस तरह से ले रहे हैं, रावत ने इस सवाल के जवाब में अमर उजाला से कहा कि जीवन में चुनौतियां तो हमेशा ही रहेंगी।

न्याय तो मिला
उनसे मिलने आने वाले ज्यादातर प्रशंसक यह कहना नहीं भूलते थे कि चलो कम से कम 12 साल ही सही, न्याय तो मिला है।

उत्तराखंड राज्य बनने के बाद जब 2002 में पहली विधानसभा के चुनाव हुए तो माना जा रहा था कि रावत की ही ताजपोशी होगी, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने नारायण दत्त तिवारी को सत्ता सौंप दी। 2012 के चुनाव में भी अंतिम समय में विजय बहुगुणा बाजी मार ले गए।
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दौड़ में शामिल नेताओं को संतुष्ट करना

हरीश रावत के लिए सबसे पहली मुश्किल उनके बराबर से दौड़ में शामिल नेताओं को साथ लेकर चलने की है। विधायक में से मुख्यमंत्री बनाने की बात करने वाले नेताओं से उनका पहला मुकाबला विधानमंडल दल की बैठक में होना है।
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नए मुख्यमंत्री को कुर्सी पर बैठाने के लिए एक स्क्रिप्ट कांग्रेस नेतृत्व की ओर से लिखी गई है। जबकि दिल्ली से लेकर देहरादून तक पर्दे के पीछे कुछ पात्र अलग राजनीतिक रिहर्सल में जुटे हैं।

अगर उन्हें मंच पर मौका मिलता है तो शायद लिखी गई स्क्रिप्ट से अलग नाटक देखने को मिलेगा।
 
मंत्रिमंडल का गठन
हरीश रावत को मंत्रिमंडल के गठन में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। अगर बहुगुणा मंत्रिमंडल में शामिल सभी मंत्रियों को साथ लेकर चलते हैं तो उनके समर्थक विधायकों में सही मैसेज नहीं जाएगा।

वहीं मंत्रिमंडल में शामिल भारी-भरकम नामों की छंटनी करना भी मुश्किलों भरा काम होगा। कम से कम इंदिरा ह्दयेश, हरक सिंह रावत और प्रीतम सिंह को लेकर केंद्रीय नेतृत्व भी गंभीर है। उन्हें न सिर्फ कैबिनेट में जगह देनी होगी बल्कि विभागों को लेकर भी संतुष्ट करना होगा।

हरीश रावत को इन नेताओं को आगे भी साथ लेकर चलना मजबूरी होगी। ताकि शेष तीन साल का समय आपसी खींचतान के बजाय प्रदेश के विकास के लिए मिल सकें।

हाथ को चाहिए सहयोगियों का साथ
प्रदेश में कांग्रेस की सरकार सात सहयोगी विधायकों के सहारे चल रही है। कांग्रेस का एक धड़ा यह मानकर चल रहा था कि इस बार कैबिनेट में सहयोगियों की संख्या कम होगी और कांग्रेस को एक या दो नए मंत्री मिलेंगे। जबकि सहयोगी दलों ने एक एकजुटता के साथ सभी सातों विधायकों को मंत्री पद या दर्जाधारी बनाने की नई मांग रखी है।


सहयोगी दलों में बीएसपी के तीन, उक्रांद का एक और तीन निर्दलीय विधायक हैं। साफ है कि उन्हें कहीं न कहीं नम्बर गेम में अपने में से किसी को कम करने का आभास हो रहा था। ऐसा इसलिए क्योंकि वर्तमान कांग्रेस सदस्यों की संख्या 33 हैं और उन्हें बहुमत सिद्घ करने केलिए कुल 36 सदस्य ही चाहिए।

सहयोगियों की एकजुटता और मांग यूं ही बनी रही तो नए मुख्यमंत्री को पहले उन्हें मनाना होगा।
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