हरीश सरकार हुई बहाल, मिल गया गाड़ी घोड़ा और प्रोटोकॉल
- उच्च न्यायालय के आदेश के क्रम में फिर मुख्यमंत्री बने हरीश रावत
- राज्य में लागू हुआ 18 मार्च को पारित हुआ बजट
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उत्तराखंड में यह अपनी तरह का पहला वाकया है, जब किसी सरकार को हटाने के बाद उच्च न्यायालय ने बहाल किया हो। फिलहाल, न्यायालय के आदेश के क्रम में हरीश सरकार फिर अस्तित्व में आ गई है।
मुख्यमंत्री और मंत्रीगणों की तमाम सुविधाएं बहाल कर दी गई हैं। साथ ही 18 मार्च को विधानसभा में पास हुआ बजट राज्य में स्वत: ही लागू हो गया है।
उच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार राज्य में 18 मार्च की स्थिति बहाल हो गई है। हरीश रावत का मंत्रिमंडल फिर वजूद में आ गया है। संविधान में प्रदत्त सारी शक्तियां और अधिकार मिल गए हैं और तत्काल रात में ही कैबिनेट की बैठक बुलाना यह साबित करता है कि निर्वाचित सरकार वजूद में है। मुख्यमंत्री हरीश रावत अपने मंत्रिमंडल के साथ कार्यरत हो गए हैं।
मुख्यमंत्री और मंत्रियों को मिले वाहन, स्टाफ
मुख्यमंत्री और मंत्रियों को वाहन, स्टाफ आदि से लेकर सभी सुविधाएं उपलब्ध करा दी गई हैं। देर शाम तक सरकार सक्रिय भी हो गई थी। यह पहली बार हुआ कि राज्य में कोई मुख्यमंत्री हटने के बाद न्यायालय के आदेश पर फिर से सत्तासीन हुआ हो।
इसके अलावा 18 मार्च को सदन में रखे हुए बजट को पारित मानते हुए लागू कर दिया गया है। मुख्य सचिव शत्रुघ्न सिंह ने बजट लागू होने की पुष्टि की।
हालांकि, राज्यपाल शासन में राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद पारित कराया गया 13 हजार करोड़ का लेखानुदान भी स्वत: खत्म हो गया है और एक महीने में लेखानुदान से जो भी खर्च हुआ, उसे बजट में समायोजित करना होगा।
महामहिम की सलाहकार परिषद का वजूद समाप्त
मुख्यमंत्री हरीश सरकार के बहाल होने के साथ ही राज्यपाल डॉ. कृष्णकांत पाल की सलाहकार परिषद का वजूद समाप्त हो गया है। इस परिषद को वही अधिकार प्राप्त थे, जो कि निर्वाचित सरकार में मंत्री परिषद को होते हैं।
हालांकि राजभवन की तरफ से अभी ऐसा कोई आदेश नहीं हुआ है, लेकिन फिलहाल पुरानी व्यवस्था की बहाली के साथ यह सब होना स्वाभाविक है। हालांकि राज्यपाल के दो एडवाइजर अभी रहेंगे लेकिन उन्हें मंत्री के अधिकार नहीं होंगे।
सियासी संकटों के बीच पीडीएफ रहा हरीश के साथ
सूबे में पिछले एक माह से जारी सियासी संकट के बीच राजनीतिक गलियारों में जहां कई बदलाव देखने को मिले। कांग्रेस, भाजपा समेत तमाम राजनीतिक दलों के बीच बयानबाजी का दौर जारी रहा।
पार्टी नेताओं के बीच आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर चला, वहीं तमाम राजनीतिक झंझावात के बीच पीडीएफ मंत्रियों, विधायकों ने एकजुटता ने नई मिसाल पेश की है।
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के दौरान पीडीएफ मंत्रियों, विधायकों ने सभी कयासों को दरकिनार कर न सिर्फ यह संदेश देने में सफल रहे कि वह अंतत: कांग्रेस के साथ है बल्कि यह संदेश देने में सफल रहे कि किसी भी प्रकार के प्रलोभनों से भी उन्हें डिगाया नहीं जा सकता है।