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एस्मा की सख्ती के बीच हड़तालियों को मनाने पर जोर
अजित सिंह राठी / अमर उजाला, देहरादून
Updated Tue, 04 Nov 2014 11:24 AM IST
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एस्मा की सख्ती के बीच सोमवार को उत्तराखंड के हड़ताली कर्मियों को मनाने का दौर भी जारी है। सोमवार को वित्त मंत्री इंदिरा हृदयेश और कृषि मंत्री हरक सिंह ने कर्मचारियों से करीब एक घंटे तक बातचीत की।
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नायब तहसीलदार पद पर पदोन्नति का पेच
दूसरे दौर की बातचीत मंगलवार को होगी। कर्मचारियों की हड़ताल टूटती है तो सरकार कम से कम कर्मचारियों के वेतन को बचाने की कोशिश कर सकती है। सोमवार को हई बातचीत में भी नायब तहसीलदार पद पर पदोन्नति का पेच फंस गया।
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मंगलवार को अब दोनों मंत्री अन्य संगठनों से बातचीत करने के बाद हड़ताली कर्मचारियों से बातचीत करेंगे। कलक्ट्रेट/ मिनिस्ट्रीयल कर्मचारी दरअसल नायब तहसीलदार पद पर अपने संवर्ग से दस प्रतिशत पदोन्नति का कोटा मांग रहे हैं।
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दूसरी ओर पर्वतीय पटवारी संघ का साफ ऐलान है कि सरकार ने अगर मिनिस्ट्रीयल कर्मचारियों की यह मांग मानी तो पर्वतीय पटवारी हड़ताल पर चले जाएंगे। इनका कहना है कि नायब तहसीलदार पर पर्वतीय पटवारियों का कोटा पहले ही सरकार कम कर चुकी है।
सोमवार को वित्त मंत्री इंदिरा हृदयेश, कृषि मंत्री हरक सिंह, अपर मुख्य सचिव राकेश शर्मा सहित अन्य अधिकारियों की मौजूदगी में हुई बैठक में यही पेच फंस गया। संवर्ग के पुनर्गठन के लिए बीस दिन का समय मांगा गया।
पर पदोन्नति के मसले पर अब मंगलवार को पर्वतीय पटवारी संघ और संगठनों से दोनों मंत्रियों की बातचीत होगी। इसके बाद फिर हड़ताली कर्मचारियों से बातचीत कर समस्या समाधान की कोशिश की जाएगी।
पहले ही झटके में लड़खड़ाए कदम
कठोर कार्रवाई करने से पहले ही सरकार के कदम लड़खड़ाए हुए दिखाई पड़ रहे हैं। इसे मजबूरी ही कहा जाएगा कि उच्च न्यायालय के आदेश के पांच दिन बाद एस्मा को आधे अधूरे तौर पर लागू करना इसका ताजा उदाहरण है।
एस्मा का कोई प्रथम चरण नहीं होता। एस्मा हमेशा कार्रवाई के साथ लागू होती है। हड़ताल के महीनों बाद भी मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के कथनों में मध्यमार्ग अपनाने का अहसास ज्यादा है। वैसे भी यह फैसला सरकार का एसिड टेस्ट साबित होगा। क्योंकि पांच साल पहले भी सरकार एस्मा लगाकर अपना हश्र देख चुकी है।
अमूमन तौर पर एस्मा के लागू होने का प्रभाव दूसरी तरह से देखा जाता है। लेकिन राज्य में जो एस्मा लागू की गई है उसे देखकर यही लगता है कि अभी भी सरकार गुंजाइश छोड़ने के लिए बेबस है। वर्ना प्रथम चरण में नो वर्क नो पे का कोई मतलब नहीं है।
क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय की गाइडलाइन और राज्य कैबिनेट का फैसला इसकेलिए काफी है। दूसरी तरफ शासनादेश जारी करने केबाद भी वरिष्ठ मंत्रियों द्वारा हड़ताली कर्मियों के साथ बातचीत का दौर जारी रखना यही दर्शाता है कि सरकार ने एस्मा का कदम मजबूरी में उठाया है।
अब देखना यही है कि इसका नतीजा क्या निकलता है। एस्मा लागू कर दिया गया और गृह विभाग का कोई अलर्ट भी जारी नहीं हुआ। और, यदि इस एस्मा का भी हश्र पांच साल पहले जैसा ही हुआ तो फिर सरकार को संभलने में काफी वक्त लगेगा।