देवता भी चुनते हैं अपनी पंसद का स्थान
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शुक्रवार को मां नंदा अपने अंतिम बस्ती पड़ाव वाण में ठहरी। यहां पर भक्तों का रैला उमड़ पड़ा था। वाण गांव दूधिया रोशनी में नहा रहा था और नंदा के जयकारे और शंख की ध्वनि माहौल को भक्तिमय बना रही थी।
ऐसे में लाता की भगवती ने इस शोर-शराबे से दूर रहना ठीक समझा और वह गांव से डेढ़ किमी ऊपर अपने धर्म भाई लाटू के मंदिर में आ गई। देवी ने मंदिर में ही रात्रि विश्राम किया।
देवताओं की भी अपनी पसंद होती है। यह वाण में तब देखने को मिला, जब लाता की भगवती यहां पहुंची। भगवती ने अपने ठहरने के लिए स्थान चुना। दो बार वह गांव में घूमी और दो अलग-अलग स्थानों पर कुछ देर के लिए ठहरी भी लेकिन उसे यह स्थान पसंद नहीं आए।
यहां भक्तों की भीड़ और कीर्तन भजनों का शोर चरम पर था। भगवती यहां से उठ गई और रात को अपने भाई लाटू के मंदिर में आ गई। देवी ने भाई के निवास पर ही रात्रि विश्राम किया।
लोगों का कहना था कि भगवती को जो पसंद नहीं होता, वह उसे स्वीकार नहीं करती। वह अपनी इच्छा और पसंद से ही अपने बैठने और ठहरने के स्थान का चयन करती है। लाता से राजजात में 88 वर्ष बाद भगवती की डोली शामिल हुई है।
मानव ही नहीं, देवता भी परंपराओं में बंधे
ऊंचे हिमालय की ओर यात्रा के बढ़ने के साथ ही अब नंदा की कई और कहानियां इन खूबसूरत वादियों में तैर रही हैं। लाता की भगवती नंदा इस बार बेदनी से ही लौट जाएगी। बीती रात वाण में नंदा ने लाटू से आगे जाने की आज्ञा मांगी थी। लाटू ने देवी को बेदनी तक जाने के लिए कहा। लाटू की भगवती बेदनी से सुतोल के रास्ते घाट होते हुए लाता लौट जाएगी।
हिमालय में देव आज्ञा सर्वोपरि है। यहां मानव ही नहीं, देवता भी परंपराओं से बंधे हुए हैं। जिस लाता की भगवती नंदा का राज पूरी नीति घाटी पर है, वही भगवती अपने धर्म भाई लाटू का कहना मानकर बेदनी तक जा रही है।
गांव के लोग वाण से ही वापसी के पक्ष में थे, पर रात को भगवती ने लाटू से बात की, तो लाता की भगवती के साथ अब गांव के करीब ढाई सौ लोग बेदनी तक जा रहे हैं।