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Engineer's Day: सिलक्यारा ने दिखाया...मशीनों से बहुत आगे है मानव तकनीक, चंद घंटों में रच दिया था इतिहास

Sun, 15 Sep 2024 09:44 PM IST
अलका त्यागी नीरज मिश्रा, अमर उजाला, देहरादून
नीरज मिश्रा, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Sun, 15 Sep 2024 09:44 PM IST
सार

उत्तरकाशी में यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर सिलक्यारा से डंडालगांव तक निर्माणाधीन सुरंग के अंदर भूस्खलन होने से 60 मीटर हिस्सा टूट गया था। मलबा आने के कारण 41 मजदूर सुरंग के अंदर फंस गए थे। जब मशीनें भी फेल हो गईं तो इंसानों की तकनीक ने इतिहास रचा।

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Engineer's Day 2024 Silkyara Tunnel shown human technology is far ahead of machines
सिलक्यारा सुरंग - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मानव तकनीक आज भी मशीनों से बहुत आगे है। जब किसी भी आपदा में मशीनें फेल होने लगती हैं, तो मानव तकनीक काम आती है। उत्तरकाशी के सिलक्यारा सुरंग हादसे ने गत वर्ष नवंबर में ऐसा ही उदाहरण प्रस्तुत किया है, जिसने मानव तकनीक की श्रेष्ठता को साबित कर दिया है। प्राकृतिक संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के सहारे कुछ लोगों ने ऐसा कर दिखाया, जिसे अत्याधुनिक मशीनें भी पूरा करने में असमर्थ रहीं। विदेशी इंजीनियरिंग भी कुछ खास नहीं कर पा रही थी।

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उत्तरकाशी में यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर सिलक्यारा से डंडालगांव तक निर्माणाधीन सुरंग के अंदर भूस्खलन होने से 60 मीटर हिस्सा टूट गया था। मलबा आने के कारण 41 मजदूर सुरंग के अंदर फंस गए थे। इन मजदूरों को निकालने के लिए निर्माण एजेंसी के साथ पुलिस, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, आईटीबीपी, बीआरओ की टीमें लगीं।
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 प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री और राज्यपाल तक इसकी जानकारी लेते रहे। सरकार ने विदेशी इंजीनियर बुलाए, अमेरिकी ऑगर मशीन लाई गई। लेकिन कोई खास फायदा नहीं हुआ। एक-एक दिन सुरंग के अंदर फंसे मजदूरों के लिए तो बाहर सरकार, परिजन और लोगों के लिए भारी पड़ रहा था। 15वें दिन जब सभी व्यवस्थाएं फेल होती नजर आईं, तो दिल्ली से रैट माइनर्स की टीम (सुरंग खोदने वाले) को बुलाया गया। 12 सदस्यीय टीम ने हाथों के दम पर पहाड़ में छेद कर दिया और सभी मजदूरों को 17वें दिन सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।
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विवादित है तकनीक

रैट होल माइनिंग एक ऐसी पद्धति है, जिसमें कोयला निकालने वाले मजदूर संकरे बिलों में जाते हैं। हालांकि यह पद्धति विवादित और गैरकानूनी है। यह प्रथा पूर्वोत्तर के राज्य मेघालय में प्रचलित थी।

कैसे हुई खुदाई

इस तकनीक में एक आदमी खुदाई और दूसरा मलबा इकट्ठा कर रहा था। तीसरा व्यक्ति इकट्ठे किए गए मलबे को बाहर निकालने के लिए उसे ट्रॉली पर रखता था। इसके बाद बाहर खड़े लोग ट्रॉली को बाहर खींच लेते थे। विशेषज्ञ मैन्युअली मलबे को हटाने के लिए 800 मिमी पाइप के अंदर काम कर रहे थे। इस दौरान एक फावड़ा और अन्य विशेष उपकरण का भी उपयोग किया गया।
 

सिलक्यारा हादसे के बाद पहाड़ में सुरक्षात्मक इंजीनियरिंग

देश-दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचने वाले सिलक्यारा सुरंग हादसे ने पहाड़ में विकास कार्यों की इंजीनियरिंग को बदलकर रख दिया है। इस हादसे के बाद जहां सिलक्यारा सुरंग निर्माण में खास सावधानी बरती जा रही है। वहीं, विशेषज्ञ समिति के सुझावों का भी खास ख्याल रखा जा रहा है। इसके साथ राज्य सरकार ने भी एसओपी तैयार कर पहाड़ में इस तरह के हादसे को रोकने के लिए कदम उठाए हैं। गत वर्ष चारधाम सड़क परियोजना में यमुनोत्री हाईवे पर निर्माणाधीन साढ़े चार किमी लंबी सिलक्यारा-पोलगांव सुरंग में भूस्खलन के कारण 41 श्रमिक सुरंग के अंदर फंस गए थे, जिन्हें 17 दिन चले रेस्क्यू ऑपरेशन के बादनिकाला गया था। हादसे के करीब 9 माह बाद भी सुरंग के सिलक्यारा वाले मुहाने के पास गिरा मलबा पूरी तरह नहीं हट पाया है। हालांकि मलबा हटाने के लिए इसी माह मलबे में बनाई जा रही तीन मीटर चौड़ी पहली ड्रिफ्ट टनल आरपार हुई है। इस हादसे के बाद राज्य सरकार के आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने भी निर्माण कार्यों में सावधानी का लेकर एसओपी तैयार की है।  

विशेषज्ञ समिति के सुझाव

सिलक्यारा हादसे के बाद केंद्र ने एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। समिति ने रिपोर्ट में इस तरह की सुरंग में रियल टाइम मॉनिटरिंग करने, कंक्रीट ह्यूम पाइप की निकासी या सर्विस सुरंग बनाने, श्रमिकों की सुरक्षा को्र अलार्म सिस्टम विकसित करने, लंबी सुरंगों के लिए कड़ी तकनीकी जांच करने, सुरंग केंद्र की स्थापना करने, हिमालयी क्षेत्र में परियोजना निर्माण के लिए विशेष रूप से तैयार एक सहयोगी भूवैज्ञानिक मंच बनाने की सिफारिश की है।

सिलक्यारा सुरंग हादसे के बाद विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के अनुसार ही सावधानी के साथ सुरंग निर्माण कार्य किया जा रहा है। विशेषज्ञों की निगरानी में ही सुरंग की खोदाई के साथ ड्रिफ्ट टनल के कार्य को अंजाम दिया जा रहा है।
 -अंशु मनीष खलको, निदेशक एनएचआईडीसीएल

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