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अस्पतालों में इमरजेंसी सेवा का सच बेहद खतरनाक

Wed, 19 Nov 2014 03:14 PM IST
मनीष चंद्र भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून
मनीष चंद्र भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून Updated Wed, 19 Nov 2014 03:14 PM IST
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emergency service in hospital.

देहरादून के सरकारी और निजी अस्पतालों में यूं तो 24 घंटे इमरजेंसी सेवा देने का दावा किया जाता है, लेकिन इसके पीछे की हकीकत बेहद खतरनाक है।

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सरकारी हो या निजी अस्पताल, रात के समय कहीं भी विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं मिलते। मरीज की जान चली जाए, लेकिन डाक्टर साहब नींद से जागने के बाद सुबह तय समय पर ही अस्पताल पहुंचते हैं।
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सांस लेने में दिक्कत पर 15 नवंबर की रात दून अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में पहुंचे करनपुर निवासी मरीज को मेडिकल अफसर ने दर्द का इंजेक्शन और ग्लूकोज दे दिया। परिजनों बीमारी से संबंधित डॉक्टर को बुलाने की मांग की तो मेडिकल अफसर ने उन्हें सुबह तक इंतजार करने की हिदायत दी।
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मजबूरन परिजन मरीज को दूसरे अस्पताल ले गए, लेकिन वहां भी विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं मिले। इसके बाद उन्हें तीसरे अस्पताल ले जाया गया लेकिन वहां भी वही हाल रहा। इलाज में देरी की वजह से मरीज की तबीयत ज्यादा खराब हो गई जिससे उनकी मौत हो गई।

इंतजार करने की नसीहत और हिदायत

emergency service in hospital.

सड़क दुर्घटना में घायल विकासनगर निवासी युवक को परिजन 17 नवंबर को बल्लुपुर स्थित एक निजी अस्पताल में ले गए। पहले तो परिजनों से एडवांस में फीस जमा करने के लिए कहा गया। पैसा नहीं जमा करने पर मरीज का इलाज ही नहीं शुरू किया।

किसी तरह मरीज को भर्ती किया तो जांच के नाम पर परेशान करने लगे। मरीज का सीटी स्कैन कराया, लेकिन बताया गया कि ऑपरेशन सुबह सर्जन के आने पर हो पाएगा। सीटी स्कैन के लिए परिजनों से दोगुने दाम लिए गए। इलाज से असंतुष्ट परिजन युवक को दूसरे दिन दूसरे अस्पताल ले गए।

सच तो यह है कि इमरजेंसी के नाम पर अस्पताल प्रबंधन किसी भी डॉक्टर की तैनाती रात में कर देते हैं। ऐसे डॉक्टर मरहमपट्टी तो ठीक, लेकिन गंभीर मरीज अस्पताल में आने पर इंजेक्शन और ग्लूकोज चढ़ाने के अलावा कुछ नहीं कर पाते।

विशेषज्ञ डॉक्टर को बुलाने की बात आते ही सुबह का इंतजार करने की नसीहत और हिदायत दी जाती है। ऐसे में परिजन मरीज को एक से दूसरे अस्पताल लेकर भटकते हैं।

किसी अस्पताल ने मरीज को भर्ती कर भी लिया तो उसका इलाज सुबह ही शुरू हो पाता है। हां, तमाम जांच के नाम अनाप शनाप बिल बढ़ा दिया जाता है। ऐसे में परिजन यदि सुबह किसी दूसरे अस्पताल में मरीज को ले जाना भी चाहें तो वे बिल देखकर सुनकर मजबूर हो जाते हैं।

वीआईपी के लिए तुरंत हाजिर

emergency service in hospital.

सरकारी अस्पतालों में भले ही आम आदमी की सुनवाई नहीं होती, लेकिन किसी वीआईपी का आदेश हो तो नजारा उलटा होता है।

बीते रविवार को कालसी में हुए सड़क हादसे के घायलों को दून अस्पताल लाया गया तो न्यूरो सर्जन, दो फिजिशियन और एक आर्थोपेडिक सर्जन रात एक बजे तक इमरजेंसी ड्यूटी में तैनात रहे। यह सेवा भाव नहीं, बल्कि एक कैबिनेट मंत्री और जिला प्रशासन के निर्देश का नतीजा था।

रात में आते हैं औसतन 35 मरीज
दून अस्पताल की इमरजेंसी में रात को रोजाना औसतन 15 मरीज पहुंचते हैं। इनमें से अधिकतर सिर की चोट और सांस के मरीज होते हैं। जबकि शहर के निजी अस्पतालों में रोजाना औसतन 20 मरीज पहुंचते हैं। इनमें अक्सर हादसे में घायल मरीजों की संख्या अधिक होती है।

जांच को भी सुबह का इंतजार
रात के समय गंभीर रूप से बीमार या हादसे में घायल मरीजों की जरूरी जांच भी नहीं हो पाती। सरकारी अस्पतालों में सीटी-स्कैन और अल्ट्रासाउंड तो दूर एक्स-रे तक नहीं हो पाता है।

खून की जांच के लिए मरीज को सुबह होने का इंतजार करना पड़ता है। वहीं, निजी अस्पताल या लैब संचालक रात को किसी भी जांच के लिए दोगुनी फीस वसूलते हैं।

ऑन कॉल का नियम

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रात के वक्त अगर अस्पताल में पहले से भर्ती या इमरजेंसी में पहुंचे मरीज को अगर विशेषज्ञ डॉक्टर की जरूरत पड़ती है तो वहां मौजूद स्टाफ को डॉक्टर को बुलाना चाहिए। इमरजेंसी में तैनात डॉक्टर को अगर लगता है तो डॉक्टर के आने तक वह मरीज को प्राथमिक उपचार देंगे।

ऑन कॉल विशेषज्ञ डॉक्टर को अस्पताल पहुंचना ही होगा। रात के वक्त अलग-अलग बीमारी के कम से कम एक डॉक्टर को आन काल ड्यूटी के लिए अलर्ट रहने को अस्पताल प्रबंधन द्वारा बता दिया जाता है।

मरीज की स्थिति देखकर ईएमओ को अगर लगता है तो विशेषज्ञ डॉक्टर को बुला सकता है। ऑनकाल विशेषज्ञ डॉक्टर को अस्पताल पहुंचना ही होगा। अगर नियम का उल्लंघन हो रहा है तो स्पष्ट निर्देश जाएंगे। शिकायत पर कार्रवाई भी की जाएगी।
- डॉ. आरएस असवाल, निदेशक, दून ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल

इमरजेंसी में 24 घंटे कम से कम एक डॉक्टर होना जरूरी है। अगर किसी मरीज का इलाज ईएमओ नहीं कर पा रहा है तो विशेषज्ञ डॉक्टर को अस्पताल पहुंचना चाहिए। एसोसिएशन के इस बारे में सख्त निर्देश हैं।
- डॉ. कुलदीप दत्ता, अध्यक्ष इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, देहरादून

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