तो उत्तराखंड में भी भूंकप से हो सकती है तबाही
भगवान न करे ऐसा हो, लेकिन अगर रिक्टर पैमाने पर 6.0 से अधिक तीव्रता का भूकंप आता है तो दून में तबाही हो सकती है।
विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि दून जोन-4 में है। इसमें 6.0, 7.0, 8.0 या इससे अधिक के भूकंप की आशंका रहेगी। इस जोन में निर्माण भारतीय मानक ब्यूरो यानी बीआईएस कोडिंग के मुताबिक होना चाहिए।
कई नए प्रतिष्ठित भवन निर्माता इन कोड का पालन कर रहे हैं, लेकिन 80 फीसदी से अधिक इसकी अनदेखी कर रहे हैं। भूकंपरोधी तकनीक तक का इस्तेमाल निर्माण में नहीं किया जा रहा। ऐसे में आफत कभी भी दस्तक दे सकती है।
वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ भूकंप विशेषज्ञ डॉ. सुशील कुमार के मुताबिक इस जोन में भू-संरचना के आधार पर भूकंप के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण मानकों के अनुसार होना चाहिए।
इस संस्थान और आईआईटी के विज्ञानियों की कुछ साल पहले की एक रिपोर्ट में देहरादून शहर का भूकंपीय दृष्टि से विश्लेषण किया गया था। रिपोर्ट में मिट्टी की संरचना के आधार पर शहर के कुछ इलाकों को भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील बताया गया था।
मसलन, राजपुर, मालसी आदि क्षेत्र। लेकिन राजपुर रोड, सहस्त्रधारा रोड जैसे संवेदनशील इलाकों में इस वक्त अपार्टमेंट निर्माण की होड़ है। कई तो अवैध रूप से भी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं। ऐसे में बड़ी तीव्रता वाला भूकंप बडे़ नुकसान का सबब बन सकता है।
हर वर्ग के लिए मानक अलग
बीआईएस ने अलग-अलग वर्गों के लिए अलग मानक तय किए हैं। मसलन, रिहायशी इमारतों के लिए अलग, पुलों, रिटेनिंग वाल के लिए अलग, औद्योगिक निर्माण के लिए अलग, बांध निर्माण के लिए अलग।
जिम्मेदारों को इन मानकों को देखकर निर्माण को अनापत्ति प्रमाण-पत्र यानी एनओसी देनी होती है, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा।
इन इलाकों का हुआ था अध्ययन
शहर का उत्तरी हिस्सा- राजपुर, मालसी, अनारवाला आदि
फ्रीक्वेंसी बैंड-4-8 हर्ट्ज
केंद्रीय क्षेत्र- टपकेश्वर, कौलागढ़, हाथीबड़कला, बल्लूपुर आदि
फ्रीक्वेंसी बैंड-2-4 हर्ट्ज
शहर का दक्षिणी क्षेत्र- बडोवाला, पटेलनगर, रेस्टकैंप, डालनवाला, रायपुर, अजबपुर आदि
फ्रीक्वेंसी बैंड-2.5 से 3 हर्ट्ज
आफ्टरशॉक से चौड़ी होंगी दरारें
जैसी आशंका तकरीबन सभी विशेषज्ञ जता रहे हैं, ठीक वैसा ही हो रहा है। नॉर्दर्न बेल्ट में स्थित नेपाल में शनिवार को आए भूकंप के तगड़े झटके, जिसकी रिक्टर पैमाने पर तीव्रता 7.9 आंकी गई थी के बाद लगातार आफ्टरशॉक आ रहे हैं।
नेपाल में रविवार दोपहर 12 बजकर 43 मिनट पर लगा आफ्टरशॉक 35वां था। इसकी तीव्रता रिक्टर स्केल पर 6.7 आंकी गई है। इस तीव्रता का भूकंप 90 के दशक में उत्तराखंड के उत्तरकाशी में विनाश लीला दिखा चुका है।
आज रविवार वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थान में प्रयोगशाला के नवीनीकरण का कार्य चल रहा है, लिहाजा उस वक्त मैं प्रयोगशाला में ही था। साथ ही अन्य सहयोगी भी थे। मैंने तो यह झटका महसूस किया ही, अन्य सहयोगियों ने भी कंपन महसूस किया। माना जा सकता है कि इसके अलावा जो भी व्यक्ति नान-मूवमेंट की स्थिति में रहा होगा, उसने यह झटका महसूस किया होगा।
दिक्कत यह है कि भूकंप के झटके से जहां-जहां दरारें आई होंगी, आफ्टरशॉक उन दरारों को और चौड़ा करने का कार्य करेंगे। इससे आस-पास के क्षेत्र के लिए और भी खतरा पैदा होगा। प्रकृति की विनाश लीला पर काफी कार्य भारतीय भू सर्वेक्षण ने भी किया है।
वह भी इस पर नजर रख रहा होगा। वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थान ब्राड बैंड और सीस्मोग्राफ के जरिए रियल टाइम मानिटरिंग कर रहा है। लेकिन भूकंप का पूर्वानुमान किया जा सकना अब भी संभव नहीं हो पाया है। कई शहरों का सीस्मिक एनालिसिस हो चुका है।
जो बताता है कि भूकंप की दृष्टि से वहां कौन सा क्षेत्र संवेदनशील हैं। इन क्षेत्रों में निर्माण के लिए खास सावधानी रखी जानी चाहिए थी। अब भी चेत जाने का वक्त है। लोगों को भूकंप से बचने के लिए बाकायदा ट्रेनिंग कराए जाने की भी जरूरत है, ताकि वह खुद तो सीखें ही, भावी पीढ़ी को भी इस विभीषिका के असर से निपटने के लिए तैयार कर सकें।
- डॉ. सुशील कुमार, वरिष्ठ भूकंप वैज्ञानिक, वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थान, देहरादून