गुनाहगार होने के बावजूद छूट गए पुलिस वाले
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नैनीताल हाईकोर्ट ने 3 अक्टूबर 1994 को देहरादून के जोगीवाला में हुए गोलीकांड मामले में तीनों पुलिस कमिर्यों अनिल सिंह मनराल, भूपाल सिंह और रमेश चौधरी को साक्ष्यों के अभाव में दोषमुक्त करार दिया है। न्यायमूर्ति सर्वेश कुमार गुप्ता की एकलपीठ के समक्ष गुरुवार को मामले की सुनवाई हुई।
अनिल सिंह मनराल और अन्य ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर एडिशनल सेशन जज सीबीआई देहरादून की ओर से 18 नवंबर 2003 को पारित आदेश को चुनौती दी थी जिसमें तीनों को देहरादून में गोलीकांड में दोषी करार देते हुए सजा सुनाई गई थी।
मामले के अनुसार 3 अक्तूबर 1994 को देहरादून के जोगीवाला में मुज्जफरनगर में महिलाओं के साथ बलात्कार के विरोध में लोगों की ओर से प्रदर्शन किया जा रहा था। इस दौरान 27 वर्षीय दीपक वालिया की गोली लगने से मौत हो गई थी। इसकी एफआईआर मृतक दीपक के भाई ने लिखाई थी।
इसमें कहा गया था कि तत्कालीन एसआई अनिल मनराल, एसआई रमेश चौधरी और कांस्टेबल भोपाल सिंह ने गोली चलाई थी। इस प्रकरण में सीबीआई ने जांच की। 1996 में तीनों को आरोपी बनाते हुए सीबीआई ने इनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी।
18 नवंबर 2003 को एडिशनल सेशन जज सीबीआई देहरादून ने तीनों को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी। इस सजा को तीनों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एकलपीठ ने साक्ष्य के अभाव में तीनों को दोषमुक्त करार दिया।
अदालती फैसले से शहीद दीपक के परिजन हैरान
बद्रीपुर निवासी राज्य आंदोलनकारी शहीद दीपक वालिया के पिता 88 वर्षीय ओमप्रकाश वालिया पिछले दिनों बाएं पैर में चोट लगने से कराह रहे हैं। ऑपरेशन के बाद वे बिस्तर से उठने की स्थिति में नहीं हैं। बेटे के हत्या आरोपियों के बरी होने की खबर सुनकर कहते हैं कि सब साफ था, फिर भी इंसाफ नहीं मिला।
हत्यारोपियों को कैसे बरी कर दिया गया समझ में नहीं आ रहा है। हत्या आरोपियों के बरी होने की खबर सुनकर शहीद दीपक का परिवार सन्न है। शहीद के पिता ओमप्रकाश वालिया तीन अगस्त को घर पर गिर गए थे। उनका बायां कूल्हा टूट गया है। चोट लगने बाद एक सप्ताह तक वे अस्पताल में भर्ती रहे।
बिस्तर पर लेटे-लेटे ही वे बताते हैं कि तीन अक्तूबर 1994 की सुबह वह ऋषिकेश में थे। उस दिन उनके पांच बच्चों में सबसे छोटे दीपक की पुलिस वालों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। गोली दीपक के सिर में मारी गई थी जोकि आरपार हो गई थी। दून में उस दिन राजेश रावत और उनका बेटा दीपक शहीद हुए थे।
शहीद दीपक के बड़े भाई राजेश कहते हैं कि हत्याआरोपियों का बरी होना सीबीआई की विफलता है। राज्य सरकार ने भी मामले की सही पैरवी नहीं की।
बेटे की मौत के सदमे में मर गई मां
राजेश कहते हैं कि सरकारें शहीदों के सपनों को साकार करने के दावे करती हैं, लेकिन हकीकत में उनका इससे कोई लेनादेना नहीं होता है। राजेश का कहना है कि प्रदेश सरकार मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाए। यदि सरकार अपील नहीं करती है तो हम सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।
राजेश कहते हैं कि निचली अदालत के फैसले के बाद उम्मीद जगी थी कि हाईकोर्ट से सजा बरकरार रहेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। शहीद दीपक के बड़े भाई सुनील बताते हैं कि 20 साल बाद इस तरह के फैसले की उम्मीद नहीं थी। बहन रेनू तलवार, भाई प्रदीप वालिया भी फैसले से हैरान हैं।
शहीद दीपक के बड़े भाई राजेश बताते हैं कि भाई की मौत के बाद से मां इंद्रिरावती सदमे में आ गई थी। दीपक मां की सबसे अधिक सेवा करता था। बेटे की मौत के बाद सदमे में जाने की वजह से मां बीमार रहने लगीं और वर्ष 2004 में उनकी मौत हो गई।
शहीद का बोर्ड परिजनों ने लगवाया
इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि जोगीवाला चौक पर शहीद के नाम का बोर्ड परिजनों ने लगवाया है। शहीद के परिजनों के लिए सरकार की ओर से पेंशन और कई घोषणाएं हुईं, लेकिन कोई भी पूरी नहीं की गईं।