तबाही लाइवः सड़क की जगह नदी, फसल की जगह पत्थर
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जिंदगी बचाने वाला पानी और जीवन देने वाली नदी कितनी भयानक तबाही मचा सकती है इसे देहरादून की बांदल वैली को देखकर समझा जा सकता है।
पहाड़ों की सुंदर वादियों में बसी वैली का हर शख्स बारिश के कहर से घायल होकर कराह रहा है। लोगों के मन में नदी की जो भयावह तस्वीर अंकित हुई है उससे उबरने में उन्हें वर्षों लगेंगे।
यहां के हर बाशिंदे की जुबान पर एक ही सवाल है कि यदि फिर ऐसी बारिश हुई तो हमारा क्या होगा? वैली का एक भी गांव ऐसा नहीं है, जिसे 15 अगस्त की रात हुई भारी बारिश ने नुकसान न पहुंचाया हो।
मालदेवता से आगे सरखेत गांव से शुरू हुई तबाही भुत्सी गांव तक जाती है। करीब 12 ग्राम पंचायतों के सैकड़ों घरों के लोग जिंदगी को फिर शुरू करने की कवायद में लगे हैं।
कल तक जिन घरों में जिंदगी किलकारियां भरती थी, वहां अब नदी बह रही है। कल तक हजारों नाली जमीन में जहां हरे-भरे खेत थे, वहां नदी का पानी हर-हर करके बह रहा है।
जिस सड़क पर चलकर लोग अपनी जिंदगी को खुशहाल बना रहे थे, करीब 25 किलोमीटर लंबी उस सड़क को नदी ने अपने आगोश में ले लिया है।
कई परिवारों के घर बह गए
नई टिहरी जिले में पड़ने वाली ग्राम पंचायत धौलागिरी की प्रधान नमनी देवी के पति राजेंद्र सिंह रावत बताते हैं कि सीतापुर गांव के सात परिवारों के घर बह गए हैं। गांव को सरखेत से जोड़ने वाला इकलौता पुल बह गया है।
इससे करीब सात गांवों ग्वाड़, उपल्ला ग्वाड़, ल्वरिवा, तल्ला और धौलागिरी के लोग कैद होकर रह गए हैं। आने-जाने के लिए लोगों को नदी की धारा में से गुजरना पड़ रहा है।
सरखेत और सीतापुर गांव के बीच से कभी 10 मीटर की चौड़ाई में बहने वाली बांदल नदी अब कहीं 80 तो कहीं 100 मीटर से अधिक चौड़ाई में बह रही है। इसके दोनों किनारों के खेत अब नदी में समा गए हैं।
अब वहां कभी शायद ही फसल लहलहाए। नदी में दो धाराएं बन गई हैं। एक सीतापुर गांव की तरफ से बह रही है तो दूसरी सरखेत गांव की तरफ से। पहले जो नदी की मुख्य धारा थी, वहां बड़े बड़े पत्थर उग आए हैं।
ग्राम पंचायत सरखेत तिमलीमान सिंह की प्रधान आरती के पति विजेंद्र सिंह बताते हैं कि लोगों की चिंता इस बात की है कि अब उनके खेत कभी वापस नहीं आ पाएंगे।
विजेंद्र बताते हैं कि लोगों की नकदी फसलों को भारी नुकसान हुआ है। अदरक और धनिया जैसी फसलें बरबाद होने से लोगों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
प्रशासन पहुंचा जनता के द्वार
आपदा के करीब चार दिन बाद प्रशासन बांदल वैली पहुंचा।
हालांकि सरखेत से आगे जाने के लिए रास्ता नहीं है लेकिन काम चलाने लायक बने पैदल मार्ग से ही एसडीएम मोहन सिंह बर्निया ने तहसीलदार मनबर सिंह कंडारी, कानूनगो कुंवरपाल सिंह और लेखपाल जगदीश राठौर के साथ घंतू का सेरा से करीब एक किलोमीटर आगे तक मौका मुआयना किया।
एसडीएम ने लेखपाल जगदीश राठौर को गांव में ही रुककर बाढ़ से हुए नुकसान का आकलन करने को कहा गया है। सुबह से शाम तक प्रशासन की टीम सरखेत में रही और लोगों का हाल जानने के साथ ही राहत देने की कोशिश करती रही।
हालांकि प्रशासन की धीमी चाल के प्रति लोगों में खासा आक्रोश रहा। उनका कहना था कि प्रशासन ने अब तक उनके लिए कुछ भी नहीं किया है।
रास्ता बनना हुआ शुरू
सरखेत से आगे भुत्सी तक करीब 25 किलोमीटर लंबी सड़क बांदल नदी में समा गई है। इससे कई गांवों का आवागमन बंद हो गया है। हालांकि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत यहां वैकल्पिक सड़क बनाने का काम शुरू हो गया है।
अधिशासी अभियंता संजीव श्रीवास्तव ने बताया कि उनकी कोशिश है कि जल्द से जल्द लोगों के आने-जाने लायक रास्ते को बना दिया जाए। सड़क बनाने के लिए तीन जेसीबी लगाई हैं।
बच्चों की पढ़ाई बंद
सरखेत और आसपास के गांवों के बच्चों की पढ़ाई बंद हो गई है। ऐसा स्कूलों में बाढ़ प्रभावितों के शरण लेने की वजह से हुआ है। हालांकि शिक्षक आते हैं, लेकिन उन्हें पढ़ाने के लिए बच्चे नहीं मिलते।
आठ परिवार जूनियर हाईस्कूल सीतापुर में शरण लिए हैं। इसी तरह सरखेत के प्राथमिक विद्यालय में चार परिवारों ने शरण ली हुई है। आंगनबाड़ी केंद्र में भी दो परिवार रह रहे हैं।
बताते हैं कि इन लोगों का मकान नदी में समा गया है। पीपीसीएल केंद्र सरखेत में भी कई परिवारों ने शरण ले रखी है।
गांवों में नहीं आ रही है बिजली बाढ़ में बिजली के पोल बह जाने के बाद सरखेत और आसपास के तीन-चार गांवों में अब तक बिजली नहीं आ सकी है।
टूटे हुए तार लोगों के घरों पर लोट रहे हैं। ऊर्जा निगम के अधिकारी अभी तक यहां पहुंचे नहीं हैं। लोगों का कहना है कि दिन तो किसी तरह गुजर जाता है, लेकिन रात अंधेरे में काटनी पड़ रही है।
ऊर्जा निगम के प्रवक्ता मधुसूदन का कहना है दो-तीन दिन में बिजली की आपूर्ति सुचारु हो जाएगी। लाइनों को दुरुस्त करने के लिए सामान पहुंचाया जा रहा है।
नदी के पानी से बुझा रहे प्यास
बांदल नदी का प्रकोप पेयजल लाइनों पर भी पड़ा है। सड़क के साथ ही क्षेत्र की पेयजल लाइनें भी बह गई हैं। ऐसे में गांवों में पानी की आपूर्ति नहीं हो पा रही है।
लोगों को मजबूरन नदी के पानी से प्यास बुझानी पड़ रही है। कुछ लोग प्राकृतिक स्रोतों से पानी लाकर काम चला रहे हैं।