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जगह-जगह कूड़े के ढेर लगा रहे नगर निगम की स्वच्छता मुहिम को पलीता
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शहर के विभिन्न वार्डों में सफाई व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। जगह-जगह लगे कूड़े के ढेर बीमारियों को न्योता दे रहे हैं। साथ ही लोगों का कूड़े से उठती दुर्गंध के कारण आवाजाही करना भी मुश्किल हो गया है। निगम सफाई व्यवस्था के लाख दावे कर रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि कई दिनों तक वार्डों से कूड़ा नहीं उठाया जाता है।
नगर निगम प्रशासन की लापरवाह कार्यप्रणाली के कारण लोगों में गुस्सा पनप रहा है। लोगों का कहना है कि पहले ही डेंगू जैसी तमाम बीमारियां हमारे चारों ओर फैल रही हैं। ऐसे में अगर गंदगी के कारण नई महामारी सामने आती है तो इसका कौन जिम्मेदार होगा।
बता दें कि नगर निगम की ओर से सभी वार्डों में घर-घर कूड़ा उठान पर हर महीने लाखों रुपये खर्च किया जा रहे हैं। बावजूद इसके कई वार्डों में कूड़े के ढेर आसानी से देखे जा सकते हैं। जिससे उठने वाली दुर्गंध नाक में दम कर देती है। शहर में फैल रही गंदगी का कारण कूड़े के वाहनों का नियमित रूप से घर-घर न पहुंचना है। इससे हो यह रहा है कि लोग नजदीक ही सड़क किनारे या खाली प्लॉट में कूड़ा डाल रहे हैं। कूड़ा उठान में लगी कंपनियां भी नियमित रूप से इस कूड़े का उठान नहीं कर रही हैं। कईं जगह तो हफ्ते भर तक कूड़े के ढेर लगे रहते हैं। जिससे संक्रामक बीमारियों का खतरा बना हुआ है। कूड़े के ढेर के पास बेसहारा पशु और कुत्ते मंडराते रहते हैं। जो रात में वाहन चालकों के लिए दुर्घटना का कारण बन रहे हैं।
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वार्ड नंबर 93 में बनियावाला प्रेमनगर चौक, चाय बागान रोड, शिमला बाईपास रोड, पित्थूवाला के पास और माजरा सेवलांकला में कूड़े के ढेर लगे हुए हैं। इन जगहों पर लोगों ने अस्थायी कूड़ा डंपिंग जोन बना रखा है। लोग रोज आकर यहां कूड़ा डाल जाते हैं।
लोगों से अपील है कि वह कूड़े को सड़क पर न फेंके। वार्ड में कूड़े के वाहन लगाए गए हैं। उसमें कूड़ा डालें। अगर कूड़े का वाहन नहीं आ रहा है तो इसकी शिकायत करें। जिससे कि संबंधित के खिलाफ कार्रवाई हो सके।
बीना रतूड़ी, पार्षद वार्ड 93
अगर कहीं पर कूड़े का उठान नियमित रूप से नहीं हो रहा है तो यह गंभीर बात है। सभी वार्डों में डोर-टू-डोर कूड़ा उठान की व्यवस्था की गई है। अगर वाहन नहीं आ रहे हैं तो संबंधित कंपनी के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी।
डॉ. अविनाश खन्ना, मुख्य नगर स्वास्थ्य अधिकारी
कूड़ा रिसाइकिलिंग के नाम पर कंपनी हर माह लेती रही एक करोड़
शीशमबाड़ा स्थित सॉलिड वेस्ड मैनेजमेंट प्लांट एवं रिसाइकिलिंग प्लांट को लेकर नगर निगम के अधिकारी शुरुआत से ही लापरवाह बने रहे। कूड़ा निस्तारण में लगी कंपनी को हर माह एक करोड़ तक का भुगतान तो होता रहा, लेकिन प्लांट में कूड़े की रिसाइकिलिंग हो रही है या नहीं किसी ने इसकी निगरानी नहीं की। जिसका नजीता आज शीशमबाड़ा निगम के साथ ही सरकार के लिए भी गले की हड्डी बन गया है।
बता दें नगर निगम की ओर से वर्ष 2018 में रैमकी इनवायरो लिमिटेड को शीशमबाड़ा में कूड़ा निस्तारण का काम सौंपा गया था। प्लांट शुरुआत में ही विवादों में आ गया था। क्योंकि शुरुआती दिनों में यहां से बदबू उठनी शुरू हो गई थी, लेकिन निगम अधिकारियों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। कंपनी को यहां कूड़े से खाद बनानी थी, लेकिन कंपनी ने कूड़े की रिसाइकिलिंग की ही नहीं। कंपनी वहां कूड़े का ढेर लगाती रही। बताया जा रहा है कि जब कोई यहां निगरानी के लिए जाता था, केवल उसी समय प्लांट को चालू किया जाता था। जबकि कंपनी के अधिकारी रोज निगम को कूड़ा रिसाइकिलिंग की रिपोर्ट भेजते रहे। जिसके आधार पर उन्हें बराबर हर माह भुगतान भी होता रहा। ऐसा नहीं कि कंपनी की ओर से बरती जा रही लापरवाही की भनक निगम अधिकारियों को नहीं लगी हो, लेकिन सभी आंखें मूंदे रहे। जिसका नतीजा आज शीशमबाड़ा में कूड़े का पहाड़ खड़ा होना और तीन-तीन लैंडफिल का 15 साल की जगह तीन साल में ही पूरा भर जाना है।
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नगर निगम प्रशासन की लापरवाह कार्यप्रणाली के कारण लोगों में गुस्सा पनप रहा है। लोगों का कहना है कि पहले ही डेंगू जैसी तमाम बीमारियां हमारे चारों ओर फैल रही हैं। ऐसे में अगर गंदगी के कारण नई महामारी सामने आती है तो इसका कौन जिम्मेदार होगा।
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बता दें कि नगर निगम की ओर से सभी वार्डों में घर-घर कूड़ा उठान पर हर महीने लाखों रुपये खर्च किया जा रहे हैं। बावजूद इसके कई वार्डों में कूड़े के ढेर आसानी से देखे जा सकते हैं। जिससे उठने वाली दुर्गंध नाक में दम कर देती है। शहर में फैल रही गंदगी का कारण कूड़े के वाहनों का नियमित रूप से घर-घर न पहुंचना है। इससे हो यह रहा है कि लोग नजदीक ही सड़क किनारे या खाली प्लॉट में कूड़ा डाल रहे हैं। कूड़ा उठान में लगी कंपनियां भी नियमित रूप से इस कूड़े का उठान नहीं कर रही हैं। कईं जगह तो हफ्ते भर तक कूड़े के ढेर लगे रहते हैं। जिससे संक्रामक बीमारियों का खतरा बना हुआ है। कूड़े के ढेर के पास बेसहारा पशु और कुत्ते मंडराते रहते हैं। जो रात में वाहन चालकों के लिए दुर्घटना का कारण बन रहे हैं।
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वार्ड नंबर 93 में बनियावाला प्रेमनगर चौक, चाय बागान रोड, शिमला बाईपास रोड, पित्थूवाला के पास और माजरा सेवलांकला में कूड़े के ढेर लगे हुए हैं। इन जगहों पर लोगों ने अस्थायी कूड़ा डंपिंग जोन बना रखा है। लोग रोज आकर यहां कूड़ा डाल जाते हैं।
लोगों से अपील है कि वह कूड़े को सड़क पर न फेंके। वार्ड में कूड़े के वाहन लगाए गए हैं। उसमें कूड़ा डालें। अगर कूड़े का वाहन नहीं आ रहा है तो इसकी शिकायत करें। जिससे कि संबंधित के खिलाफ कार्रवाई हो सके।
बीना रतूड़ी, पार्षद वार्ड 93
अगर कहीं पर कूड़े का उठान नियमित रूप से नहीं हो रहा है तो यह गंभीर बात है। सभी वार्डों में डोर-टू-डोर कूड़ा उठान की व्यवस्था की गई है। अगर वाहन नहीं आ रहे हैं तो संबंधित कंपनी के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी।
डॉ. अविनाश खन्ना, मुख्य नगर स्वास्थ्य अधिकारी
कूड़ा रिसाइकिलिंग के नाम पर कंपनी हर माह लेती रही एक करोड़
शीशमबाड़ा स्थित सॉलिड वेस्ड मैनेजमेंट प्लांट एवं रिसाइकिलिंग प्लांट को लेकर नगर निगम के अधिकारी शुरुआत से ही लापरवाह बने रहे। कूड़ा निस्तारण में लगी कंपनी को हर माह एक करोड़ तक का भुगतान तो होता रहा, लेकिन प्लांट में कूड़े की रिसाइकिलिंग हो रही है या नहीं किसी ने इसकी निगरानी नहीं की। जिसका नजीता आज शीशमबाड़ा निगम के साथ ही सरकार के लिए भी गले की हड्डी बन गया है।
बता दें नगर निगम की ओर से वर्ष 2018 में रैमकी इनवायरो लिमिटेड को शीशमबाड़ा में कूड़ा निस्तारण का काम सौंपा गया था। प्लांट शुरुआत में ही विवादों में आ गया था। क्योंकि शुरुआती दिनों में यहां से बदबू उठनी शुरू हो गई थी, लेकिन निगम अधिकारियों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। कंपनी को यहां कूड़े से खाद बनानी थी, लेकिन कंपनी ने कूड़े की रिसाइकिलिंग की ही नहीं। कंपनी वहां कूड़े का ढेर लगाती रही। बताया जा रहा है कि जब कोई यहां निगरानी के लिए जाता था, केवल उसी समय प्लांट को चालू किया जाता था। जबकि कंपनी के अधिकारी रोज निगम को कूड़ा रिसाइकिलिंग की रिपोर्ट भेजते रहे। जिसके आधार पर उन्हें बराबर हर माह भुगतान भी होता रहा। ऐसा नहीं कि कंपनी की ओर से बरती जा रही लापरवाही की भनक निगम अधिकारियों को नहीं लगी हो, लेकिन सभी आंखें मूंदे रहे। जिसका नतीजा आज शीशमबाड़ा में कूड़े का पहाड़ खड़ा होना और तीन-तीन लैंडफिल का 15 साल की जगह तीन साल में ही पूरा भर जाना है।