फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   Coronavirus Lockdown: cholera Pandemic and death details Special Report

Corona: सबसे बड़ी महामारी झेल चुका हरिद्वार, डेढ़ करोड़ से भी ज्यादा लोगों की हुई थी मौत: इंद्रकांत मिश्र

Sat, 16 May 2020 12:43 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Sat, 16 May 2020 12:43 AM IST
विज्ञापन
Coronavirus Lockdown: cholera Pandemic and death details Special Report
वरिष्ठ पत्रकार इंद्रकांत मिश्र - फोटो : अमर उजाला

दुनिया इस समय कोरोना वायरस से जूझ रही है। सोशल डिस्टेंसिंग और आइसोलेशन जैसे उपाय न किए जाएं तो यह वायरस कितनी जानें लेगा, कल्पना करना मुश्किल है। पिछली दो शताब्दियों में ऐसी ही एक महामारी फैली थी...हैजा (कॉलरा), जिसने डेढ़ करोड़ से अधिक लोगों की जान ली थी। तब संक्रमण के चंद घंटों में ही मौत हो जाती थी। तब सोशल डिस्टेंसिंग जैसे उपाय किए गए होते तो इतनी मौतें नहीं होतीं। पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार इंद्रकांत मिश्र की खास रिपोर्ट...

विज्ञापन


भारत में हैजा का पता 1817 में चला लेकिन इससे मिलते-जुलते लक्षण वाली बीमारी मुगलकाल और इससे पहले भी लोगों को अपनी चपेट में लेती रही थी। अकबरनामा में संकेत मिलता है कि अकबर की मौत भी इसी तरह के संक्रमण से हुई थी। मर्ज का नाम 1883 में आया, जब नोबल पुरस्कार विजेता जर्मनी के फिजिशियन और माइक्रोबायोलॉजिस्ट राबर्ट हिनरिच हरमैन कोच ने इसके बैक्टीरिया की खोज की। वैक्सीन बनाने के लिए उक्रेन के यहूदी मूल के डॉ. वाल्डेमर मार्डिकाई हाफकिन को वहां की एक संस्था में भारत में इस पर काम करने के लिए भेजा। डॉ. हाफकिन ने हैजा के साथ ही प्लेग की भी वैक्सीन बनाने के लिए काम शुरू किया। इसी दौर मे भारत में खासकर मुंबई में प्लेग के कारण लाखों लोग मारे जा रहे थे। उन्होंने अक्टूबर 1896 में दोनों बीमारी की वैक्सीन तैयार कर ली।
विज्ञापन



सात दौर में फैला था हैजा
विश्व में हैजा सात दौर में फैला। पहला दौर 1817 से 1824, दूसरा 1829 से 1837, तीसरा 1846 से 1860, चौथा1863 से 1875, पांचवां 1881 से 1896, छठां 1899 से 1923 और सातवां 1961 से 1975 तक चला। इस दौरान जितनी मौतें हुईं, उनमें आधी से ज्यादा हरिद्वार और इलाहाबाद के कुंभ और अर्द्धकुंभ में हुईं। 1879 में हरिद्वार के कुंभ से लेकर 1948 के इलाहाबाद अर्द्ध कुंभ बुरी तरह इस जानलेवा बैक्टीरिया की चपेट में आ गए थे। 1948 के बाद स्थिति नियंत्रित होने लगी।

विज्ञापन
विज्ञापन

1879 से 1948 तक हरिद्वार में हुई थी 14354997 मौतें

हरिद्वार कुंभ में 160013 यात्रियों की मौत हुई। शोध करने पर राबर्ट कोच ने पाया कि इसका कारण गैस्ट्रो इंटेस्टाइनल इंफेक्शन था। 1881 से 1896 तक सबसे अधिक लोग प्रभावित हुए। कुंभ के साथ ही यह पंजाब लाहौर फिर अफगानिस्तान, ईरान, दक्षिणी रूस और यूरोप तक फैला। 1892 से 95 तक दुनिया के कई देश इसकी चपेट में आ चुके थे। 1879 हरिद्वार कुंभ से लेकर 1948 इलाहाबाद अर्द्ध कुंभ तक हैजा के कारण 22,29,866 तीर्थयात्रियों की मौतें हुईं।

इनमें हरिद्वार में ही 14354997 लोग शामिल थे। 1906 कुंभ में ब्रिटिश सरकार के कई सैनिक व सिविल अफसर भी इसका शिकार बने। प्रयागराज के एक कब्रिस्तान में दर्जनों ऐसी कब्रें हैं, जिनके ऊपर लगे पत्थर पर उनकी मौत के कारण का उल्लेख है। इनमें बच्चे से लेकर वृद्ध तक शामिल हैं। कुछ कब्रें पति-पत्नी की, पति की मौत रात में हुई तो पत्नी की अगली सुबह। हालांकि 1906 के पहले 100 अर्द्ध कुंभ 1994 कुंभ और 1918 कुंभ में भी सैकड़ों ब्रिटिश सैनिक व अफसर हैजे की चपेट में आए। 1891 के कुंभ को तो कुछ शोध पत्रों में महामारी कुंभ के रूप में उल्लेखित किया गया है। इसके बाद 1927 के अर्द्धकुंभ में लगभग डेढ़ लाख लोगों की मौतें हुईं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed