Conflict between Minister-Secretary: मंत्री-सचिव टकराते रहेंगे तो कैसे होगा विकास, पढ़ें चोपड़ा का ये खास लेख
Special article by@Sanjeev Chopra: बदलाव तबादले और पदोन्नति जैसी छोटी-छोटी बातों में उलझने से नहीं, बल्कि आगे बढ़ने से आएगा। इन दिनों उत्तराखंड सरकार में मंत्री और उनके सचिव का टकराव सुर्खियों में हैं। उत्तराखंड @25 विशेष अंक में उत्तराखंड सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके एवं लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी, मसूरी के पूर्व निदेशक व लेखक संजीव चोपड़ा का पढ़ें ये पूरा लेख...
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पिछले सप्ताह जब मैं इन पंक्तियों को लिखने की तैयारी कर रहा था, प्रदेश के एक मंत्री और उनके सचिव का टकराव अखबारों की सुर्खियां बटोर रहा था। सोचता हूं कि, `आज से दो साल बाद अपने 25वें जन्मदिन पर उत्तराखंड देश का नंबर वन राज्य होगा`— यह बात सुनने में तो अच्छी लगती है पर इसे हकीकत में बदलने के लिए प्रदेशवासियों से लेकर नौकरशाहों और कर्मचारियों तक को अपनी कार्यशैली में बदलाव लाना होगा।
ये बदलाव तबादले और पदोन्नति जैसी छोटी-छोटी बातों में उलझने से नहीं, बल्कि आगे बढ़ने से आएगा। मैंने उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल दोनों ही प्रदेशों में राज्य सरकार के सचिव के रूप में कार्य किया है। मैंने जितना देखा और जाना है उसके हिसाब से इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि प्रोमोशन और तबादलों में विधायकों और मंत्रियों का अनावश्यक दबाव रहता है और यह राज्य की तरक्की के लिए कहीं न कहीं चिंता का विषय है।
ताजा मामला भी कहीं न कहीं मंत्री और सचिव के बीच संवादहीनता की वजह से उभरा हुआ मतभेद है। मतभेद किसी नीतिगत मुद्दे या विकास की बात पर नहीं, बल्कि जिला स्तर के अधिकारियों के तबादलों को लेकर है। हालांकि अब ये विवाद मुख्यमंत्री की टेबल पर है।
ऐसा विवाद न पहली बार है और न ही आखिरी बार, आने वाले समय में भी गाहे-बगाहे खबरों के रूप में समाचार पत्रों में इस तरह के विवाद तब तक सुर्खियां बटोरते रहेंगे, जब तक इसका सटीक समाधान नहीं निकलता। मेरा मानना है कि जब तक तबादले और पदोन्नति की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होगी तब तक नौकरशाहों और जनप्रतिनिधियों के बीच नूरा कुश्ती चलती रहेगी और दोनों की ऊर्जा प्रदेश की प्रगति के बजाय एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगी रहेगी।
आईएएस अधिकारियों के एक बड़े कैडर की कमी
बहुत से कर्मचारी तबादले से संतुष्ट नहीं होते हैं लेकिन मेरा मानना है कि पीएसयू बैंकों और बीमा कंपनियों में जिस तरह दूरस्थ शाखा में तबादले से इनकार करने पर अधिकारी या कर्मचारी को पदोन्नति छोड़नी पड़ती है, ऐसा अगर उत्तराखंड में हो जाए तो कहीं न कहीं यह अच्छा होगा और तबादला नीति में पारदर्शिता आएगी।
मार्च 2006 में तत्कालीन मुख्य सचिव जेसी पंत की अध्यक्षता में गठित उत्तरांचल के पहले प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों में भी ऐसा ही सुझाव शामिल था। आयोग का मानना था कि तबादला नीति सदन के पटल पर पेश की जाए और दोनों पक्षों की सहमति से इस पर अनुमोदन हो। आयोग ने सरकार के संगठनात्मक ढांचे, शासन में नैतिकता, मानव संसाधन, वित्त, पंचायतों और जिला प्रशासन में सर्वोत्तम प्रथाओं, ई-शासन, संकट प्रबंधन और सार्वजनिक व्यवस्था पर लगभग सभी जिलों का दौरा करके आम जनता से राय और सुझाव लेने के बाद अपनी रिपोर्ट पेश की थी।
इस सच्चाई से हम सभी वाकिफ हैं कि उत्तराखंड एक छोटा राज्य है, जिसमें आईएएस अधिकारियों के एक बड़े कैडर की कमी है। इसलिए आयोग ने सिफारिश की थी कि विभागीय अधिकारियों को उनके विभागों से संबंधित प्रशिक्षण, मानव संसाधन और कार्यक्रमों के कार्यान्वयन का काम सौंपा जाना चाहिए ताकि सचिवालय अंतरविभागीय सरीखे बड़े मुद्दों पर अपना ध्यान केंद्रित कर सके।
पंत आयोग की दिशानिर्देशन का फायदा
राज्य के गठन के पहले कुछ वर्षों में ऐसा करना संभव नहीं था क्योंकि यूपी के सचिवालय कर्मचारी लखनऊ से देहरादून तबादले पर आना नहीं चाहते थे। ऐसे में निदेशालयों ने जो प्रस्ताव बनाए और उनकी समीक्षा सचिव स्तर पर, या ज्यादा से ज्यादा अतिरिक्त सचिव के स्तर पर की गई। पंत आयोग की दिशानिर्देशन का फायदा यह हुआ कि नौकरशारी रचनात्मक परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित कर पए।मुझे याद है कि ग्रामीण विकास मंत्रालय से बजट प्राप्त कराने के लिए डॉ. आरएस टोलिया जैसे दिग्गजों और ओएसडी एचबी थपलियाल और अरविंद खंडूरी ने विशेष परियोजनाएं बनाईं। अतिरिक्त सचिव नम्रता कुमार (अब स्लोवेनिया में हमारी राजदूत) ने इनकी जांच की और कुछ ही दिनों में एफआरडीसी ने इन्हें अनुमोदित भी कर दिया। यही वजह रही कि नवनिर्मित उत्तराखंड राज्य के पास सबसे अधिक परियोजनाएं थीं। न केवलभारत सरकार से बल्कि और विश्व बैंक से जुड़ीं भी।
मिशन कर्मयोगी योजना को कार्यशैली में उतार लें तो बात बन जाएगी
बहरहाल, वर्तमान में प्रधानमंत्री मोदी ने मिशन कर्मयोगी के तहत सभी सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों से अपने कार्यशैली पर ध्यान देने और काम में तेजी लाने का सुझाव दिया है। ऐसे में उत्तराखंड के सभी मंत्रालयों, विभागों और निदेशालयों को इस बात का मूल्यांकन करना चाहिए कि वे वर्तमान में क्या कर रहे हैं, कैसे कर रहे हैं? कई मायनों में, मिशन कर्मयोगी के कुछ सुझावों और सिफारिशों को देखकर हमें खुशी और गर्व की अनुभूति होती है, क्योंकि इनमें से अधिकतर का उल्लेख जेसी पंत की रिपोर्ट में किया जा चुका है।
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गेस्ट हाउस चलाने से लेकर ई-गवर्नेंस और मूलभूत सेवाओं के वितरण तक में इन सभी बातों का उल्लेख है। इसलिए नीतिनिर्धारण की नए सिरे से कवायद करने के बजाय जेसी पंत और मिशन कर्मयोगी योजना के दिशा-निर्देशों को ही ठीक से पढ़ जाएं और उन्हें अपनी कार्यशैली में उतार लें तो बात बन जाएगी।
(Special article by@Sanjeev Chopra:लेखक लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी, मसूरी के पूर्व निदेशक हैं। उत्तराखंड सरकार में वे कई महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं। )