मान्यता: इस मंदिर में आने से भर जाती है निसंतान दंपतियों की सूनी गोद, मांगी गई मुराद नहीं जाती खाली
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उत्तराखंड के चमोली की मंडल घाटी में घने जंगल के बीच स्थित माता अनसूया का भव्य मंदिर है। माता अनसूया संतान दायिनी के रूप में प्रसिद्ध हैं। मान्यता है कि माता के मंदिर में जो भी निसंतान दंपती संतान कामना के लिए पहुंचते हैं, उनकी कामना जरूर पूरी होती है।
46 साल बाद माता अनसूया अपने भक्तों की कुशलक्षेम पूछने के लिए दिवारा यात्रा पर निकली हैं। प्रतिवर्ष दत्तात्रेय जयंती के मौके पर दिसंबर में माता अनसूया मंदिर में भव्य मेले का आयोजन होता है।
इस दौरान सैकड़ों की संख्या में निसंतान दंपती संतान कामना लेकर मंदिर में पहुंचते हैं। शक्ति सिरोमणि माता अनसूया को मनुष्य ही नहीं देवता भी नमन करते हैं। मान्यता है कि महर्षि अत्रि मुनि की पत्नी अनसूया की महिमा जब तीनों लोक में होने लगी तो माता अनसूया के पतिव्रत धर्म की परीक्षा लेने के लिए माता पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के अनुरोध पर तीनों देव ब्रह्मा, विष्णु, महेश पृथ्वी लोक पहुंचे। तीनों देव साधु भेष रखकर अत्रिमुनि आश्रम में पहुंचे और माता अनसूया के सम्मुख भोजन की इच्छा प्रकट की।
जल छिड़कते ही छह माह के शिशु बन गए थे साधु
तीनों देवताओं ने माता के सामने यह शर्त रखी कि वह उन्हें निर्वस्त्र होकर भोजन कराए। इस पर माता संशय में पड़ गई। उन्होंने ध्यान लगाकर जब अपने पति अत्रिमुनि का स्मरण किया तो सामने खड़े साधुओं के रूप में उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश खड़े दिखाई दिए।
माता अनसूया ने अत्रिमुनि के कमंडल से निकाला जल जब तीनों साधुओं पर छिड़का तो वे छह माह के शिशु बन गए। तब माता ने शर्त के मुताबिक उन्हें भोजन कराया। वहीं, पति के वियोग में तीनों देवियां दुखी हो गईं।
तब नारद मुनि ने उन्हें पृथ्वी लोक का वृत्तांत सुनाया। तीनों देवियां पृथ्वीलोक में पहुंचीं और माता अनसूया से क्षमा याचना की। तीनों देवों ने भी अपनी गलती को स्वीकार कर माता की कोख से जन्म लेने का आग्रह किया। इसके बाद तीनों देवों ने दत्तात्रेय के रूप में जन्म लिया। तभी से माता अनसूया को पुत्रदायिनी के रूप में पूजा जाता है।
कैसे पहुंचें माता के मंदिर
अनसूया मंदिर तक पहुंचने के लिए चमोली जिले के मंडल नामक स्थान तक वाहन की सुविधा है। ऋषिकेश तक रेल से पहुंच सकते हैं। इसके बाद श्रीनगर, गोपेश्वर से होते हुए मंडल तक पहुंचा जा सकता है। मंडल से माता के मंदिर तक पांच किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई है।
यहां श्रद्धालुओं को पैदल ही जाना होता है। मंदिर के समीप ही रहने वाले स्थानीय लोग भक्तों के लिए ठहरने और खाने की व्यवस्था करते हैं। कई भक्तगण अनसूया मंदिर के दर्शन कर रात्रि विश्राम के लिए मंडल पहुंचते हैं।
प्रकृति की गोद में बसा यह स्थान चारों ओर से ऊंची-ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं से सुशोभित है। इसके नजदीक ही अत्रिमुनि आश्रम स्थित है। यहां अमृत गंगा का उद्गम स्थल भी है। अनसूया मंदिर से करीब सात किलोमीटर की पैदल ट्रेकिंग कर चतुर्थ केदार रुद्रनाथ मंदिर तक भी पहुंचा जा सकता है।