हिमालयी क्षेत्र में एवलांच, हैंगिंग ग्लेशियर और झीलों के खतरे को कम करेगी सुरंग-पंपिंग तकनीक
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हिमालयी क्षेत्र में एवलांच और हैंगिंग ग्लेशियर की तरह झीलें भी बड़ा खतरा हैं। देश में कई झीलों के बढ़ते आकार और उसमें लगातार बढ़ रहा पानी का घनत्व वैज्ञानिकों की चिंताएं बढ़ा रहा है।
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इस खतरे को कम करने के लिए राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच) रुड़की सुरंग और पंपिंग तकनीक से झीलों के पानी को कम करने की योजना पर काम कर रहा है। इसके तहत सिक्किम के ल्होनक ग्लेशियर झील में पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की योजना है। यहां प्रयोग सफल रहा तो इसे देशभर की ग्लेशियर झीलों पर अमल में लाया जाएगा।
उत्तराखंड के चमोली जिले के रैणी गांव में आई आपदा के लिए भले ही एवलांच समेत चट्टानों और ग्लेशियर टूटकर गिरने या अचानक बढ़े तापमान को जिम्मेदार माना जा रहा है, लेकिन एक तथ्य यह भी है कि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर झीलें भी खतरा पैदा कर रही हैं। उत्तराखंड में ही एक दर्जन से अधिक ग्लेशियर झीलों को खतरनाक माना जा रहा है। वहीं, देशभर में सैकड़ों झीलें कभी भी आपदा का सबब बन सकती हैं। इस खतरे को कम करने के लिए एनआईएच के वैज्ञानिकों ने कवायद शुरू कर दी है। संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. संजय कुमार जैन और डॉ. एके लोहानी बाढ़ आपदा पर कई महत्वपूर्ण शोध कर चुके हैं।
उन्होंने बताया कि सुरंग और पंपिंग तकनीक का इस्तेमाल अभी तक देश में नहीं हुआ है जबकि यह तकनीक ग्लेशियर झीलों के खतरे को काफी हद तक कम कर देगी। उन्होंने बताया कि फिलहाल सिक्किम में साउथ ल्होनक ग्लेशियर की झील काफी खतरनाक स्थिति में है। यहां पर पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की योजना तैयार की जा रही है।
55 वर्षों में दस गुना बढ़ गया ल्होनक झील का आकार
इसके तहत अध्ययन किया जाएगा कि झील कितना पानी झेलने में सक्षम है। उससे अधिक मात्रा में पानी होने की स्थिति में इसे पंपिंग के जरिये या बोरिंग कर बनाई जाने वाली टनल के जरिये बाहर निकाला जाएगा। उन्होंने बताया कि इस तकनीक में यह महत्वपूर्ण है कि पानी को बाहर निकालते समय इसका कोई गलत प्रभाव पहाड़ या ग्लेशियर के अन्य हिस्से पर न पड़े। सिक्किम में यह प्रयोग सफल रहता है तो देश की अन्य ग्लेशियर झीलों में भी अपनाया जाएगा।
वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, सिक्किम की साउथ ल्होनक झील का आकार 55 वर्षों में करीब दस गुना बढ़ चुका है। झील कहीं से ब्रेक होती है तो सबसे ज्यादा नुकसान चुनथांग गांव में होगा। इसके अलावा लाचेन गांव भी काफी हद तक प्रभावित होगा।
आईआईटी रुड़की में हुए एक शोध के मुताबिक, लाचेन गांव से करीब पांच किमी पहले ब्रिज तक झील का पानी महज आठ मिनट में पहुंच जाएगा और इसे पूरी तरह तहसनहस कर देगा। बताया जा रहा है कि वर्ष 1962 से 2016 के बीच झील का आकार 0.103 वर्ग किमी से बढ़कर 1.37 वर्ग किमी हो चुका है। इससे झील के टूटने का खतरा बढ़ रहा है। इसके टूटने की स्थिति में पानी 13.6 प्रति सेकेंड की तीव्रता से पहुंचेगा और चुनथांग गांव काफी हद तक प्रभावित होगा।