लेखक नहीं अर्थशास्त्री बनना चाहते थे जाने-माने लेखक विक्रम सेठ
- प्रकाशकों के दबाव में लिखने वाले लेखक नहीं हो सकते।
- कहा कि, न जाने कैसे लेखक बन गए। यह उन्हें भी नहीं मालूम।
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अंग्रेजी के जाने-माने उपन्यासकार विक्रम सेठ का मानना है कि दिल और दिमाग से जो निकलता है, वही लिखना चाहिए। प्रकाशकों के दबाव में लिखने वाले लेखक नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि आज दुनिया में ई-बुक्स पढ़ने का प्रचलन बढ़ गया है। इसके बावजूद दुनिया के अधिकांश हिस्सों में मोटी-मोटी किताबें भी पढ़ी जाती हैं।
अमर उजाला से खास मुलाकात में विक्रम ने बचपन की कुछ यादें भी ताजा कीं। वे देहरादून के प्रसिद्ध दून स्कूल में पढ़ते थे। उनके लिए लेखक बनना एक रहस्य है।
वे अर्थशास्त्री बनना चाहते थे। कहा कि, न जाने कैसे लेखक बन गए। यह उन्हें भी नहीं मालूम। गोल्डन गेट से उन्हें बड़ा ब्रेक मिला। उसके बाद से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। लेखक विक्रम सेठ लंढौर स्थित अपने भाई शांतनु सेठ के आवास पर आए हुए थे।
बोले, हिल स्टेशन लेखक के लिए सबसे अच्छी जगह
इसी दौरान पड़ोस में रहने वाली लेखिका जरीना भट्टी ने आत्मकथा ‘पर्दा टू पिकाडिली’ के विमोचन के लिए उन्हें निमंत्रित किया।
सेठ ने कहा कि वे विमोचन करने से पहले कंटेंट जरूर पढ़ते हैं। जरीना की पुस्तक का कंटेंट उन्हें अच्छा लगा। इसलिए हामी भर दी। उन्होंने कहा कि हिल स्टेशन रचनाधर्मिता के लिए सबसे उपयुक्त स्थान होते हैं। यही वजह है कि मसूरी में देश और दुनिया के कई जाने-माने लेखक हैं।
विक्रम कहते हैं कि लेखन बेबाक और चाटुकारिता से परे होना चाहिए। उनका कहना कि कोई भी पुस्तक कालांतर में इतिहास का हिस्सा बन जाती है। इतिहास में सच्चाई होनी जरूरी है। अन्यथा आने वाली पीढ़ी दिग्भ्रमित भी हो सकती है।