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शिक्षा विभाग में सुगम दुर्गम कोटिकरण की विसंगति दूर, शासनादेश जारी , शिक्षक संगठनों ने खुशी जतायी
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ब्यूरो/अमर उजाला।
देहरादून। शिक्षा विभाग में सुगम और दुर्गम स्कूलों को लेकर आई विसंगतियों को फिलहाल सरकार ने दूर कर लिया है। शासनादेश के मुताबिक राज्य के ऐसे विद्यालय जो वर्ष 2008 में सुगम विद्यालयों की श्रेणी में थे और वर्ष 2013 में उन्हें दुर्गम श्रेणी में शामिल कर लिया था। अब वे वर्ष 2008 से ही दुर्गम की श्रेणी में शामिल होंगे। सरकार की ओर से इस संबंध में शासनादेश जारी कर दिया है।
सरकार और शिक्षा विभाग ने प्रदेश के स्कूलों को सुगम और दुर्गम का निर्धारण करते समय 150 से अधिक दुर्गम स्कूलों को वर्ष 2008 में सुगम की श्रेणी में शामिल किया था। लेकिन वर्ष 2013 में जब कोटिकरण किया जाने लगा तो ऐसे सभी स्कूलों को दुर्गम में शामिल कर लिया। वर्ष 2018 में सरकार ने फैसला लिया कि जो स्कूल साल 2008 में सुगम श्रेणी में शामिल थे उन्हें सुगम में ही शामिल किया जाए। इस पर शिक्षक संगठन भड़क गए। इनका आरोप था कि सरकार शिक्षकों को परेशान कर रही है। बार-बार सुगम-दुर्गम श्रेणी के मानक बदले जा रहे हैं। शिक्षक संगठनों ने पिछली जुलाई में इसी प्रकरण को लेकर आंदोलन भी किया था। उसके बाद से शिक्षक संगठन लगातार अधिकारियाें पर दबाव बना रहे थे कि साल 2013 में जिन विद्यालयों को दुर्गम में शामिल किया था उन्हें साल 2008 से दुर्गम विद्यालय की श्रेणी में रखा जाए ताकि इन विद्यालयाें में तैनात शिक्षकों को दुर्गम श्रेणी का लाभ मिल सके। आखिरकार सरकार ने इसे स्वीकार करते हुए बृहस्पतिवार को शासनादेश जारी कर दिया। शासनादेश जारी होने के साथ ही शिक्षा निदेशक आरके कुंवर ने अधीनस्थ को भी निर्देश जारी किया कि नए शासनादेश के मुताबिक कार्रवाई की जाए, ताकि शिक्षकों को लाभ मिल सके।
प्रदेश सरकार ने शिक्षकों के हित में लिया अब तक का यह सबसे बड़ा फैसला है। शिक्षक संगठन लंबे समय से यह मांग कर रहे थे। इसको लेकर शिक्षक संगठनों की ओर से कई बार धरने-प्रदर्शन भी करने पड़े। देर ही सही लेकिन, प्रदेश सरकार ने शिक्षकों के हित में फैसला लिया है। यह सराहनीय है।
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-डॉ. सोहन माजिला, प्रांतीय महामंत्री, राजकीय शिक्षक संघ
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देहरादून। शिक्षा विभाग में सुगम और दुर्गम स्कूलों को लेकर आई विसंगतियों को फिलहाल सरकार ने दूर कर लिया है। शासनादेश के मुताबिक राज्य के ऐसे विद्यालय जो वर्ष 2008 में सुगम विद्यालयों की श्रेणी में थे और वर्ष 2013 में उन्हें दुर्गम श्रेणी में शामिल कर लिया था। अब वे वर्ष 2008 से ही दुर्गम की श्रेणी में शामिल होंगे। सरकार की ओर से इस संबंध में शासनादेश जारी कर दिया है।
सरकार और शिक्षा विभाग ने प्रदेश के स्कूलों को सुगम और दुर्गम का निर्धारण करते समय 150 से अधिक दुर्गम स्कूलों को वर्ष 2008 में सुगम की श्रेणी में शामिल किया था। लेकिन वर्ष 2013 में जब कोटिकरण किया जाने लगा तो ऐसे सभी स्कूलों को दुर्गम में शामिल कर लिया। वर्ष 2018 में सरकार ने फैसला लिया कि जो स्कूल साल 2008 में सुगम श्रेणी में शामिल थे उन्हें सुगम में ही शामिल किया जाए। इस पर शिक्षक संगठन भड़क गए। इनका आरोप था कि सरकार शिक्षकों को परेशान कर रही है। बार-बार सुगम-दुर्गम श्रेणी के मानक बदले जा रहे हैं। शिक्षक संगठनों ने पिछली जुलाई में इसी प्रकरण को लेकर आंदोलन भी किया था। उसके बाद से शिक्षक संगठन लगातार अधिकारियाें पर दबाव बना रहे थे कि साल 2013 में जिन विद्यालयों को दुर्गम में शामिल किया था उन्हें साल 2008 से दुर्गम विद्यालय की श्रेणी में रखा जाए ताकि इन विद्यालयाें में तैनात शिक्षकों को दुर्गम श्रेणी का लाभ मिल सके। आखिरकार सरकार ने इसे स्वीकार करते हुए बृहस्पतिवार को शासनादेश जारी कर दिया। शासनादेश जारी होने के साथ ही शिक्षा निदेशक आरके कुंवर ने अधीनस्थ को भी निर्देश जारी किया कि नए शासनादेश के मुताबिक कार्रवाई की जाए, ताकि शिक्षकों को लाभ मिल सके।
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प्रदेश सरकार ने शिक्षकों के हित में लिया अब तक का यह सबसे बड़ा फैसला है। शिक्षक संगठन लंबे समय से यह मांग कर रहे थे। इसको लेकर शिक्षक संगठनों की ओर से कई बार धरने-प्रदर्शन भी करने पड़े। देर ही सही लेकिन, प्रदेश सरकार ने शिक्षकों के हित में फैसला लिया है। यह सराहनीय है।
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-डॉ. सोहन माजिला, प्रांतीय महामंत्री, राजकीय शिक्षक संघ