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जो निराकार हैं शिव वही हैं साकार
Updated Fri, 17 Nov 2017 10:50 PM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
जो शिव निराकार रूप में पूजे जाते हैं, वही शिव साकार भी हैं। निराकार परमात्मा का जागृत रूप हैं शिवलिंग। ज्योतिर्लिंग वस्तुत: शिवलिंग के शक्ति स्वरूप हैं, जो देश के अनेक स्थानों पर विद्यमान है। शिवलिंग गांव-गांव, शहर-शहर फैले हुए हैं।
प्रसिद्ध कथा व्यास रामजी पांडेय पौराणिक ने बिल्वकेश्वर महादेव में शिव महापुराण कथा सुनाते हुए दूसरे दिन कहा कि नारद ने प्रश्न किया था कि लिंग पूजा महादेव की ही क्यों होती हैं। ब्रह्मा ने बताया कि शिव परब्रह्म हैं और शिव ही वास्तव में ईश्वर हैं। संसार के अस्तित्व में आने से पहले शिव ही शिव थे। बाद में उनके साकार और निराकार दो रूप सामने आए। शिवलिंग निराकार परमात्मा का जीवंत प्रतीक हैं। महाप्रलय में इस संसार को भी शिव ही स्वयं में समाते हैं। ब्रह्मा और विष्णु जब श्रेष्ठता साबित करने के लिए परस्पर युद्ध करने लगे तब सारा संसार उनके दिव्य अस्त्रों से जलने लगा। सबकी रक्षा के लिए महादेव लिंग रूप में प्रकट हुए। इस लिंग में इतनी शक्ति और तेज थे कि ब्रह्मा-विष्णु का युद्ध तुरंत बद हो गया। तब दोनों ने तय किया कि जो लिंग का अंत देख लेगा वहीं बड़ा है। ब्रह्मा और विष्णु युगों के बाद भी लिंग का अंत नहीं ढूंढ पाए।
कथा व्यास रामजी पांडेय ने कहा कि लिंग का कोई ओर-छोर न पाने पर भगवान विष्णु थक गए। ब्रह्मा ने केतकी के पुष्प को गवाह बनाकर झूठ बोला की उन्होंने लिंग का अंत देख लिया है। तब कुपित शिव ने ब्रह्मा का सिर काट कर उन्हें श्राप दिया कि आगे से ब्रह्मा का कोई मंदिर धरती पर नहीं बनेगा। ब्रह्मा-विष्णु का युद्ध समाप्त होने पर जग को शांति मिली और इस रात्रि को शिवरात्रि कहा जाने लगा। उन्होंने कहा कि शिवलिंग पूजा से भक्तों की सभी मनोकामना पूर्ण हो जाती हैं।
हरिद्वार।
जो शिव निराकार रूप में पूजे जाते हैं, वही शिव साकार भी हैं। निराकार परमात्मा का जागृत रूप हैं शिवलिंग। ज्योतिर्लिंग वस्तुत: शिवलिंग के शक्ति स्वरूप हैं, जो देश के अनेक स्थानों पर विद्यमान है। शिवलिंग गांव-गांव, शहर-शहर फैले हुए हैं।
प्रसिद्ध कथा व्यास रामजी पांडेय पौराणिक ने बिल्वकेश्वर महादेव में शिव महापुराण कथा सुनाते हुए दूसरे दिन कहा कि नारद ने प्रश्न किया था कि लिंग पूजा महादेव की ही क्यों होती हैं। ब्रह्मा ने बताया कि शिव परब्रह्म हैं और शिव ही वास्तव में ईश्वर हैं। संसार के अस्तित्व में आने से पहले शिव ही शिव थे। बाद में उनके साकार और निराकार दो रूप सामने आए। शिवलिंग निराकार परमात्मा का जीवंत प्रतीक हैं। महाप्रलय में इस संसार को भी शिव ही स्वयं में समाते हैं। ब्रह्मा और विष्णु जब श्रेष्ठता साबित करने के लिए परस्पर युद्ध करने लगे तब सारा संसार उनके दिव्य अस्त्रों से जलने लगा। सबकी रक्षा के लिए महादेव लिंग रूप में प्रकट हुए। इस लिंग में इतनी शक्ति और तेज थे कि ब्रह्मा-विष्णु का युद्ध तुरंत बद हो गया। तब दोनों ने तय किया कि जो लिंग का अंत देख लेगा वहीं बड़ा है। ब्रह्मा और विष्णु युगों के बाद भी लिंग का अंत नहीं ढूंढ पाए।
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कथा व्यास रामजी पांडेय ने कहा कि लिंग का कोई ओर-छोर न पाने पर भगवान विष्णु थक गए। ब्रह्मा ने केतकी के पुष्प को गवाह बनाकर झूठ बोला की उन्होंने लिंग का अंत देख लिया है। तब कुपित शिव ने ब्रह्मा का सिर काट कर उन्हें श्राप दिया कि आगे से ब्रह्मा का कोई मंदिर धरती पर नहीं बनेगा। ब्रह्मा-विष्णु का युद्ध समाप्त होने पर जग को शांति मिली और इस रात्रि को शिवरात्रि कहा जाने लगा। उन्होंने कहा कि शिवलिंग पूजा से भक्तों की सभी मनोकामना पूर्ण हो जाती हैं।
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