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खुद को बचाए रखने की लड़ाई

Mon, 10 Jun 2013 02:28 PM IST
देहरादून/प्रेम प्रताप सिंह
देहरादून/प्रेम प्रताप सिंह Updated Mon, 10 Jun 2013 02:28 PM IST
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revenge killing
पिछले दिनों कार्बेट टाइगर रिजर्व और आसपास से कुछ ही दिनों में तीन बाघों की मौत ने हर किसी को सन्न कर दिया। तरह-तरह की आशंकाएं जताई जाने लगीं लेकिन बाघों की मौत के पीछे रिवेंज किलिंग प्रमुख रूप से सामने आ रही है।
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पालतू पशुओं के बाघों का शिकार बनने के बाद वन क्षेत्र में रहने वालों की आजीविका इस कदर गड़बड़ा जाती है कि वह बाघों की जान लेकर अपने आक्रोश को कम करते हैं। अमर उजाला की जांच- पड़ताल में कुछ ऐसे तथ्य मिले हैं जो बाघों की मौत के पीछे रिवेंज किलिंग की ओर इशारा करते हैं।

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आखिर क्यों गायब है मुन्ना

एक जून को तराई वेस्ट वन प्रभाग के आम पोखरा रेंज में, जहां बाघ का शव मिला था, उसके ठीक बगल में 200 मीटर की दूरी पर कार्बेट टाइगर रिजर्व के ढेला रेंज में हाथी डंगर गुज्जरों का झाला (घर या डेरा) है। 12 मई को इस झाले के मुन्ना नाम के एक गुज्जर की भैंस को बाघ ने निवाला बनाया था। भैंस की कीमत 50 हजार रुपये से अधिक थी। पिछले दस दिनों से मुन्ना गायब है। मुआवजा के तौर पर अभी तक उसे एक पाई नहीं मिली।
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मुआवजा नहीं मिलने से गुस्से में है अब्दुल
तराई पश्चिम वन प्रभाग आम पोखरा रेंज के कुंभकडार में पिछले एक साल में अब्दुल के की एक गाय और एक भैंस को बाघ ने अपना निवाला बना लिया। अब्दुल के पास यहां रहने का लाइसेंस नहीं है। अब्दुल अपने नाना आलम गिर के बगल में जंगल की जमीन पर कब्जा करके झाला बना लिया है।

चूंकि उसके पास जंगल में रहने का लाइसेंस नहीं है इसलिए उसे जंगलात की ओर से मुआवजा नहीं मिला। आम पोखरा रेंज में एक जून को मृत मिले बाघ के संबंध में अब्दुल से पूछताछ हो चुकी है। मुआवजा नहीं मिलने और पशु मारे जाने से गुस्से में है अब्दुल।

छह साल में 95 पशु मरे, मुआवजा एक का भी नहीं
पिछले छह वर्षों में मेरी 95 गायों और बैलों को बाघ ने निवाला बना लिया है। किसी का भी मुआवजा जंगलात महकमे ने नहीं दिया है। प्रभागीय वन अधिकारी कार्यालय से लेकर वन संरक्षक कार्यालय तक चक्कर लगाकर थक चुका हूं। समझ में नहीं आ रहा की क्या करूं? मेरे पास अब कुछ गायें ही बची हैं, जिससे छह सात लीटर दूध निकल पाता है।

इसे भी लेने के लिए कोई तैयार नहीं। मैं अपना जीवनयापन  कैसे करूं? यह कहते-कहते तराई वेस्ट वन प्रभाग के फाटो में त्रिलोचन डोरबी सिर पकड़ लेते हैं। कहते हैं कि मेरी तो कट गई, बच्चों का क्या होगा?
 
वन क्षेत्र में रहने वाले ग्रामीणों-गुज्जरों का अर्थतंत्र
कार्बेट टागर रिजर्व, राजाजी पार्क, रामनगर वन प्रभाग, तराई वेस्ट वन प्रभाग, लैंसडौन आदि वन प्रभागों से गुज्जरों एवं ग्रामीणों का विस्थापन नहीं हो पाया है। सैकड़ों की संख्या में गुज्जर टाइगर रिजर्व से लेकर बाघ वाले जंगलों में रह रहे हैं। इनकी आजीविका का मूल साधन पशुपालन हैं।

यह लोग गाय-भैंस पालकर दूध का व्यापार करते हैं। जंगल में रहने वाले एक ग्रामीण के पास 50 से 100 के बीच भैंस-गाय और उनके बच्चे होते हैं। जंगल में रहने के कारण ये पशु बाघ का आसान शिकार हो जाते हैं। कइयों की तो साल में 10-10 गाय और भैंस बाघ का निवाला बन जाती है। लेकिन इन्हें उचित समय पर सही मुआवजा नहीं मिलता।


कितना मिलता है मुआवजा
गाय मरने पर       1500 रुपए
भैंस मरने पर        5000 रुपए
(गुज्जर और ग्रामीणों के अनुसार)

कितनी है वास्तविक कीमत

गाय                  10 से 40 हजार तक
भैंस                   35 से 60 हजार तक  

यदि जंगलों में रहने वाले वन गुज्जरों और ग्रामीणों का वन क्षेत्र से विस्थापन कर दिया जाए तो उनके आक्रोश का शिकार बाघ न पाएं। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। इसी का परिणाम है कि जिसका पशु बाघ मार डालता है वह बदले की भावना (रिवेंज किलिंग) से बाघ को मौत की नींद सुला देता है।
-एएस नेगी, पूर्व मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक

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