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कल तक यहां मेरी रसोई थी...

Tue, 18 Jun 2013 01:34 PM IST
देहरादून/अभ्युदय कोटनाला
देहरादून/अभ्युदय कोटनाला Updated Tue, 18 Jun 2013 01:34 PM IST
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heavy rain destroyed everything

रिस्पना नदी के किनारे मलबे के ढेर पर खामोश खड़ी भीड़ में वह अकेली थी जो हंस रही थी। उसने हंसते हुए ही कहा कि कल तक यहां मेरी रसोई हुआ करती थी... वाक्य पूरा नहीं हुआ था कि गला भर आया और आंखों में आंसू।

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लेकिन हंसी थी कि चेहरे पर जेठ की धूप की तरह खिली थी। सोमवार को मेरे कार्य की शुरुआत ब्रहृमपुरी क्षेत्र के दो मकानों के आधे ढहे मलबे की तस्वीर खींचने से हुई।
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कमाई के अवशेष खोज रहे थे
भरे पूरे परिवार के लिए बना घर एक दरार भरे कमरे में सिमट गया था। बाकी का हिस्सा नदी में समा चुका था। इसके बाद मैं बरसात के कारण टूटी-धंसी सड़कों को पार करते हुए मोथरोवाला पहुंचा था। जहां कभी घर हुआ करते थे वहां कीचड़ के ढेर थे। मलबे के मालिक बने लोग उसमें से अपनी कमाई के अवशेष खोज रहे थे।
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इसी जगह दिखी थी वह महिला जो मातम में डूबे परिजनों और पड़ोसियों के बीच हंस रही थी। उसने बताया कि जब घर बना रहे थे तो नेताओं ने कहा था कि हम आपके साथ हैं, वोट दो और घर बनाओ...आज जब सब कुछ बह गया तो कहते हैं कि ये अवैध था। वहां से निकलते हुए मैं सोच रहा था कि कुदरत ने तो रौद्र रूप दिखाया ही शासन-प्रशासन का भी मुखौटा उतार दिया है।

सड़कों पर मलबा पड़ा था
इसके बाद मैं मालदेवता होते हुए सरखेत क्षेत्र में पहुंचा। यहां पहाड़ी नदी प्रचंड शोर करते हुए खेती की भूमि को अपने आगोश में समेटे जा रही थी। भूस्खलन के चलते सड़कों पर मलबा पड़ा था। डगमगाती बाइक को संभालते हुए किसी तरह आगे तक पहुंचा। गांव के बुजुर्ग ने विनाश का मंजर दिखाया। यह सब दिखाते हुए बुजुर्ग के चेहरे पर अजीब सी शांति थी।

उन्होंने बताया कि वह रात भर खिड़की के पास बैठकर नदी के तांडव को देखते रहे। मैं कुछ कहता इससे पहले ही उन्होंने कहा कि नदी चाहती तो सब ले जाती लेकिन उसने हम पर रहम किया है, कुछ छोड़ दिया है। उनकी इस उम्मीद से मुझे शांति मिली। वहां से निकला तो बारिश शांत हो चुकी थी।


उबरने की कोशिश में
लेकिन जो तबाही छोड़ गई थी लोग उससे उबरने की कोशिश में लग गए थे। दफ्तर पहुंचा तो ढलते सूरज की रश्मियों के दर्शन हो गए। वैसे तो लोग डूबते सूरज को निराशा का प्रतीक मानते हैं लेकिन मुझे इसमें आशा की किरण नजर आई.. एक उगती सुबह का अहसास हुआ...आखिर दो दिन बाद सूरज के दर्शन जो हुए थे...।

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