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इस ‘तार’ से जुड़े हैं दिल के तार, टूट जाएंगे

Sat, 15 Jun 2013 10:43 AM IST
देहरादून/प्रवेश कुमारी
देहरादून/प्रवेश कुमारी Updated Sat, 15 Jun 2013 10:43 AM IST
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 discontinue 160 year old telegram service

बात उस जमाने की है जब ई-मेल का नाम किसी ने नहीं सुना था। फोन बेहद कम थे। खबर चिट्ठी के जरिए लोगों तक पहुंचती थी और तेज खबर पहुंचाने का जरिया केवल तार था। ‘तार आया है...’! सुनकर ही पाने वालों के दिल बुरे ख्याल से तब तक कांपते रहते थे, जब तक खबर का पता न चल जाता। लेकिन लोगों के दिल की धड़कन थाम लेने की कूवत रखने वाले इस तार की धड़कन अब खुद थमने वाली है।

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15 जुलाई से तकरीबन अप्रासंगिक हो चुकी यह सेवा खत्म कर दी जाएगी। जीपीओ परिसर स्थित तार घर का काउंटर भी इस खबर से सूना-सूना है। आधी सदी केसफर के बाद का यह ब्रेक अब तक तार से ‘तार’ जोड़े रहे कर्मियों को भी उदास कर चला है। मामला दिल के तारों का जो ठहरा।
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कैसे भूल जाऊं वह दिन
1981 से तारघर में हूं। वह दौर भी था, जब तार के लिए लंबी लाइन लगती थी। बुक करने में मारा-मारी रहती थी। तकनीक बदली, तो सब बीते जमाने की बात हो गई। अब सरकारी कार्यालयों के लिए ही तार ज्यादा बुक किए जाते हैं। कुछ पर्सनल भी होते हैं, लेकिन इनकी संख्या बेहद कम होती है।
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-रामशरण, तार बाबू

तार के लिए भर्ती हुआ
खुद 41 साल पहले 1972 में इस तार घर से पहली बार तार किया था। तार कोलकाता के लिए था। पिता की मृत्यु की खबर चाचा तक पहुंचाने के लिए इसका इस्तेमाल किया था। दोपहर लगभग सवा बजे भेजा तार उन्हें शाम चार बजे मिल गया था। 1978 में इस सेवा के आकर्षण में यहां भर्ती हुआ।
-रविंद्र तिवारी, सीनियर टेलीग्राफ असिस्टेंट

34 साल पहले 275, अब केवल दो कर्मी
रविंद्र बताते हैं कि 34 साल तारघर में 275 कर्मचारियों का स्टाफ था। यह स्टाफ केवल तार का ही काम देखा करता था। आज यहां तार का काम केवल दो ही लोग कर रहे हैं। तार बाबू रामशरण हैं, जो तार बुक करते हैं और दूसरे रामनरेश गुप्ता, जो एंट्री का काम देखते हैं।

पहली नियुक्ति अवनति के तौर पर
48 साल पहले यानी 19 अक्तूबर, 1965 से अस्तित्व में आए अधीक्षक कार्यालय के पहले प्रभारी जेएन मेहरोत्रा थे, जिन्हें इस पद पर अवनति के तौर पर भेजा गया था। नौ जून, 2008 से यहां केएन शर्मा इस पद पर काम कर रहे हैं।

कारगिल युद्ध के दौरान बहुत आते थे तार
1999 में कारगिल युद्ध के दौरान बहुत तार आते थे। पहाड़ से बहुत से लोग थे, जो फौज में सेवा दे रहे थे। उस वक्त तक एसटीडी सेवा शुरू हो चुकी थी, लेकिन फौज की सूचना थी, लिहाजा तार से पहुंचती थी।
-केएन शर्मा, सब डिवीजनल इंजीनियर (अधीक्षक तारघर)

10 पैसे का पोस्ट कार्ड, साढ़े तीन रुपये का टेलीग्राम
जिस वक्त पोस्ट कार्ड केवल 10 पैसे का था, उस वक्त टेलीग्राम पर साढ़े तीन रुपये का खर्च आता था। इस खर्च की वजह से टेलीग्राम का खास मौकों पर ही प्रयोग किया जाता था। अक्सर घर में कोई बड़ा फंक्शन होने या किसी की मृत्यु पर ही तार भेजे जाने की परंपरा रही है।

बस दून और ऋषिकेश में बचे रहे तारघ
लकड़ी के बाक्स और एल्युमिनियम की प्लेट पर पाइप के माध्यम से मिलने वाले सिग्नल की आवाज को संदेश में बदलने वाले उपकरण मोर्स के जरिए कभी तार की सुविधा श्रीनगर, उत्तरकाशी, विकासनगर, टिहरी आदि जगहों पर भी थी, पर यह तारघर बंद हो गए। अब यह केवल दून और ऋषिकेश में हैं।

अपनों की खबर पाने को महीनों का इंतजार
सेना की फील्ड में पोस्ट होती है। टेलीग्राम के जरिए फौजियों को छुट्टी, बदली जैसी सूचनाओं को पहुंचाना आसान था। इस सेवा के बंद होने का सबसे ज्यादा प्रभाव इसी वर्ग पर पड़ेगा। फौज का हिस्सा रह चुका हूं। जानता हूं कि फौजी किस तरह की तकलीफों से फील्ड में रूबरू होता है। इलाकाई विषमताओं में देश-विदेश की खबर तो रेडियो से मिल जाती है, लेकिन अपनों की खबर पाने को तरसना पड़ता है। यह पीड़ा केवल वही समझ सकता है, जिसे अपने परिवार से दूर रहना पड़ा हो। इस सेवा को बंद किए जाने के पीछे मंशा चाहे, जो भी हो, लेकिन एक फौजी कभी इसे उचित नहीं ठहरा सकता।
-कर्नल भूपेंद्र सिंह क्षेत्री, अनारवाला

बेटी के जन्म, मां की मौत की खबर मिली थी तार से
फौज की तो लाइफ लाइन ही टेलीग्राम है। इसे बंद किए जाने का फैसला निराश करने वाला है। फौजियों को फील्ड में कई बार ऊंचाई वाले, बर्फीले इलाकों में रहना होता है, जहां या तो मोबाइल के सिग्नल नहीं मिलते या टावर ही नहीं होते। नो मैंस लैंड में तो टावर होने के बावजूद मोबाइल पर बात करने की इजाजत नहीं होती। ऐसे में अपनों की खबर पाने को टेलीग्राम ही सहारा है। मैंने 1962, 1971 की लड़ाई लड़ी। बेटी के जन्म, मां की मौत की खबर भी फील्ड में टेलीग्राम के ही जरिए मिली थी। अब तो पूरी तरह चिट्ठी का ही सहारा होगा। सियाचिन ग्लेशियर के आस-पास कई इलाके ऐसे हैं, जहां 12 माह बर्फ रहती है। ऐसे में अपनों की खबर पाने को महीनों इंतजार करना होगा।

-कैप्टन आरएस थापा, सेवलाकलां, चंद्रबनी

टेलीग्राम-
न्यूनतम 30 शब्दों तक 28 रुपये (इसके पश्चात एक रुपया प्रति शब्द अतिरिक्त)
डेथ टेलीग्राम-
न्यूनतम 30 शब्दों तक पांच रुपये (इसके बाद एक रुपया प्रति शब्द अतिरिक्त)

ओएनजीसी, सर्वे, आर्डिनेंस थीं सबसे ऊपर
नए संचार साधनों के प्रभावी होने से पहले ओएनजीसी, सर्वे, आर्डिनेंस तार का सबसे ज्यादा प्रयोग करती थीं। इसकी वजह त्वरित सेवा होने के साथ ही सीक्रेसी बनाए रखना था। टेलीग्राम के सिग्नल कैच नहीं किए जा सकते। अब भी सरकारी कामों में टेलीग्राम का इस्तेमाल होता है, क्योंकि उसे सर्टिफिकेट के तौर पर प्रयोग किया जाता है। हर रोज यहां से आधा दर्जन टेलीग्राम होते हैं।

अब इनका इस्तेमाल सबसे ज्यादा :
पुलिस कार्रवाई में
प्रशासनिक कार्रवाई में
फौज में

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