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खुद ही नदी में धकेल दीं जिगर के टुकड़ों की लाशें

Wed, 26 Jun 2013 03:20 PM IST
प्रवेश कुमारी
प्रवेश कुमारी Updated Wed, 26 Jun 2013 03:20 PM IST
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destruction in kedarnath

वो भयानक मंजर आंखों से ओझल नहीं होता। जिंदगी बचाने के लिए गणेशचट्टी में बारिश के बीच एक टी स्टाल में शरण ली थी। चारों तरफ रुदन-ही-रुदन, लाशें ही लाशें थीं।

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लाशें नदी में धकेलने लगे थे
आंसुओं के सैलाब के बीच कुछ परिजन अपने जिगर के टुकडों की लाशें नदी में धकेलने लगे थे, मानों अपनी जिंदगी पर भी उन्हें ऐतबार न हो। दिल के टुकड़ों को मोक्षदायिनी के सुपुर्द कर शायद मुक्ति दिलाना चाहते थे।
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इसी तरह की हृदयविदारक यादें अपने साथ लेकर लौटी हैं राजेंद्रनगर देहरादून की यशोदा चंदोला, जो सात दिन गणेश चट्टी में फंसे रहने के बाद सेना की मदद से पहले ऊखीमठ और फिर दून पहुंचीं। बकौल यशोदा केदार घाटी में हुए तबाही के मंजर देख रूह कांप रही थी।
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उत्तराखंड आपदा की विशेष कवरेज

कैसा खौफ था। अचानक जगह-जगह फूट गए झरनों ने सांस अटका दीं। एक तरफ भयानक बारिश और दूसरी तरफ झरनों की लगातार बढ़ रही संख्या। ऊपर से चलने से बेहद मजबूर ननद और 70 साल की सास का साथ। सभी तरफ से संपर्क कट चुका था। यह भी नहीं पता था कि वापस आएंगे भी कि नहीं। लेकिन 22 जून को पहुंची सेना की सहायता ने जिंदगी बचा ली।

पालकी वाले छोड़ भागे, बोले-जिंदगी ज्यादा जरूरी
यशोदा 13 जून को केदारनाथ धाम के रवाना हुई थीं। 14 जून को तिलवाड़ा में विश्राम कर आगे बढ़ी थीं। 15 जून को पूजा का समय निकलने की वजह से सायंकालीन आरती में हिस्सा लिया था। 16 जून को सुबह सात बजे मंदिर में जाकर वापस लौटना शुरू किया था। आपदा की खबर मिली तो पालकी वाले भी छोड़ भागे। बोले-जिंदगी ज्यादा जरूरी है।


रामबहादुर ने घोड़ों के चने के सहारे बचाई कई जान
जहां ज्यादातर नेपालियों के लूट-पाट करने की खबर आ रही थी, वहीं गणेशचट्टी में चाय की दुकान चलाने वाले लगभग 55 वर्षीय राम बहादुर ने घोड़ों के चने के सहारे कई जान बचाईं। बकौल यशोदा हमारे पास बिस्कुट, ब्रेड खत्म हो चुके थे। इन चनों का ही सहारा था। राम बहादुर ने दो कट्टे खोल दिए थे, लेकिन सख्त हिदायत भी दी कि एक मुट्ठी से ज्यादा न लें।

नदी में गिरते रहे पैकेट
राहत, बचाव कार्य की झलक 22 जून को देखने को मिली। यहां सेना के हेलीकाप्टर दिखाई दिए, लेकिन इनसे जो खाने के पैकेट गिराए जा रहे थे, उनमें से ज्यादातर नदी में गिर रहे थे। इसमें सेना की गलती नहीं थी, वह जितना करीब होकर पैकेट फेंक सकते थे, कोशिश कर रहे थे। पर सवाल तो लोगों की भूख का था। जिसके हाथ जो लगा उसने उदरस्थ कर लिया।

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