आखिर क्यों वाकई में 'असली पठान' थे इरफान?
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1 जनवरी 2020 को सुबह-सुबह मेरे फोन पर घंटी बजती है इरफान पठान के फोन की। मैनें हैलो की बजाए हैप्पी न्यू ईयर पठान साब तपाक से बोला। पठान ने भी नए वर्ष की शुभकामनाए दी। लेकिन, उसके बाद उन्होंने कहा कि आज मैंने फोन आपको एक खास मकसद से किया है। 4 जनवरी को मैं आधिकारिक तौर पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह रहा हूं। मैं कुछ खास लोगों को पहले बता रहां हूं ताकि आप ये ना कहें कि मैंने चौंका दिया।
दरअसल, पठान ये फैसला करीब 5 महीने पहले ही ले चुके थे और मुझे इस बारे में बताया भी था। बस तारीख तय नहीं कर पा रहे थे। पठान को जरूरत नहीं था कि वो मुझे फोन करते और बताते लेकिन ये उनकी शख्सियत का हिस्सा है। अगर आप किसी बात पर उनसे ईमानदारी से नाराजगी जताए तो वो उसे याद रखते हैं। मुझे उनकी शादी की खबर देर से मिली थी, जिस पर मैंने हैरानी जताई थी तब वो थोड़े बैकफुट पर चले गए थे।
नॉनवेज को टक्कर देता आलू
पठान के साथ पिछले 2 दशक में कई बेहतरीन यादें जुड़ी हैं। ऑस्ट्रेलिया दौरे पर तहलका मचाकर पठान जब धर्मशाला में 2004 में नॉर्थ जोन बनाम वेस्ट जोन का दलीप ट्रॉफी मैच खेलने पहुंचे तो मेरी उनसे पहली मुलाकात हुई। काले रंग के कुर्ते में इरफान काफी शर्मा रहे थे और कई दफा खुद को देखकर खुश भी हो रहे थे। उसी समय उन्हें एहसास हो चुका था कि वह स्टार बन गए।
इरफान ने कभी स्टारडम धौंस नहीं जमाई। पठान हमेशा जमीन से जुड़े रहने वाले खिलाड़ी रहें और कभी भी उन्हें मैनें किसी की शिकायत करते या आपा खोते नहीं देखा। आम-धारणा है कि पूर्व कोच ग्रेग चैपल ने उनका करियर तबाह कर दिया, लेकिन पठान ने हमेशा चैपल का बचाव किया। वो अब भी चैपल के शुक्रगुजार हैं। पठान ने हमेशा ये माना कि अगर उनके करियर को किसी वजह से बाधा आई तो इसके लिए वो खुद जिम्मेदार थे न कि कोई और। कभी भी उन्होंने अपनी नाकामी के लिए किसी बात का बहाना नहीं बनाया।
पठान की ईमानदारी, उनकी वाक-पटुता, सहजता और दिल को जीतने वाली मुस्कान का मैं हमेशा कायल रहा। मुझे याद है एक बार वड़ोदरा में उन्होंने मुझे लंच पर बुलाया। गुरुवार का दिन था और मैंने कहा कि आज मैं नॉन वेज नहीं खा सकता। आनन-फानन में उनकी अम्मी ने आलू की इतनी बेहतरीन सब्जी खिलाई कि तमाम नॉनवेज बेकार।
इरफान, हार्दिक और वड़ोदरा
पठान ने कभी भी मुझे टीम से जुड़ी एक खबर नहीं दी। हां, जब-जब इंटरव्यू मांगा तो ज्यादातर मौकों पर उन्होंने दिल खोलकर जवाब दिया। अपने करियर के दौरान पठान कई बार टीम से अंदर-बाहर हुए। हर बार वो अपनी वापसी को लेकर एक डेडलाइन देते और 90 फीसदी मौकों पर वो वापसी करते हुए नजर आए, लेकिन 2013 चैंपियंस ट्रॉफी के बाद ये साफ था कि पठान में अब पहले वाली बात नहीं रही थी। लेकिन, अब भी उम्मीद का दामन उन्होंने नहीं छोड़ा था।
2015 वर्ल्ड कप के दौरान जब उनका चयन नहीं हुआ तो लगभग ये साफ हो गया था कि उनके लिए फिर से वापसी करने की गुंजाइश न के बराबर है। रही-सही कसर उन्हीं के शहर से आने वाले हार्दिक पांड्या ने पूरी कर दी। इत्तेफाक से 2015 में सर्दियों के दौरान दिल्ली में एक रणजी मैच के दौरान पठान ने ही मेरा परिचय पांड्या से ये कहकर कराया था कि इस लड़के पर नजर रखना, आगे इंडिया के लिए बड़ा खेलेगा। पठान को शायद ही ये अंदाजा रहा होगा कि पांड्या उन्हीं की वापसी की थोड़ी बहुत उम्मीद को भी खत्म कर देगा।
जब क्रिकेटर से कमेंटेटर बने पठान
पठान के बारे में जो सबसे खास बात है उनका रवैया। कभी भी उनका रवैया बदला नहीं। आईपीएल में करोड़ों रुपये की बोली लगने के बावजूद पठान वही सामान्य पठान के तौर पर पेश आते। ना सिर्फ आपका हाल-चाल पूछते बल्कि आपके परिवार वालों के बारे में भी जानकारी लेते। उनकी शादी के दौरान मैं उन 5 फैंस से मिलकर हैरान रह गया जिन्हें खास तौर पर पठान ने न्यौता दिया था। उनमें से एक तो आज एक नामी क्रिकेट वेबसाइट का संस्थापक भी है।
जामिया मिलिया इस्लामिया के दो लड़के हर समय दिल्ली में उनकी यात्रा के दौरान जरूर मिलने आते। पिछले बार जब एयरपोर्ट पर पठान से मिला तो जामिया का वही इंजीनियर एक उपहार लेकर उनसे मिलने पहुंचा। पठान की आंखों में आंसू छलक आए। अपने चाहने वालों के साथ एक सुपस्टार क्रिकेटकर का ऐसा रिश्ता बनाए रखना अपने आप में आंख खोलने वाली बात रही।
जब पहली बार कुछ साल पहले पठान ने स्टारस्पोर्ट्स पर माइक थामा तो मेरे मुंह से अचानक ये शब्द निकले कि मजा आ रहा है अब हिंदी कमेंट्री सुनने में जब आप जैसे 'पूर्व' खिलाड़ी अपने अनुभव का जिक्र करते हैं। पठान ने पूर्व शब्द को लेकर मेरी खिंचाई शुरु कर दी क्योंकि तब तक उन्होंने क्रिकेट को अलविदा नहीं कहा था और ना ही किसी तरह का हिंट दिया था।
'तू तो नकली पठान हैं और मैं असली'
जाहिर सी बात है, अनजाने में ही सही, मेरे शब्द से उन्हें थोड़ी तकलीफ तो जरूर हुई होगी, लेकिन उन्होंने इसे जाहिर होने नहीं दिया। बस हंसी-मजाक में ही अपनी नाराजगी जता गए। बहुत कम लोगों को ये बात पता है कि यूसुफ के अलावा उनका एक और भाई था। इमरान।
जब इरफान ने अपने बेटे का नाम इमरान रखा तो कई आलोचकों को लगा कि वो पाकिस्तान के पूर्व कप्तान इमरान खान से प्रभावित होकर ऐसा कर रहें हैं। मगर, हकीकत ये थी कि वो अपने उस भाई को कभी भी भूलना नहीं चाहते हैं और इसलिए अपनी सबसे बड़ी चाहत यानि अपने बेटे का नाम उन्होंने इमरान रखा।
मैनें एक बार इरफान से पूछा था कि क्या वजह है कि आपने शाहिद फरीदी को सबसे ज्यादा तंग भी किया है और आउट भी किया। वो आपके देखकर भड़क क्यों जाता था? इरफान ने कहा कि उनके पहले पाकिस्तान दौरे के दौरान अफरीदी ने उनसे कहा था कि इरफान तू तो नकली पठान हैं और मैं असली। उसके बाद से हर बार मैं उनको आउट करते यही कहता बता कौन है असली पठान और कौन है नकली! बहरहाल, भारत के इस जांबाज खिलाड़ी की उपलब्धियों पर हर किसी को फख्र होगा और प्रेस बॉक्स में पुराने साथी एक खुशमिजाज और नेक क्रिकेटर की कमी हमेशा महसूस करेंगे।
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