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रणजीत सिंह: वह भारतीय क्रिकेटर जिन्हें अपनी टीम में लेने के लिए आपस में भिड़ गए थे अंग्रेज

Anshul Talmaleअंशुल तलमले Updated Tue, 10 Sep 2019 11:00 AM IST
महाराजा रणजीत सिंह
महाराजा रणजीत सिंह - फोटो : सोशल मीडिया
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स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले तक भारत में क्रिकेट केवल राजघरानों, राजे-रजवाड़ों, नवाबों और रईसों तक ही सीमित रहा। आमजन में सिर्फ वे लोग ही क्रिकेट खेलते और दिलचस्पी लेते जो क्रिकेट की बदौलत राजघरानों व रियासतों में नौकरी पाना चाहते थे। उदाहरण के लिए आप राजे-रजवाड़ों में पटियाला के महाराज, वडोदरा के महाराज गायकवाड़, पटौदी के नवाब और इंदौर के होलकर्स को शामिल कर सकते हैं। इन्हीं में एक थे भारतीय क्रिकेट के पितामह कहे जाने वाले जामनगर के महाराजा कुमार रणजीत सिंह।
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10 सितंबर 1872 को गुजराज के काठियावाड़ के सरोदर गांव में जन्में रणजीत सिंह अगर आज जिंदा होते तो अपना 147वां जन्मदिन मना रहे होते। 16 साल की उम्र में पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए रणजीत सिंह ने भारत में ही क्रिकेट का ककहरा सीखा था। उन्हें करियर के दौरान कुमार रणजीतसिंह, रणजी और स्मिथ के नाम से जाना जाता था। भारत में उन्हीं के नाम से राष्ट्रीय क्रिकेट चैंपियनशिप आयोजित की गई जो आज भी रणजी ट्रॉफी के नाम से चल रही है।

रणजीत सिंह ने अपने छात्र जीवन में क्रिकेट के अलावा फुटबॉल और टेनिस भी खेली, लेकिन क्रिकेट ने उन्हें विशेष पहचान दिलाई। क्रिकेट की बाइबल कही जाने वाली पत्रिका विजडन ने भी रणजी की प्रतिभा को लोहा मानते हुए उन्हें 1897 में क्रिकेट ऑफ द ईयर से सम्मानित किया था। क्रिकेट के जनक माने जाने वाले डब्ल्यूजी ग्रेस भी उनकी कलात्मक बल्लेबाजी से बेहद प्रभावित थे। उन्होंने कहा था कि दुनिया को अगले सौ साल तक रणजी जैसा बेहतरीन बल्लेबाज देखने को नहीं मिलेगा।
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निराली बल्लेबाजी के लिए मशहूर थे

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