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बैटिंग के बादशाह ने किससे ली संस्कार की क्लास?
वेद विलास उनियाल/अमर उजाला, दिल्ली
Updated Thu, 14 Nov 2013 01:06 PM IST
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क्रिकेट के मैदान में सचिन तेंदुलकर ने कामयाबी की क्या-क्या कहानियां लिखी हैं, इससे दुनिया वाकिफ हैं। लेकिन यह बात कम लोगों को पता है कि सचिन ने संस्कार और संयत रहने की क्लास कहां से ली है?
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मास्टर ब्लास्टर के प्रशंसक जहां उनके खेल के दीवाने हैं, वहीं उनकी शख्सियत के भी उतने ही मुरीद हैं। सभी का मानना है कि इतनी ऊंचाइयों पर पहुंचने के बावजूद जमीन से कैसे जुड़े रहना है, यह बात सचिन से सीखना चाहिए।
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सवाल उठता है कि सचिन ने यह संस्कार कहां से सीखे हैं। दरअसल, उन्होंने यह संस्कार अपने परिवार से पाए हैं। नब्बे के दशक की शुरुआत में मुंबई की एक नामी संस्था ने चर्चगेट के पास केसी कॉलेज में एक आयोजन कर अजय देवगन, उर्मिला मातोंडकर और सचिन को सम्मानित करने का फैसला किया।
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सचिन के पिता से मुलाकात
सचिन उस समारोह में नहीं आ सके थे, लेकिन उनकी ट्रॉफी लेने के लिए सचिन के पिता प्रो. रमेश तेंदुलकर को आना था। अजय देवगन, उर्मिला आगे की पंक्ति में बैठे थे। एक सज्जन तीसरी पंक्ति में मेरी बगल में बैठे थे।
जब उर्मिला मातोडकर को मंच पर बुलाया गया तो उन्होंने बात छेड़ते हुए कहा था, "मैंने इनकी एक नई फिल्म देखी है, इनमें टेलेंट है।"
मैंने उनकी बात सुनी और महसूस किया कि वह कुछ बातें करना चाहते हैं। मैंने भी यह जाने बिना कि वह कौन हैं, उनसे बातें शुरू कर दीं। उन्होंने यह भी कहा कि वह सचिन के लिए आए हैं। मैं यही समझा कि वह सचिन के कोई बड़े फैन होंगे। मैंने उनसे कहा "शायद सचिन नहीं आया है।"
उन्होंने जवाब में कहा कि "हां, वह नहीं आ सका।" फिर मैंने औपचारिकतावश पूछा था, "आप कहां रहते हैं।" उनका कहना था, बेटा! बांद्रा में साहित्य सहवास है न, वहीं रहता हूं।"
प्रोफेसर रमेश तेंदुलकर ने किया अवाक्
मैंने चहक कर कहा, जी, वहां तो धर्मवीर भारतीजी भी रहते हैं। उनका कहना था, "हां, कभी-कभी हम लोग मिला करते हैं। हम करीब ही रहते हैं।"
थोड़ी ही देर में मंच से उद्घोषक ने कहा, सचिन तेंदुलकर किसी कारणवश नहीं आ पाए, लेकिन उनका अवॉर्ड लेने के लिए उनके पिता प्रो. रमेश तेंदुलकर यहां आने वाले हैं। वह जैसे ही आएंगे, हम उन्हें मंच पर आमंत्रित करेंगे।
एकाएक जिन सज्जन से मैं बात कर रहा था, वह उठे और हाथ के इशारे से कहा, "मैं आ चुका हूं।" उनका इतना कहना था कि कैमरों के फ्लैश उनकी तरफ चमकने लगे।
मैं चौंका, मैं जिस व्यक्ति से बात कर रहा था वह सचिन के पिता थे, जबकि मैं उन्हें सचिन का कोई उम्दा प्रशंसक ही समझ रहा था। वह खड़े हुए और मुस्कराते हुए इतना कहा, "जरा मंच पर हो आऊं, फिर बात करते हैं।" मंच पर उन्हें सम्मान के साथ सचिन की ट्रॉफी सौंपी गई।
सचिन में पिता की यही झलक है
फिर वह आयोजकों से घिर गए। मैं अवाक् था और समझ रहा था कि अब मेरे लिए उन्हें पकड़ पाना मुश्किल ही था। मैंने एक कागज पर लिखा कि मैं यह नहीं समझ पाया था कि आप सचिन के पापा हैं। पर मैं आपसे मिलना चाहता हूं, कुछ और बातें करना चाहता हूं।
मैंने किसी तरह वह कागज उन तक पहुंचा दिया। उसे उन्होंने तुरंत पढ़ा और फिर मुझे पास बुलाया। उन्होंने कहा, "किसी दिन फोन करके घर आ सकते हो। साथ ही यह भी कहा कि बांद्रा पूर्व में सचिन की एक प्रशंसक रहती है, उसने सचिन के कई पोस्टर अपने घर पर लगाए हैं। कभी वक्त मिले तो उससे मिलना और उसके बारे में लिखना।"
छोटी मुलाकात, बड़ा सबक
वह मुलाकात इतनी ही थी। आगे संयोग नहीं बन सका कि मैं उनसे मिल सकूं। फिर एक दिन वे इस दुनिया से चल बसे। लेकिन मैंने उस मुलाकात में ही महसूस किया था कि जो शख्स इतना लोकप्रिय हो, इतना बड़ा स्टार हो चुका हो, उसके पिता में कहीं उस बात का गुरूर नहीं था। वह बेहद शालीन थे।
उनकी शालीनता और संस्कार की झलक सचिन में नजर आती है। प्रो. रमेश तेंदुलकर का खेल से कोई नाता नहीं था, लेकिन उन्होंने अपने बेटे को बेट-बाल खेलने दिया।
जिस खेल से उनका ताल्लुक नहीं था, उस खेल के लिए उन्होंने सचिन को, अपनी राह चुनने दी। लेकिन वे सचिन को जो दे सकते थे, वह जीवन के गहरे संस्कार ही थे जिनका सचिन ने कदम-कदम पर ख्याल रखा।