नई इबारत गढ़ती औरतें
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विगत रविवार को अमावस की रात पाकिस्तान के उत्तरी से दक्षिणी इलाकों तक के हिंदुओं ने महाशिवरात्रि का पर्व मनाया। कराची में श्रद्धालुओं ने समुद्र तट पर अपना उपवास तोड़ने से पहले श्री रत्नेश्वर महादेव मंदिर में पूजा की। उत्तर पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा सूबे के मानशेहरा में कई जगहों के हिंदू इकट्ठा हुए और 3,000 साल पुराने ऐतिहासिक शिव मंदिर में पूजा की। उसके अगले दिन अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया। इस अवसर पर दुनिया भर की महिलाओं ने माना कि उनके संघर्ष और उनकी उपलब्धियां एक जैसी हैं, चाहे वे न्यूयॉर्क में रहती हों या रावलपिंडी में। पाकिस्तान में एक ओर तो औरतों के अधिकारों को मानवाधिकार बताया जाता है, दूसरी तरफ महिला-विरोधी ताकतें भी एकजुट हैं। इन दोनों ताकतों के बीच लड़ाई लगातार जारी है।
हाल के दिनों में इतिहास बना, जब पंजाब विधानसभा ने महिला सुरक्षा विधेयक पारित किया। सिर्फ मुल्लाओं ने यह कहते हुए इस विधेयक का विरोध किया कि इससे पतियों के पास कोई अधिकार नहीं रह जाएगा। इस कानून पर अमल करना हालांकि आसान नहीं होगा, क्योंकि पाकिस्तान के पुलिस थानों की सोच भी पुरुषवर्चस्ववादी है, जिसके मुताबिक 'घरेलू मुद्दे' घर के भीतर ही निपटाए जाने चाहिए।
सीनेट में भी एक बिल लाया गया है, जिसमें इस पर जोर है कि किसी भी औरत को वोट देने के अधिकार से वंचित नहीं करना चाहिए। अब तक चुनावों में यही देखा गया है कि खासकर गांव के इलाकों में औरतों को घर के मर्द वोट डालने के लिए बाहर नहीं निकलने देते। मलाला यूसुफजई को नोबल शांति पुरस्कार मिलने के बाद पाकिस्तान की दूसरी औरतों की भी पहचान बनने लगी है। हाल ही में डॉक्यूमेंटरी फिल्म बनाने वाली शर्मीन ओबैद-चिनॉय को दूसरा ऑस्कर पुरस्कार मिला। ए गर्ल इन द रिवर ः द प्राइस ऑफ फॉरविगनेस नामक यह फिल्म ऑनर किलिंग पर है। पाकिस्तान में यह जघन्य अपराध आज भी कायम है। पिछले चार साल में यहां ऑनर किलिंग के करीब दो हजार मामले सामने आए हैं! शर्मीन की पहली डॉक्यूमेंटरी उन लड़कियों पर थी, जिनके शरीर और मन को तेजाब डालकर झुलसा दिया जाता है। बहुत सारे लोगों ने शर्मीन की यह कहते हुए आलोचना की है कि वह दुनिया भर में पाकिस्तान की नकारात्मक छवि पेश करती है। लेकिन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ शर्मीन के प्रशंसक हैं। उन्होंने उनकी हालिया डॉक्यूमेंटरी देखने के बाद यह टिप्पणी की कि सम्मान की रक्षा के लिए की जाने वाली हत्याओं में कोई सम्मान नहीं है।
संभवतः शिक्षा का अधिकार आज पाकिस्तानी औरतों की सबसे बड़ी चुनौती है। मुझे याद है, मेरे पिता ने अविभाजित भारत के अपने एक अनुभव के बारे में बताया था, जब वह दक्षिण भारत घूमने गए थे। पख्तूनख्वा के एक गांव में जन्मे मेरे पिता पढ़ाई के लिए देहरादून गए थे। लेकिन दक्षिण भारत के अपने दौरे में पहले ही दिन सड़कों की सफाई करने वालों को अखबार पढ़ते देखकर वह चौंक गए थे। इससे पता चलता है कि उस दौर में भारत के अलग-अलग इलाकों में शिक्षा की क्या स्थिति थी। पाकिस्तान में शिक्षा को इस स्तर तक पहुंचाना अब भी एक सपना ही है। यूनेस्को का आंकड़ा बताता है कि दुनिया भर में तीस लाख किशोरियां स्कूलों से बाहर हैं। एक ऐसे समय यह आंकड़ा बहुत अधिक लगता है, जब कराची की एक और महिला नरगिस मेवालवाला ने गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज की टीम से जुड़कर इतिहास बनाया है। क्वांटम एस्ट्रोफिजिक्स की यह प्रोफेसर एमआईटी में भौतिकी की एसोसिएट विभागाध्यक्ष हैं। यह पाकिस्तान की औरत की सिर्फ एक मिसाल है, जो बताती है कि शिक्षा के अधिकार से कितना कुछ बदल सकता है।
मलाला यूसुफजई को भला कौन भूल सकता है, जिसने चौदह साल की छोटी उम्र में लड़कियों की शिक्षा के अधिकार के लिए तालिबान की गोली खाई, इसके बावजूद पीछे मुड़कर नहीं देखा और आज भी स्त्री शिक्षा की पैरोकार हैं? उसकी वह बात शायद ही कोई भूल सकता है, जिसमें उसने कहा था, 'अगर तालिबान से मेरी मुलाकात हुई, तो मैं उनसे कहूंगी कि मैं उनकी बच्चियों की शिक्षा के अधिकार का समर्थन करूंगी।'
इस प्रसंग में यह दुखद ही है कि विदेश में पढ़े पीटीआई (पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ) के इमरान खान को, जिनके अपने बच्चे भी विदेश में पढ़ रहे हैं, कभी यह ख्याल नहीं आया कि मलाला के सूबे में पढ़ाई जानी वाली स्कूली किताब में उस बहादुर लड़की की कहानी शामिल की जाए। गौरतलब है कि उस सूबे में पीटीआई सत्ता में है और जमात-ए-इस्लामी उसकी गठबंधन सहयोगी है। मुल्लाओं के पक्ष में बोलना इमरान खान की सियासत के हक में नहीं होगा। इसके बजाय उस सरकार को तो मलाला की बहादुरी का जश्न मनाना चाहिए। गैंगरेप के सदमे से उबरने के बाद अपने गांव में औरतों को शिक्षित करने के लिए एनजीओ चला रहीं मुख्तारन माई को विदेशों से खूब शाबाशी मिली, लेकिन अपने मुल्क में कम ही लोग उनके समर्थन में खड़े हुए।
नामचीन सीनेटर शेरी रहमान का मानना है कि पाकिस्तान की औरतों के लिए यह निर्णायक दौर है, जब वे अतिवादियों से लोहा लेते हुए अपने लिए जगह बनाने की कोशिश में हैं। वह कहती हैं, 'जिया-उल-हक जैसे एक शख्स ने, जिन्हें जनता ने नहीं चुना था, तख्तापलट की अपनी कार्रवाई को जायज बनाने के लिए मजहब का सहारा लिया था। पाकिस्तान ने उन्हें नहीं चुना था, इसलिए उनके कानूनों का पालन भी नहीं कर सकता। यह अवसर जिया और उनके सहयोगियों द्वारा बनाए गए महिला-विरोधी कानूनों और सामाजिक स्थितियों को नामंजूर करने के लिए यादगार है।'
बेनजीर भुट्टो, हिना रब्बानी खार, सबीन महमूद, नूरजहां, बपसी सिधवा, किश्वर नाहीद, बिलकिस ईदी, अस्मां जहांगीर जैसी महिलाओं की एक लंबी सूची है, जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में अपने कामकाज से पाकिस्तान का सिर ऊंचा किया।
लेखिका पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार हैं