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आत्मसम्मान बनाम मानहानि

Tue, 24 May 2016 10:18 AM IST
गोविंद सिंह
गोविंद सिंह Updated Tue, 24 May 2016 10:18 AM IST
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Self-esteem versus defamation
गोविंद सिंह

सर्वोच्च अदालत ने आपराधिक मानहानि कानून को बरकरार रख जहां बड़बोले नेताओं को निराधार आरोप लगाने से हतोत्साहित किया है, वहीं अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकारों को भी निराश किया है। हालांकि दोनों के संदर्भ और मकसद अलग-अलग हैं, फिर भी आज के राजनीतिक माहौल को देखते हुए यह फैसला उचित है। राजनीतिक रोटियां सेंकने और अपने प्रतिद्वंद्वियों से निपटने के लिए नेतागण आज कुछ भी आरोप लगा देते हैं। संयोग से हमारे समय के तीन सर्वाधिक मुखर राजनेता अरविंद केजरीवाल, सुब्रमण्यम स्वामी और राहुल गांधी ने सर्वोच्च अदालत के समक्ष गुहार लगाई थी कि ‘मानहानि सिद्ध होने पर उन्हें सिर्फ जुर्माना किया जाए, सजा न दी जाए। मानहानि को अपराध न माना जाए’।

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इन तीनों नेताओं के खिलाफ दिल्ली की निचली अदालतों में अपने प्रतिद्वंद्वियों पर अनाप-शनाप आरोप लगाने के लिए मुकदमे चल रहे हैं। आरोप लगाते समय सोचा नहीं कि जो आरोप वे लगा रहे हैं, उन्हें साबित किया जा सकता है या नहीं, इसलिए अब, जब अदालत में आरोप सिद्ध करने में इन्हें नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं, तो न्यायालय से गुहार लगा रहे हैं कि उनकी सजा कम की जाए।
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अपने यहां प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ कुछ भी आरोप लगाने की नेताओं को आदत-सी पड़ गई है। पहले कुछ बड़बोले और मसखरे किस्म के नेता ही ऐसे आरोप लगाते थे, लिहाजा उन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेता था। पर जब जिम्मेदार नेता विरोधियों के खिलाफ निराधार आरोप लगाते हैं, तो जनता उन पर विश्वास कर लेती है। प्रचार माध्यम भी आरोपों की तस्दीक किए बिना इन्हें प्रकाशित-प्रसारित कर देते हैं। इस आलोक में शीर्ष अदालत का निर्णय स्वागतयोग्य है।
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दूसरा पक्ष चाहता है कि अभिव्यक्ति पर लगाम न लगे। दुनिया भर में मानहानि को कानून के दायरे से बाहर करने की मुहिम चली है। इंटरनेट पर भड़ास निकालने वाले इसकी अगुवाई कर रहे हैं। पिछले वर्ष भारत में सूचना प्रौद्योगिकी की धारा 66-ए को समाप्त करवाकर इन्होंने एक बड़ी लड़ाई जीती है। मीडिया का एक वर्ग भी चाहता है कि मानहानि कानून समाप्त हो या इसकी धार कुंद की जाए, क्योंकि नेताओं, नौकरशाहों और सरकारों के खिलाफ बोलने वालों पर ही नहीं, बोले हुए को छापने वाले मीडिया पर भी खतरा मंडराता है। भारतीय दंड संहिता की धारा 499 और 500 को उतना क्रूर नहीं माना जाता। धारा 499 में मानहानि का अर्थ स्पष्ट किया गया है, तो धारा 500 में मानहानि करने पर दंड का प्रावधान है।499 के मुताबिक दुर्भावना के साथ बोले गए या लिखे गए शब्दों या चित्रों या संकेतों द्वारा लांछन लगाकर किसी व्यक्ति की इज्जत या ख्याति पर हमला किया जाता है और उससे उस व्यक्ति की प्रतिष्ठा पर बुरा असर पड़ता है, तब मानहानि होती है, जो विधिक तौर पर दंडनीय अपराध है। व्यक्ति का अपराध साबित हो जाने पर दो वर्ष की सजा का प्रावधान है।


अरविंद केजरीवाल का कहना था कि अंग्रेजों के इस कानून को खत्म कर देना चाहिए। आजादी के बाद इंदिरा गांधी ने भी आपातकाल में व्यक्तियों और प्रेस के खिलाफ इसे ढाल की तरह इस्तेमाल किया था। खुद केजरीवाल ने सत्ता में आते ही मीडिया को इन कानूनों की घुड़की दिखाई थी। बेशक यह औपनिवेशिक युग का कानून है, पर संविधान के अनुच्छेद 21 के मुताबिक़ आत्म-प्रतिष्ठा भी व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। इसलिए बेलगाम होते लोगों को नियंत्रण में रखने के लिए कुछ प्रावधान तो होना ही चाहिए।

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