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पब्लिक का जेलयोग कब आएगा?

Sun, 08 Sep 2013 03:44 PM IST
यशवंत व्यास
यशवंत व्यास Updated Sun, 08 Sep 2013 03:44 PM IST
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yashwant vyas article

हर बड़े आदमी को जीवन में एक बार जेल जरूर जाना चाहिए। छोटे और मामूली आदमी तो जेल में डाले-निकाले जाते रहते हैं। भले लोगों को जेल से बड़ा डर लगता है। वे सोचते हैं, अगर एक बार चौबीस घंटे भी हवालात में रह लिए तो जीवन पर दाग लग जाएगा।

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पुलिस इतनी विनम्र और भली है कि उनकी इस भावना को गहरे तक समझते हुए रिश्वत का रेटकार्ड प्रकाशित कर देती है। जो इसे पढ़ नहीं पाते वे घबराहट में ही मर जाते हैं। जो बड़े आदमी हैं, वे गलती से फंस जाएं, तो अंतत: घर को ही जेल बना डालते हैं।
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हमारे एक रसूखदार पत्रकार साथी थे (पत्रकारों में भी रसूख के आधार पर पर्याप्त वर्गीकरण उपलब्ध हैं)। वे ज्योतिषियों के इतने परम मित्र थे कि सारी खबरें उनके ही जरिए ब्रेक होने लायक बनती थीं।
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एक ज्योतिषी ने उन्हें कुंडली देखकर बताया कि निकट भविष्य में जेल जाने का योग है। वे उठे, थानेदार को फोन किया और हवालात खुली रखने को कहा। थाने गए, हवालात में घुसे और कहा, बाहर से एक बार बंद करो। कुछ मिनट दीवारें देखीं और हवालात से बाहर आ गए। थानेदार थर-थर कांप रहा था, 'क्या आपने दीवार में बना सुराख देख लिया? खबर मत बनाना। वे हंसे, 'मैं सुराख से नहीं, मुख्य दरवाजे से आता-जाता हूं।

फिर थानेदार की कुर्सी पर बैठकर आतिथ्य ग्रहण करते हुए बताया, 'जेल का योग था। दूर कर लिया। एक बार भीतर जाकर बाहर आ गया, कुंडली का हिसाब बराबर। अब कोई चिंता नहीं। कई सालों बाद वे एक बार भृगुसंहिता वालों के पास पहुंचे। उन्होंने हाथ रखकर कुंडली दिखाई, पता चला कुंडली ही गलत बनी थी।

वे आज तक डरे हुए हैं कि गलत योग को निष्फल करने के लिए उन्होंने हवालात क्यों काटी थी? क्योंकि उसी कुंडली के भरोसे वे राजयोग की प्रतीक्षा कर रहे थे।

वंजारा जैसे आईपीएस अफसर हों या आसाराम जैसे बापू! ज्ञान चक्षु केवल जेल में खुलते हैं। संजय दत्त की सारी मासूमियत जेल से ही उद्घाटित होती है। इसीलिए हमारे नेता सुप्रीम कोर्ट के आदेश से इतने विचलित हो गए, कानून ही बना डाला। कोर्ट कहती है, जेल गए आदमी को चुनाव लड़ने लायक नहीं मानना चाहिए, पार्टियां कहती हैं, जेल से ही जीवन बनता है।

दरअसल, सारे कंस जेल का निर्माण करना चाहते हैं, लेकिन जब उन्हें खुद जेल जाना पड़ जाए, तो वे कृष्ण हो जाते हैं। चूंकि कृष्ण और कंस की राशियां एक हो सकती हैं, इसलिए मुस्तैद खुफिया एजेंसियां डायरी में सिर्फ अंग्रेजी का 'के' अक्षर बरामद करती है।

संदेह का यह 'के' तमिलनाडु से हरियाणा होता हुआ दिल्ली में पहुंचता-पहुंचता सुविधानुसार कृष्ण या कंस की प्रेस रिलीज में तब्दील हो जाता है। पब्लिक सोचती रह जाती है कि यह 'के' किसका था और इस बीच एक और नया घपला हो जाता है।

कुछ लोग यह सुझाव दे रहे हैं कि प्रत्येक पार्टी को एक जेल-सेल बनाना चाहिए। इसकी जिला स्तर पर इकाइयां स्थापित करनी चाहिए। इस सेल का काम होगा, जेल के अनुभव को विस्तार देना।

जो नेता जेल जा चुके हैं, जो अफसर जेल भुगत चुके हैं या जो अभिनेता जेल में आते-जाते रहते हैं, उन्हें यहां प्रशिक्षक के बतौर लाया जाएगा। ये उन कॉरपोरेट घरानों के प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित करेंगे, जिनके चंदे से पार्टियां चलती हैं।

जेल मैन्युअल, खाना, मच्छर, कूलर, अस्पताल, जमानत, हेल्थ, योग, मालिश, मेवे और अन्यान्य किस्म की व्यवस्थाओं में पारंगत कार्यकर्ता जब यहां से प्रशिक्षित होकर निकलेंगे, तो कोई जेल उनके लिए जेल नहीं रह जाएगी। उन्हें कोई बेवकूफ नहीं बना सकेगा कि किस आधार पर उन्हें फलां चीज हासिल नहीं हो सकती।

वे पार्टी के ऐसे सेवक होंगे, जो जेल के खेल में यासीन भटकल से लेकर अफजल और कसाब तक जीकर दिखा सकेंगे। वे बाबाओं के प्रवचन दे सकेंगे, लीलाओं का मंचन कर सकेंगे और क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड से लेकर भारतीय ओलंपिक संघ तक झंडे फहरा सकेंगे।

पब्लिक को यह आइडिया पसंद आ सकता है। आखिर वह रामलीला मैदान, जंतर-मंतर से लेकर कॉमनवेल्थ और कोलगेट की फाइलों के गायबीकरण तक के चमत्कार को नमस्कार करती रहती है।


बॉक्स ऑफिस के महारथी फिल्मकारों में ऐसी मान्यता है कि फिल्मों में जब तक बलात्कार का दृश्य चलता रहता है पब्लिक बलात्कारी की भूख के साथ होती है, जब हीरो का प्रवेश होता है, तो वह पाला बदल कर उसके साथ हो जाती है और जीत पर तालियां बजाने लगती हैं। न वह खलनायक की तरह पिटती है, न नायक की तरह पीटने की जहमत उठाती है। अलबत्ता सीन के क्लाइमेक्स में तालियां जरूर बजाती है।

पेट्रोल-डीजल, बिजली-पानी, सब्जी-अनाज आदि-इत्यादि अब जेल में ही मिलेंगे। पब्लिक को देश के जेल में तब्दील होने तक इंतजार करना चाहिए।

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