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फिर छिड़ी बात सट्टे की

Sat, 09 Nov 2013 08:18 PM IST
यशवंत व्यास
यशवंत व्यास Updated Sat, 09 Nov 2013 08:18 PM IST
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yashwant vyas article

एक्जिट पोल या ओपिनियन पोल से ज्यादा तगड़ी चीज सट्टा है। मेरे एक साथी ओपिनियन पोल के रिजल्ट पर सट्टा लगाकर तीन लाख जीत गए। उन्होंने मेरे कहे पर भरोसा कर लिया, वर्ना डूब जाते। मैंने भी वैसे ही कहा था। मैं कुछ और कह जाता, तो हो सकता है कि वे तीन लाख से पिटे हुए नजर आते। सट्टा बाजार चीज ही ऐसी है। वे दावा करते हैं कि सरकारें आजकल बनती ही सट्टा बाजार से हैं। सट्टा न हो तो सरकार बनना मुश्किल हो जाए। सत्ता का खेल सट्टे के नियमों से चलता है। उनकी चिंता है कि नई सरकार सट्टे को संभालने के लिए किसी को पृथक प्रभार दे दे ताकि तमाम चिंताएं मिटें। ओपिनियन पोल से ज्यादा सही चीज सट्टा बाजार है। सट्टा और सत्ता में साझा है।

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अब देखिए न। एक राज्य में सरकार किसकी बनेगी, इस पर सट्टा बाजार ऊब-चूभ हो रहा है। सत्ता में साझे के लिए एक महारथी ने कहा, 'पैकेज पर बात हो सकती है। यह पैकेज खतरनाक चीज है? सट्टा बाजार के हमारे विशेषज्ञ कहते हैं, 'पैकेज, सट्टा बाजार का गणित गड़बड़ा सकते हैं। सट्टे से बड़ा सट्टा, सत्ता खेल जाती है। अगर पैकेज में तमाम विधायकों को निगमों का अध्यक्ष या कोई मंत्रालय पकड़ा दिया गया तो सारे अनुमान ध्वस्त हो जाएंगे। कई ईमानदार सट्टेबाज पिट जाएंगे।
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सट्टे वाले इन दिनों मेरे संपर्क में ज्यादा आने लगे हैं। जब आपके बारे में विशेषज्ञ होने का भ्रम फैल जाता है तो आपको सट्टे वाले भी संपर्क करते हैं। या यों कहें कि अमूमन सट्टे वाले ही ज्यादा संपर्क करते हैं। चूंकि राजनीति, साहित्य, कला, संस्कृति, खेल आदि में सट्टेबाजों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना शुरू हो गया है इसलिए यह स्वाभाविक ही है कि खेल के ही नहीं, सट्टे के नियम उधर भी लागू हैं। इसीलिए हर इलाके के सट्टेबाज आपके पास आते हैं। सट्टे में विशेषज्ञता के साथ लगातार संदेह के लिए भी जगह बनानी होती है।
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'इस जटिलता को देखते हुए अखबार वालों से मिलना सट्टा-विशेषज्ञों को राहत देता है। मीडिया और सत्ता के संबंध पर जब भी सेमिनार हो, मीडिया और सट्टे के अंतर्सम्बंध पर भी एक सत्र होना चाहिए। इससे न सिर्फ सेमिनारों की इज्जत बढ़ेगी, बल्कि हम सट्टे वालों को भी कुछ अकादमिक सलाह मिल जाएगी', एक सट्टावीर ने बताया।

सट्टावीर और सत्तावीर, दोनों ही शौर्य के लिए विख्यात हैं। अपनी जान हथेली पर लेकर चलते हैं। दोनों एक-दूसरे को इज्जत की निगाह से देखते हैं और एक-दूसरे की सद्भावना से खेलते हैं। मुझे जब कोई सत्तावीर मिलता है तो पूछता है, 'आपका क्या अनुमान है? जब कोई सट्टावीर मिलता है तो भी पूछता है, 'आपका स्पेक्युलेशन क्या कहता है? बाद में, जब दोनों चले जाते हैं तो मुझे लगता है, एक को दूसरे के विपरीत अनुमान बता देता तो फायदे में रहता। सट्टा बाजार, सत्ता बाजार से लड़ जाता और जनता का फायदा हो जाता।

पर जनता भी क्या करे? वह आम चुनकर भेजती है, सरकार अमरूद की हो जाती है। पैकेज सिस्टम दोनों को एक-दूसरे से बदल देता है। सरकार बनाने में जितनी देरी होती है, पैकेज उतना ही भारी हो जाता है। जो पैकेज भारी पड़ जाता है, वही सरकार बनवा देता है। फिर सेक्युलर सट्टा, कम्युनल सट्टा, विदेशी-स्वदेशी सट्टा और लोकल मटका-सट्टा अपनी-अपनी भूमिकाएं बदल लेते हैं। अखबार वाले नई टिप्पणियां लिखते हैं, नए फोटो तलाशते हैं। टीवी वाले फिर धंधा चमकाने में लग जाते हैं।


इन सबके बावजूद एक बात तय है। लोकल सट्टे में ज्यादा विश्वसनीयता है। वह जो नंबर, ओपन या क्लोज में खोलता है, वह अंतिम नंबर होता है। उसमें निर्धारित भाव से बिना रसीद, जीता पैसा भी मिल जाता है। मगर सत्ता के सट्टे में हर मिनट में नंबर बदल सकता है। यह सट्टा न सिर्फ अधिक चुनौतीपूर्ण है, बल्कि नंबरियों के लिए भय का कारण भी पैदा करता है। जब भी साझा सरकारें अपने नए विधायी कार्यों को शुरू करें सट्टा बाजार की गुजारिश है कि इस पर कुछ गौर किया जाए। सट्टा बाजार की टीवी चैनलों से गुजारिश है कि निर्मल बाबा जैसे कार्यक्रमों में नंबरों की एक पट्टी भी चलाया करें। अभी तो चार राज्य हैं, दिल्ली तक आते-आते अच्छा धंधा हो जाएगा।

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