फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   yashwant vyas article

सुपर लीडर राहुल जी को ग्राम-पोस्ट अंधेरिया से एक चिट्ठी

Sat, 05 Oct 2013 07:50 PM IST
यशवंत व्यास
यशवंत व्यास Updated Sat, 05 Oct 2013 07:50 PM IST
विज्ञापन
yashwant vyas article

परमश्रेष्ठ श्री राहुल भैया,

विज्ञापन


हमने जबसे आपको टीवी पर बांहें चढ़ाकर बोलते देखा, तबसे छोटी बांहों का कुर्ता सिलवा लिया है। बांहें वही चढ़ा सकता है, जिसके पास लंबी आस्तीनें हों। हमारी आस्तीनों की लंबाई तो मुलायम सिंह जी और सीबीआई के बीच भी नहीं पहुंचती। लिहाजा, हम छोटी बांहों से हाथ निकालकर आपके भरोसे जीवन पथ पर चल पड़े हैं।

आपने गजब काम किया। आप हमेशा गजब काम ही करते हैं। एक बार आप दिग्विजय सिंह जी की मोटरसाइकल से नोएडा इलाके में पहुंचे और बताया कि कितने फिट ऊंचा राख का ढेर लगा पड़ा है। तब भी आपके फीते ने मरने-जलने वालों को सिर से पैर तक नापकर रख दिया था। फिर आपने समाजवादी पार्टी के घोषणा पत्र को मंच से फाड़कर फेंका, तो पब्लिक उन चिंदियों को आखिरी दम तक खोजती रही। यह खोज तब पूरी हुई जब यूपीए की उपलब्धि का चित्र जारी करते हुए समाजवादी पार्टी के नेताजी आपके सह-जनों के साथ मुस्कुराते हुए चित्रों में खिंच गए। अब वे आय से अधिक माल के मामले में भी मुक्त हो चुके हैं। चिंदियां, रिसाइकल होकर किसी मैनीफेस्टो के नए कागज बनाने के काम आ रही होंगी।
विज्ञापन


हे युवाश्रेष्ठ, आप कभी-कभार किसी महान कलावती की मिसाल देते हैं, तो उसका खोजना मुश्किल हो जाता है। आप वैसे भी पहेलियां तो मुश्किल ही खड़ी करते हैं। अभी आपने दागियों को बचाने वाला अध्यादेश अपनी पार्टी में देखते-देखते प्रेमपूर्वक पास कराया। फिर जब राष्ट्रपति भवन में मामला ऊपर नीचे हो रहा था, आप यकायक घाट पर प्रकट हुए और नीतीश की तारीफों के बीच आपने अपने पार्टी प्रवक्ता के वचनों की छाती पर अचानक पैर रखकर उद्घोष किया। दो सेकंड में अध्यादेश बकवास होकर निपट गया।
विज्ञापन
विज्ञापन


अद्भुत! क्या चमत्कार!! साख फटना और साख सिलना जहां से होता है, वहां फाड़ा-फाड़ी का राजनीतिक ज्योतिष इतना प्रबल होता है, यह जानकर आपके प्रति मस्तक श्रद्धा से झुक गया है।

हां, कुछ सिरफिरों को लगता है कि यह संविधान का 'हुर्रा' है। कोई और होता तो पार्टी की अनुशासन समिति ही उसका बंटाधार कर देती। लेकिन अनुशासनहीनता नामक बाज या तो किसी आउटडेटेड नेता पर टूटता है या किसी निरीह प्राणी पर। आपके प्रेमी आडवाणी जी भी यह जानते हैं, इसलिए वे भी इस बाज की आंखों पर अपनी ब्रांड की पट्टी बंधवाए घूमते हैं। आप दो ही तो महान हुए, जो अगर पत्थर भी फेंकें तो भी इश्क का मुजाहिरा लगता है।

पर छोड़िए भी! आडवाणी जी की पार्टी में आडवाणी जी के बावजूद, आडवाणी जी दरअसल पूरी पार्टी नहीं हैं। इसलिए, हमें आप पर पक्का भरोसा है, क्योंकि आप जहां खड़े होते हंै, पार्टी वहां से शुरू होती है।

हमें बाबूभाई मिस्त्री की ट्रिक फोटोग्राफी वाला ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा याद आता है, जब सब निपट जाता था तब एक ट्रिक से नकली कमल पर प्रभु अवतरित होते थे। आप तो मिस्त्री युग से इंजीनियर युग में पहुंचे हुए पुरुष हैं, लिहाजा आप किसी कंपनी के चैयरमेन की तरह प्रकट होते हैं और सीईओ या फाइनेंस कंट्रोलर की धुलाई कर डालते हैं।

एक बार एक नामी कंपनी के मालिक के कहने पर सीईओ ने एक अफसर को करोड़ों की घूस देने की व्यवस्था की, मगर मूर्खतावश पकड़ा गया। इस घूस से कंपनी को भारी मुनाफा होना था। तब चेयरमैन ने तत्काल प्रभाव से सीईओ को एंग्री यंगमैन शैली का नैतिक भाषण देते हुए बर्खास्त कर दिया। चेयरमैन साहब तो सर्वकल्याणकारी ईमान के पुतले और सच्चे भाग्यविधाता थे। जाहिर है, मुनाफा होता तो कंपनी का, जेल थी तो सीईओ की। जो कायदे से रिश्वतें भी न दे सकें, ऐसे सीईओ किस काम के?

हे सपनों के राजकुमार! सुना है आप हमारे सपनों के लिए अपने सपने कुचलना चाहते हैं। निवेदन है कि आपके अपने सपनों में हमारी भलाई के सपने भी यदि आते हों, तो पूरा रोड रोलर उन पर भी मत चला दीजिएगा। आखिर, ख्वाब तुम्हारे हैं, पर नींद तो हमारी है।

कॉमनवेल्थ के वक्त सुरेश कलमाड़ी को, कोलगेट के वक्त आपके दिलदार साथियों को, टूजी-थ्रीजी के वक्त आपके प्रिय सखाओं को आपके सुपर पॉवर का पता क्यों नहीं चला, यह अब तक रहस्य का विषय है। हमें विश्वास है कि जब गुड़गांव से बीकानेर की धरती तक आपके मित्रों का यश फैला, तब आप अपने सुपर हीरो का चोगा वार्डरोब में टांगकर संभवत: विश्राम कर रहे होंगे, वर्ना दूर-दूर तक किसी प्रदेश में यदि कोई मुख्यमंत्री हिलता है, तो पब्लिक कहती है, सीधे रहो, वर्ना राहुल आ जाएंगे।

मैं यह बताना तो भूल ही गया कि मैं ग्राम पोस्ट अंधेरिया से जब यह चिट्ठी लिख रहा हूं, तब हमारे यहां पांचवी का एक बच्चा जिद कर रहा है कि दस, जनपथ से रोशनी के दो-चार सिलेंडर क्यों नहीं उठा लेते, ताकि अंधेरिया, उजाले में बदल जाए? मैं उससे कह रहा हूं, इसके लिए हमें अंधेरिया को रायबरेली-अमेठी के उस जनरेटर से जोड़ना पड़ेगा, जो डिम्पल यादव के निर्विरोध कन्नौज-बल्ब को जगमगाता है। बच्चा मानने को तैयार नहीं है। वह कहता है, मैं झूठ बोलता हूं। उसका कहना है, जब प्रधानमंत्री भी दस जनपथ से रोशनी लेते हैं, तो हमारे गांव के प्रधान को वहां से थोड़ी रोशनी चुराने में कौन-सा कलंक लग जाएगा?

आप तो जानते ही हैं, बच्चे कलंक-कथा और उजली-कथा की बातें किताबों में पढ़ते हैं और बेकार की जिद पर उतर आते हैं। प्याज, पेट्रोल, घोटाले, जमीनें, हवाईजहाज आदि की अक्षरमाला में उन्हें 'चुनी हुई नैतिकता', 'चुनी हुई भावुकता' और 'चुनी हुई बहादुरी' का व्याकरण फिट करना नहीं आता। उन्हें समझ में नहीं आता कि प्रधानमंत्री कौन है और देश को चलाने वाला कौन है? वे अभी-अभी पिता मनोजकुमार की 'पूरब-पश्चिम' से शाहरुख खान की 'चेन्नई एक्सप्रेस' में कूदे हैं। वे कन्फ्यूज्ड हैं कि, जब राहुल भैया के कहने से ऑर्डिनेंस फट सकता है, तो उनके रहने के बावजूद वह बन कैसे गया? वे संदेह में पड़े हैं कि प्रति सप्ताह एक घोटाले और महंगाई पर राहुल भैया अलादीन का चिराग क्यों नहीं घिसते? जो हो रहा है, वह आपका किया हो रहा है, जब सब हो जाएगा, तब भी आपका किया होगा। पर तब आप प्रकट होंगे कि मैं इसे उलट कर ठीक करता हूं। वह बेला कब आएगी जब वे 'आप हो जाएंगे, जो आपको 'आप बनाने के लिए 'हम को 'आप किए बैठे हैं।

मेहरबानी करके आप बच्चे की इस बेवकूफी पर ध्यान मत दीजिए।

यहां अंधेरिया में सब कुशल है, क्योंकि रोशनी नहीं पहुंची है। रोशनी पहुंचेगी तो टेंडर पहुंचेंगे, टेंडर पहुंचे तो ब्रोकर पहुंचेंगे, ब्रोकर पहुंचेंगे तो फिर आपकी जरुरत पड़ेगी। आप आए तो फोटो की फ्लैश चमकेगी और फिर रोशनी का क्लेश होगा।


आप तो बस दिल्ली ठीक रखिए। हम लकड़ी रगड़कर आग जला लेंगे और गुजारा कर लेंगे। रोशनी भी हो जाएगी, दलिया भी पक जाएगा। बाकी तो क्या कहें, एक बिल्डर हमारा खेत उठा ले गया है। और सब मंगल है।

आपका
गलतियों से भरा वोटरकार्ड लिए खड़ा
'सिटीजन ऑफ अंधेरिया'

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed