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हुंकार भरी हिमालय ने
अनिल प्रकाश जोशी
Updated Mon, 05 Aug 2013 08:56 PM IST
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उत्तराखंड की त्रासदी के जरिये इस बार हिमालय ने साफ कर दिया है कि एक सीमा से अधिक छेड़छाड़ उसे स्वीकार नहीं। सरकारी पक्ष इसे स्वीकारने को तैयार नहीं कि यह आपदा मानवजनित है। पर सच यह है कि हम जितनी जल्दी यह सच स्वीकार कर लेंगे, उतनी ही जल्दी भविष्य की घटनाओं के प्रति तैयार भी हो लेंगे और त्रासदी की पुनरावृत्ति पर अंकुश लगा पाएंगे।
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छोटे-छोटे टुकड़ों में हिमालय और प्रकृति ने अपना रौद्र रूप पहले भी जाहिर किया था। मगर उनकी अनदेखी कर हम अपनी मनमानी पर ही उतारू रहे। नतीजा रहा, हजारों की संख्या में मौतें, सैकड़ों गांव बेघर और भयानक उथल-पुथल।
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दरअसल हम हिमालय को समझने में चूक कर रहे हैं। इसे मात्र मिट्टी, जंगल, नदी और बर्फ के ढेर से ज्यादा कुछ समझा नहीं गया। नदियों से बांध व बिजली, वनों से काष्ठ उद्योग और पहाड़ों से खनन तक की ही समझ हमने हिमालय के प्रति बना रखी है। हिमालय के संसाधनों के लगातार दोहन ने उसके धैर्य को ही ललकार दिया, जिसका नतीजा सामने है।
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हिमालय तो अभी बनने की ही स्थिति में है। इसका निर्माण पूरा भी नहीं हुआ और हमने इस पर अपनी हुकूमत शुरू कर दी। हिमालय विश्व का एक अनोखा पारिस्थितिकी तंत्र है, जिसके संवेदनशील तार एक-दूसरे से इस तरह गुंथे हुए हैं कि एक से छेड़छाड़ का असर दूसरे पर भी पड़ता है। मसलन, वनविहीन होती हिमालय शृंखलाएं मिट्टी-चट्टानों को छोड़ देती हैं और नदी की क्षमता व बहाव में परिवर्तन हो जाता है
इसी त्रासदी को लें, तो बादल फटने की घटना या अतिवृष्टि तब हुई, जब मानसून ने अपने कदम भी नहीं रखे थे। जब पृथ्वी लगातार गरम होती चली जाती है और वाष्पोत्सर्जित होकर धरती का पानी वाष्प बनकर वातावरण में पहुंच जाता है, तो उसे बरसने में ज्यादा समय इसलिए लगता है, क्योंकि दिन और रात के तापक्रम में ज्यादा अंतर नहीं होता। गर्मी से लगातार होता वाष्पोत्सर्जन और उसका बराबर न बरसना ही बादल फटने जैसी घटनाओं को जन्म देता है।
दरअसल पहाड़ों में अत्यधिक हलचलों से भी स्थानीय तापक्रम बढ़ा, जिसने बनते बादलों को बरसने से रोका। इस बढ़ते तापक्रम का दोषी कौन है? वस्तुतः मानवीय अतिक्रमणों ने ही धरती के तापक्रम में वृद्धि को जन्म दिया। यह मान लेना चाहिए कि किसी भी तरह के विकास की कीमत प्रकृति को ही चुकानी पड़ती है। हमने आर्थिक विकास के आगे पर्यावरण को सिरे से नकार दिया।
उत्तराखंड की यह त्रासदी कई प्रश्नों के जवाब अवश्य ढूंढेगी। पहला बड़ा सवाल यह कि वर्तमान विकास का हमारा मॉडल कितना सामयिक है, खास तौर से तब, जब इसमें पारिस्थितिकी और पर्यावरण की कोई जगह ही न हो। पिछले सौ वर्षों में हिमालय के बदलते हालात नए विकास मॉडल के सापेक्ष कितने बदले हैं? हिमालय को लेकर हमारी गंभीरता कितनी सार्थक है? और क्या हम लगातार ऐसे ही इन त्रासदियों को निमंत्रण देते रहेंगे?
अब यही प्रश्न हमारा भविष्य तय करेंगे। अगर अब भी हमने कुछ नहीं सीखा, तो इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति तय है। हमारे नीति-नियंताओं को भी इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि क्या सरकार के मुट्ठी भर लोग इस देश के अरबों लोगों पर अपनी वे नीतियां थोपेंगें, जो पूरे देश और समाज को भ्रमित विकास की ओर ले जाती हैं।
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन विपदाओं को गांव और गरीब ही झेलते हैं, क्योंकि वर्तमान मॉडल शहरों के हित में ज्यादा हैं और इनके दुष्परिणाम गांवों के ही हिस्से में आते हैं। जबकि पर्यावरण को बिगाड़ने में उनका हाथ प्रायः न के बराबर है। बड़ा दुर्भाग्य यह भी है कि विकास की रूपरेखा तैयार करने में गांवों के विचार व धारणाओं का कोई स्थान नहीं होता। अगर ऐसा होता, तो शायद जंगल, मिट्टी, पानी और हिमालय की पुख्ता सुरक्षा के इंतजाम रहते।
अब एक बात समझ में तो आनी ही चाहिए कि हिमालय के प्रकोप से कोई नहीं बच पाएगा, चाहे वह हिमालय से सीधे जुड़ा हुआ न भी हो। हिमालय के साथ होती लगातार छेड़छाड़ हममें से किसी को नहीं बख्शने वाली। बांधों की कतार, जंगलों की अनदेखी और नदियों के गला घोंटने को अब हिमालय बर्दाश्त नहीं करेगा।