किसानों का नाम, कंपनियों का काम
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राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा है कि खुदरा व्यापार में विदेशी कंपनियों को इजाजत देने का फैसला किसानों के हित में लिया गया है, और ऐसा करने से आर्थिक सुधार कार्यक्रमों में गति आएगी। ऐसा लगता है कि अचानक ऊपर बैठे महानुभावों में देश के किसानों के लिए मोहब्बत और हमदर्दी उमड़ने लगी है। यह वही प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने बड़ी संख्या में किसान आत्महत्याओं के बावजूद कई वर्षों तक उस पर कोई ध्यान देने, वहां जाने या उनके परिवारों से मिलकर हमदर्दी जताने की जरूरत नहीं समझी, और जब वह विदर्भ गए, तो भी उनका पैकेज किसानों की खुदकुशी के सिलसिले को रोकने में विफल रहा। क्या अचानक उनका हृदय-परिवर्तन हो गया है?
प्रधानमंत्री ही नहीं, उनकी मंडली के अन्य सदस्यों, ऊंचे अफसरों, चोटी के उद्योगपतियों-पूंजीपतियों और विदेशी विशेषज्ञों ने भी एक स्वर में राग अलापना शुरू कर दिया है कि खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी के आने से किसानों का भला होगा। नई तकनीक आएगी, नए कोल्ड स्टोरेज और आधुनिक गोदाम बनेंगे, तो बरबादी नहीं होगी, बिचौलिये खत्म होंगे, नए रोजगार पैदा होंगे, आदि-आदि। इन दावों में कितनी सचाई है, इसकी जांच अभी तक के अनुभव से की जा सकती है।
जिन देशों में ये बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय खुदरा कंपनियां कई वर्षों से काम कर रही हैं, क्या वहां किसानों को फायदा हुआ है? सच यह है कि यूरोप-अमेरिका में किसान तेजी से खत्म होते जा रहे हैं। जो बचे हैं, वे इन कंपनियों के कारण नहीं, बल्कि वहां की सरकारों द्वारा दिए जा रहे भारी कृषि अनुदानों के कारण बचे हैं। ये अनुदान हमारी सरकार द्वारा दिए जा रहे अनुदानों से कई गुना ज्यादा है। हमारी सरकार तो नव उदारवादी नीतियों के चलते उलटे अनुदानों को कम करने पर तुली है। डीजल कीमतों में ताजा बढ़ोतरी भी उसी दिशा में सुधारों का हिस्सा है।
वालमार्ट, केरीफोर, टेस्को जैसी जिन विशाल विदेशी कंपनियों को हमारी सरकार बुलाने के लिए बेचैन है, उनके देसी संस्करण तो यहां पहले से मौजूद हैं। रिलायंस, भारती, आईटीसी जैसी बड़ी-बड़ी भारतीय कंपनियों की दुकानें नगरों-महानगरों में खुल गई हैं। हर बड़े शहर में मॉल दिखते हैं। इनसे देश के किसानों का क्या भला हुआ? क्या उनकी आत्महत्याएं रुकी? तब यह कैसे मान लिया जाए कि कई गुना बड़ी विदेशी कंपनियां आने से किसानों का कल्याण हो जाएगा?
कहा जा रहा है कि ये कंपनियां सीधे किसानों से माल खरीदकर उपभोक्ताओं को बेचेंगी। वे किसानों से करार कर सकती हैं और ठेका खेती भी करवा सकती है। लेकिन ठेका खेती का भारतीय किसानों का अनुभव अच्छा नहीं है। जब तक बाजार ऊंचा रहता है और कंपनी को फायदा होता है, तब तक वे किसानों को अच्छा दाम देती हैं। पर बाजार गिर जाने पर वे भी करार तोड़ देती हैं। ऐसी ही स्थिति में एक बार पंजाब के किसानों को अपने टमाटर पच्चीस पैसे किलो पर बेचने या फेंकने पड़े थे। इसकी वजह यह थी कि ठेका खेती के तहत किसानों से ऐसी प्रजाति के टमाटर की खेती करवाई गई थी, जो ज्यादा टिकाऊ, लेकिन स्वाद में बेकार था। वह सिर्फ सॉस के काम का था। पिछले साल बासमती चावल पैदा करने वाले किसानों के साथ भी ऐसा हुआ।
कथित सुधारों के चलते खेती में कंपनियों की घुसपैठ और उनका वर्चस्व बढ़ता जा रहा है। बीज, खाद और कीटनाशकों की आपूर्ति तेजी से उनके हाथ में आती जा रही है। बिजली क्षेत्र के कंपनीकरण और निजीकरण से बिजली आपूर्ति भी कंपनियों के हाथ में देने की तैयारी चल रही है। डीजल-पेट्रोल के विनियंत्रण से इनमें भी निजी कंपनियों का कारोबार तेजी से बढ़ेगा। कृषि उपज मंडी कानूनों को बदलकर कृषि उपज के व्यापार में भी निजी कंपनियों को प्रवेश दिया गया है। सुधारों के तहत ही सरकार समर्थन मूल्य पर खरीदी तथा राशन वितरण को सीमित या खत्म करना चाहती है। यानी देश का किसान देसी-विदेशी कंपनियों से घिरता और उन पर निर्भर बनता जा रहा है।
ऐसा नहीं है कि आज की स्थिति बहुत अच्छी है। खाद्य एवं कृषि उपज के कारोबार में आज भी कई तरह के बिचौलिये हैं। व्यापारियों द्वारा किसानों का शोषण होता है, किंतु इन लाखों बिचौलियों की जगह बहुराष्ट्रीय महा-बिचौलियों के आने से यह शोषण कम होगा या बढ़ेगा? शुरू में अपना कारोबार जमाने के लिए ये कंपनियां किसानों को कुछ बेहतर दाम दे सकती हैं, संभव है कि उपभोक्ताओं को भी कुछ सस्ता माल दिया जा सकता है। लेकिन अपने छोटे प्रतिस्पर्द्धियों को प्रतियोगिता से बाहर करने और एकाधिकारी स्थिति बना लेने के बाद वे किसान और उपभोक्ता, दोनों को लूटेंगी। आयात-निर्यात खुला होने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भी उनका वर्चस्व होने के कारण वे बाहर से सस्ता आयात करके भी हमारी कृषि उपज का दाम गिरा सकती हैं। आखिर वे भारत में अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए आ रही हैं, किसानों की भलाई के मकसद से नहीं।
कंपनियों और किसानों के हित एक नहीं है। लेकिन दुखद है कि हमारी सरकार पिछले कुछ वर्षों से कंपनियों और उनके आकाओं के हित में फैसले ले रही हैं, जनता के लिए नहीं। इस सरकार की यह गलत धारणा बन गई है कि विदेशी पूंजी ही देश का विकास करेगी। खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी बुलाने का फैसला भी इसी धारणा के तहत किया गया है।