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महिला पत्रकारों के निशाने पर इमरान, बता रही हैं मरिआना बाबर
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इमरान खान (फाइल फोटो)
- फोटो : Facebook
पाकिस्तान की पत्रकारिता के इतिहास में पहली बार महिला पत्रकारों ने एकजुट होकर प्रधानमंत्री इमरान खान और उनके समर्थकों के खिलाफ मोर्चा खोला है। वरिष्ठ महिला पत्रकारों का कहना है कि बहुत हो चुका, अब वे सत्ताधारी पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ (पीटीआई) के सोशल मीडिया ट्रोल्स के हमले सहने के लिए तैयार नहीं हैं।
हाल ही में, पत्रकारों और विश्लेषकों के सोशल मीडिया एकाउंट्स हैक करने की कोशिश हुई, साथ ही, सूचना तक उनकी पहुंच को सीमित किया गया। कुछ मामलों में हैकिंग के प्रयासों को देखते हुए पत्रकारों को अपना सोशल मीडिया एकाउंट बंद कर देना पड़ा। महिला पत्रकारों का खासकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय रहना मुश्किल हो रहा है।
इनमें से कई महिला पत्रकार अब सूचनाएं साझा करने, अपनी राय देने या ऑनलाइन सक्रियता से बचती हैं। महिला पत्रकारों पर ऑनलाइन हमले के लिए पहले सरकारी अधिकारियों द्वारा उकसाया जाता है, फिर बड़ी संख्या में ट्विटर एकाउंट के जरिये उन्हें फैलाया जाता है, जो सत्तारूढ़ दल से उनकी संबद्धता को दर्शाता है।
इन पत्रकारों ने शिकायत करते हुए कहा है, 'हमें स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अपने अधिकार का प्रयोग करने और सार्वजनिक विमर्श में हिस्सा लेने से रोका जा रहा है। जब हम आत्म-प्रतिबंध लगाते हैं, तो दूसरे लोगों को अपनी राय बनाने के लिए जानकारी हासिल करने से रोका जाता है, जो अनुच्छेद 19-ए के तहत दिए गए अधिकारों का उल्लंघन है। जब हमारे ऊपर हमले होते हैं और धमकी दी जाती है, तो हम कानून के संरक्षण का लाभ नहीं ले पाते, जैसा कि अनुच्छेद चार के तहत गारंटी दी गई है, और यह उन लोगों के कार्यों का प्रत्यक्ष परिणाम है, जो सरकारी पदों पर हैं और सत्तारूढ़ पीटीआई से जुड़े हैं।'
तमाम मीडिया समूह, एसोसिएशन और नागरिक समाज ने एकजुट होकर और महिला पत्रिकाओं का समर्थन किया है। पहली आवाज खैबर पख्तुनख्वा के सांसद मोहसिन डावर की तरफ से आई, जो पुख्तून तहफ्फुज मूवमेंट से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कहा कि ‘आलोचनाओं के जवाब में धमकी देना फासीवाद का संकेत है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास करने वाले सभी लोगों को अपने मतभेदों को अलग रखना चाहिए और फासीवादी रणनीति की निंदा करनी चाहिए। मैं सभी मांगों का पुरजोर समर्थन करता हूं। उनमें से सभी को और ज्यादा अधिकार मिलने चाहिए।’ जैसे ही पाकिस्तानी महिला पत्रकारों ने सरकार के खिलाफ एक संयुक्त बयान जारी किया, यह देखना दिलचस्प था कि इस पर पहली प्रतिक्रिया देने वालों में न सिर्फ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो थे, बल्कि सरकार की मानवाधिकार मंत्री डॉ. शिरीन मजारी भी थीं, जो पहले पत्रकार रह चुकी हैं।
महिला पत्रकारों का कहना है कि इन हमलों के निशाने पर अलग-अलग दृष्टिकोण रखने वाली महिलाएं हैं, जिनकी रिपोर्टें खासकर कोरोना से निपटने के मामले में सरकार के प्रति आलोचनात्मक रही हैं। 'सुनियोजित साजिश' के तहत न सिर्फ महिला पत्रकारों के व्यक्तिगत ब्योरे सार्वजनिक किए गए, बल्कि कुछ मामलों में उनकी तस्वीरों और वीडियो से भी छेड़छाड़ की गई।
हाल ही में इनके सोशल मीडिया एकाउंट्स को हैक करने की कोशिश की गई और सूचनाओं तक उनकी पहुंच को भी सीमित किया गया। सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर बढ़ती परेशानियों को देखते हुए कई महिला पत्रकार खुद पर प्रतिबंध लगाने के लिए मजबूर हुईं।
डॉ. शिरीन मजारी ने कहा कि ‘महिला पत्रकारों पर निशाना साधने और उनके साथ बदसुलूकी की सूचना परेशान करने वाली है। महिलाएं संवेदनशील होती हैं, इसलिए उनके साथ दुर्व्यवहार करना, कभी स्वीकार्य नहीं हो सकता। पत्रकार अपना काम करते हैं, ऐसे में, लैंगिक आधार पर महिला पत्रकारों पर अपमानजनक हमला पूरी तरह से अस्वीकार्य और घृणित है।’
पीपीपी नेता बिलावल भुट्टो नेशनल एसेंबली में मानवाधिकार समिति के प्रमुख भी हैं और उन्होंने डॉ शिरीन मजारी द्वारा तैयार मानवाधिकार संबंधी कई विधेयकों को पारित कराने में मदद की है। डॉ मजारी ने सभी पत्रकारों की सुरक्षा के लिए पहले भी एक विधेयक पेश किया है और उम्मीद है कि इसे जल्द ही कैबिनेट की मंजूरी मिल जाएगी।
बिलावल भुट्टो ने ट्वीट किया, ‘मैंने मानवाधिकार समिति के अध्यक्ष के तौर पर महिला पत्रकारों को धमकियों का संज्ञान लिया है। मैं आप सभी सदस्यों को आमंत्रित करना चाहता हूं कि इस मुद्दे पर हमारी कमेटी को बताएं।' इस समिति में सत्ता पक्ष के भी कई सदस्य शामिल हैं। तुरंत ही पत्रकारों को संसद के उच्च एवं निचली सदन के मानवाधिकार की स्थायी समिति के समक्ष सूचना देने के लिए बुलाया गया और सरकार को यह सुनिश्चित करने के लिए जवाबदेह ठहराया कि वह इस बात को माने, माफी मांगे और उन कार्यों की सूची बनाए, जो इस तरह के धमकी भरे माहौल को खत्म करने के लिए अब उठाएगी।
बुधवार की रात महिला पत्रकारों ने सरकार के समक्ष अपनी तीन मांगें रखीं-पहली, महिला पत्रकारों को बार-बार निशाना बनाने से अपने सदस्यों को रोकें। दूसरी, सभी पार्टी सदस्यों, समर्थकों और अनुयायियों को ऐसे हमले करने से रोकने के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से स्पष्ट संदेश दें। और तीसरी, सरकार के भीतर मौजूद ऐसे सभी व्यक्ति को जवाबदेह ठहराएं और उनके खिलाफ कार्रवाई करें।
एक पुरुष पत्रकार ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ‘निरंतर होने वाले ये हमले पत्रकारिता में सार्वजनिक भरोसे को कम करते हैं और लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ जाते हैं। खासकर कोरोना जैसे सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल के दौरान सटीक और विश्वसनीय जानकारी हासिल करना एक सार्वजनिक अधिकार है।’
इस बीच, शिरीन मजारी ने अमर उजाला को बताया कि उन्होंने फिर से सूचना मंत्री से 'पत्रकार संरक्षण विधेयक' को तेजी से पारित करवाने में मदद करने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि इसकी न केवल पाकिस्तान को तत्काल आवश्यकता है, बल्कि संविधान और अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत हमारा एक दायित्व भी है।
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हाल ही में, पत्रकारों और विश्लेषकों के सोशल मीडिया एकाउंट्स हैक करने की कोशिश हुई, साथ ही, सूचना तक उनकी पहुंच को सीमित किया गया। कुछ मामलों में हैकिंग के प्रयासों को देखते हुए पत्रकारों को अपना सोशल मीडिया एकाउंट बंद कर देना पड़ा। महिला पत्रकारों का खासकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय रहना मुश्किल हो रहा है।
इनमें से कई महिला पत्रकार अब सूचनाएं साझा करने, अपनी राय देने या ऑनलाइन सक्रियता से बचती हैं। महिला पत्रकारों पर ऑनलाइन हमले के लिए पहले सरकारी अधिकारियों द्वारा उकसाया जाता है, फिर बड़ी संख्या में ट्विटर एकाउंट के जरिये उन्हें फैलाया जाता है, जो सत्तारूढ़ दल से उनकी संबद्धता को दर्शाता है।
इन पत्रकारों ने शिकायत करते हुए कहा है, 'हमें स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अपने अधिकार का प्रयोग करने और सार्वजनिक विमर्श में हिस्सा लेने से रोका जा रहा है। जब हम आत्म-प्रतिबंध लगाते हैं, तो दूसरे लोगों को अपनी राय बनाने के लिए जानकारी हासिल करने से रोका जाता है, जो अनुच्छेद 19-ए के तहत दिए गए अधिकारों का उल्लंघन है। जब हमारे ऊपर हमले होते हैं और धमकी दी जाती है, तो हम कानून के संरक्षण का लाभ नहीं ले पाते, जैसा कि अनुच्छेद चार के तहत गारंटी दी गई है, और यह उन लोगों के कार्यों का प्रत्यक्ष परिणाम है, जो सरकारी पदों पर हैं और सत्तारूढ़ पीटीआई से जुड़े हैं।'
तमाम मीडिया समूह, एसोसिएशन और नागरिक समाज ने एकजुट होकर और महिला पत्रिकाओं का समर्थन किया है। पहली आवाज खैबर पख्तुनख्वा के सांसद मोहसिन डावर की तरफ से आई, जो पुख्तून तहफ्फुज मूवमेंट से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कहा कि ‘आलोचनाओं के जवाब में धमकी देना फासीवाद का संकेत है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास करने वाले सभी लोगों को अपने मतभेदों को अलग रखना चाहिए और फासीवादी रणनीति की निंदा करनी चाहिए। मैं सभी मांगों का पुरजोर समर्थन करता हूं। उनमें से सभी को और ज्यादा अधिकार मिलने चाहिए।’ जैसे ही पाकिस्तानी महिला पत्रकारों ने सरकार के खिलाफ एक संयुक्त बयान जारी किया, यह देखना दिलचस्प था कि इस पर पहली प्रतिक्रिया देने वालों में न सिर्फ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो थे, बल्कि सरकार की मानवाधिकार मंत्री डॉ. शिरीन मजारी भी थीं, जो पहले पत्रकार रह चुकी हैं।
महिला पत्रकारों का कहना है कि इन हमलों के निशाने पर अलग-अलग दृष्टिकोण रखने वाली महिलाएं हैं, जिनकी रिपोर्टें खासकर कोरोना से निपटने के मामले में सरकार के प्रति आलोचनात्मक रही हैं। 'सुनियोजित साजिश' के तहत न सिर्फ महिला पत्रकारों के व्यक्तिगत ब्योरे सार्वजनिक किए गए, बल्कि कुछ मामलों में उनकी तस्वीरों और वीडियो से भी छेड़छाड़ की गई।
हाल ही में इनके सोशल मीडिया एकाउंट्स को हैक करने की कोशिश की गई और सूचनाओं तक उनकी पहुंच को भी सीमित किया गया। सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर बढ़ती परेशानियों को देखते हुए कई महिला पत्रकार खुद पर प्रतिबंध लगाने के लिए मजबूर हुईं।
डॉ. शिरीन मजारी ने कहा कि ‘महिला पत्रकारों पर निशाना साधने और उनके साथ बदसुलूकी की सूचना परेशान करने वाली है। महिलाएं संवेदनशील होती हैं, इसलिए उनके साथ दुर्व्यवहार करना, कभी स्वीकार्य नहीं हो सकता। पत्रकार अपना काम करते हैं, ऐसे में, लैंगिक आधार पर महिला पत्रकारों पर अपमानजनक हमला पूरी तरह से अस्वीकार्य और घृणित है।’
पीपीपी नेता बिलावल भुट्टो नेशनल एसेंबली में मानवाधिकार समिति के प्रमुख भी हैं और उन्होंने डॉ शिरीन मजारी द्वारा तैयार मानवाधिकार संबंधी कई विधेयकों को पारित कराने में मदद की है। डॉ मजारी ने सभी पत्रकारों की सुरक्षा के लिए पहले भी एक विधेयक पेश किया है और उम्मीद है कि इसे जल्द ही कैबिनेट की मंजूरी मिल जाएगी।
बिलावल भुट्टो ने ट्वीट किया, ‘मैंने मानवाधिकार समिति के अध्यक्ष के तौर पर महिला पत्रकारों को धमकियों का संज्ञान लिया है। मैं आप सभी सदस्यों को आमंत्रित करना चाहता हूं कि इस मुद्दे पर हमारी कमेटी को बताएं।' इस समिति में सत्ता पक्ष के भी कई सदस्य शामिल हैं। तुरंत ही पत्रकारों को संसद के उच्च एवं निचली सदन के मानवाधिकार की स्थायी समिति के समक्ष सूचना देने के लिए बुलाया गया और सरकार को यह सुनिश्चित करने के लिए जवाबदेह ठहराया कि वह इस बात को माने, माफी मांगे और उन कार्यों की सूची बनाए, जो इस तरह के धमकी भरे माहौल को खत्म करने के लिए अब उठाएगी।
बुधवार की रात महिला पत्रकारों ने सरकार के समक्ष अपनी तीन मांगें रखीं-पहली, महिला पत्रकारों को बार-बार निशाना बनाने से अपने सदस्यों को रोकें। दूसरी, सभी पार्टी सदस्यों, समर्थकों और अनुयायियों को ऐसे हमले करने से रोकने के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से स्पष्ट संदेश दें। और तीसरी, सरकार के भीतर मौजूद ऐसे सभी व्यक्ति को जवाबदेह ठहराएं और उनके खिलाफ कार्रवाई करें।
एक पुरुष पत्रकार ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ‘निरंतर होने वाले ये हमले पत्रकारिता में सार्वजनिक भरोसे को कम करते हैं और लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ जाते हैं। खासकर कोरोना जैसे सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल के दौरान सटीक और विश्वसनीय जानकारी हासिल करना एक सार्वजनिक अधिकार है।’
इस बीच, शिरीन मजारी ने अमर उजाला को बताया कि उन्होंने फिर से सूचना मंत्री से 'पत्रकार संरक्षण विधेयक' को तेजी से पारित करवाने में मदद करने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि इसकी न केवल पाकिस्तान को तत्काल आवश्यकता है, बल्कि संविधान और अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत हमारा एक दायित्व भी है।