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औरत मार्च में निशाने पर औरत

Fri, 13 Mar 2020 07:53 AM IST
mariana babar मरिआना बाबर
Updated Fri, 13 Mar 2020 07:53 AM IST
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Woman on target in Aurat March
औरत मार्च

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना वायरस को वैश्विक महामारी घोषित कर दिया है, लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं, जो सोशल मीडिया पर इसको लेकर चुटकुले बना रहे हैं, जबकि दुनिया भर से हजारों मौत की खबरें हैं। 'मौत भी आई तो मेड इन चाइना'-सोशल मीडिया पर आई यह टिप्पणी इस समय चर्चा में है, क्योंकि हर वह चीज जो उपभोक्ता इस्तेमाल करते हैं, आम तौर पर वे 'मेड इन चाइना' होती हैं। यह अलग बात है कि अब चीन ने कोरोना वायरस पर एक हद तक काबू पा लिया है और वहां इस मामले में कुछ प्रगति हुई हैं, जबकि शेष दुनिया, विशेष रूप से ईरान और इटली में यह नियंत्रण से बाहर हो गया है।


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पिछले पखवाड़े में पाकिस्तान में दो महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं। इनमें से एक हिंदुओं द्वारा मनाया गया होली का त्योहार था, जिसमें गैर-हिंदू लोग भी शामिल हुए। रंगों के त्योहार के इस अवसर पर रावलपिंडी के कृष्ण मंदिर में भारी भीड़ देखने को मिली, जहां इस्लामाबाद से भी हिंदू श्रद्धालु आए थे। हालांकि इन दोनों शहरों में पुराने मंदिर भी हैं, लेकिन वे चालू नहीं हैं। अब जैसे-जैसे हिंदुओं की आबादी बढ़ रही है, सबको समायोजित करने के लिए एक नया और बड़ा मंदिर बनाने की योजना है।

इसी बीच 'औरत मार्च' में शामिल होने के लिए पूरे मुल्क में हजारों की संख्या में महिलाएं घरों से बाहर निकलीं। इस मार्च में शामिल होने वालों की संख्या हर साल बढ़ रही है, क्योंकि न केवल महिलाएं, बल्कि पुरुष व बच्चे भी अपने सांविधानिक और धार्मिक अधिकारों के लिए सड़कों पर आंदोलन करने उतरते हैं। पूरी दुनिया इस दिन को महिला दिवस के रूप में मनाती है। लेकिन पाकिस्तान में आम लोगों और दक्षिणपंथी कट्टरपंथियों के बीच का विभाजन इस्लामाबाद में बहुत स्पष्ट था, जो हैरान करता है, लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि कैसे कुछ ताकतवर लोग इन तथाकथित कट्टरवादियों का समर्थन कर रहे हैं।

इसकी पृष्ठभूमि में इस्लामाबाद की लाल मस्जिद है, जो कभी मुल्लाओं व उनके छात्रों तथा पाक सेना के बीच लड़ाई का गढ़ थी। लाल मस्जिद में बड़ी मात्रा में हथियार रखे गए थे और जनरल परवेज मुशर्रफ की सरकार ने उस गैरकानूनी कामकाज की अनदेखी की थी। जब मस्जिद में रहने वाले अराजक तत्वों ने चीनियों समेत नागरिकों को धमकाना शुरू किया, तब जाकर उनके खिलाफ सैन्य अभियान चलाया गया, जिसमें दोनों पक्षों के लोग हताहत हुए। चीन सरकार द्वारा औपचारिक शिकायत दर्ज किए जाने के बाद ही परवेज मुशर्रफ ने हस्तक्षेप किया था।

पिछले हफ्ते जब महिलाओं ने औरत मार्च के लिए दीवारों पर पेंटिंग बनानी शुरू की, तो लाल मस्जिद में रहने वाले लोगों ने उन्हें नष्ट कर दिया और हमले की धमकी दी। यह सब किसी छोटे गांव में नहीं, बल्कि मुल्क की राजधानी में हो रहा था। लेकिन सबसे बुरा तो 'औरत मार्च' के दिन हुआ। शेष पाकिस्तान में जहां कुछ जगहों पर देर रात तक समारोह चलते रहे, वहीं इस्लामाबाद की कहानी बिल्कुल अलग थी। स्थानीय प्रशासन ने एक बड़ी गलती की कि मौलाना फजलुर रहमान की जेयुआई (एफ) जैसी कुछ दक्षिणपंथी राजनीतिक पार्टियों के साथ लाल मस्जिद के मुल्लाओं और छात्रों को उसी जगह पर एक बाड़ बनाकर इकट्ठा होने की अनुमति दे दी। इन कट्टरपंथियों ने मार्च से पहले ही महिलाओं को धमकाना शुरू कर दिया कि उनका हक मांगना गैर-इस्लामी है। समारोह के अंत में कट्टरपंथियों ने बाड़ को तोड़ दिया और महिलाओं पर हमले शुरू कर दिए। जब तक पुलिस ने हस्तक्षेप किया, तब तक कुछ महिलाएं घायल हो गईं, हालांकि और कोई घटना नहीं हुई और पुरुषों को पीछे धकेल दिया गया। सबसे दिलचस्प बात यह है कि कट्टरपंथियों के साथ आई महिलाएं चुपचाप एक तरफ खड़ी रहीं। महिला दिवस के दिन भी उन्हें बोलने की इजाजत नहीं थी।

इसके विपरीत जमात-ए इस्लामी ने, जिसने कराची के बाग-ए जिन्ना में एक बड़ा कार्यक्रम किया था, विरासत के हक के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण संदेश दिया, जिसकी गारंटी संविधान और इस्लाम में भी दी गई है। वास्तव में ज्यादातर पाकिस्तानी महिलाएं, विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर महिलाएं अपने अधिकारों से वंचित हैं। जमात-ए इस्लामी के आमिर, सांसद सिराज उल हक ने अपने मांग पत्र में कहा है कि जो मर्द औरतों को विरासत में उनके हक से वंचित करते हैं, उन्हें चुनाव में हिस्सा लेने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। हालांकि कई वक्ताओं ने 'औरत मार्च' की यह कहते हुए आलोचना की कि ये महिलाएं 'पाश्चात्य' रंग में रंगी हैं और इनका एजेंडा 'पश्चिमी' है। यह रूढ़िवादी मानसिकता है, जिसका पाकिस्तानी महिलाएं विरोध कर रही हैं।

इस्लामाबाद में महिलाओं पर हमले के बाद सोशल मीडिया पर इसकी काफी आलोचना हुई और सरकार से इसके खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की गई। मानवाधिकार मंत्री डॉ. शिरीन मजारी ने  भी अपने ट्वीट में हमले की निंदा की और पुलिस से कार्रवाई करने के लिए कहा। इस्लामाबाद पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की और चार सौ ज्ञात-अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया। अब 11 धार्मिक विद्वानों के खिलाफ कोहसर थाने में दंगा करने, गैर-कानूनी रूप से सभा करने, सार्वजनिक कार्य में बाधा डालने, कानून की अवहेलना करने, गलत ढंग से बाधा डालने और हमला करने या आपराधिक बल का प्रयोग करने के आरोप में एफआईआर दर्ज की गई है।

आम नागरिक यह देखना चाह रहे हैं कि इनके खिलाफ कोई सार्थक कार्रवाई होती है या नहीं, क्योंकि अतीत में सरकार ऐसा करने के प्रति अनिच्छुक रही है, क्योंकि दक्षिणपंथी तत्व रातों-रात पूरे देश भर में विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं। एक अंग्रेजी दैनिक न्यूज इंटरनेशनल लिखता है-'इस तरह के आचरण की हर स्तर पर निंदा करने की जरूरत है। यह दुखद है कि पढ़े-लिखे दिखने वाले कुछ अभिनेता, प्रोड्यूसर और यहां तक कि लेखक भी महिलाओं के मौलिक अधिकारों की बात आने पर कट्टर मजहबी बन जाते हैं। अभी हमने देखा कि देश की महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए साहसिक कदम उठाया है। हम आशा करते हैं कि वे उन सभी चुनौतियों का बहादुरी से सामना करेंगी, जिनसे समाज जूझता है।'

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