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हमारे सपनों में भेड़िया!

Thu, 09 Jan 2014 06:53 PM IST
सुभाषिनी अली
सुभाषिनी अली Updated Thu, 09 Jan 2014 06:53 PM IST
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Wolf in our Dream

सावित्री बाई फुले का नाम हिंदी जानने वालों के लिए उतना जाना-पहचाना नहीं है, जितना होना चाहिए। वह केवल हमारे देश की बहादुर और महान महिलाओं में से एक नहीं थी, बल्कि समाज सुधारकों की तालिका में भी उनका नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा जाता है। उनका जन्म तीन जनवरी, 1831 को महाराष्ट्र के एक गांव में हुआ था और उनकी शादी ज्योति राव फुले से नौ वर्ष की उम्र में कर दी गई थी। तब ज्योति राव 13 वर्ष के थे। पढ़ने-लिखने में दोनों की दिलचस्पी थी और 15 वर्ष की उम्र में सावित्री ने अपने गांव के घर में पिछड़ी जातियों और गरीब घरों की छोटी बच्चियों के लिए स्कूल खोला। गांव के प्रभावशाली, उच्च जाति के लोगों ने जल्दी स्कूल बंद करवा दिया। सावित्री इससे डरी नहीं। गांव छोड़कर वह पुणे आ गईं, जहां उनके ससुर अपने जातिगत पेशे माली के काम में लगे थे। यहां ब्राह्मणों के गढ़ में सावित्री ने उसी तरह का एक स्कूल फिर खोला। अबकी बार वह बंद नहीं हुआ। हालांकि उन्हें काफी विरोध सहना पड़ा, पड़ोसी उन्हें गालियां देते थे, उन पर जानवरों के मल तक फेंके गए। मगर वह अपने काम में लगी रहीं।

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बहुत जल्द सावित्री की समझ में आया कि लड़कियों और औरतों के विकास के लिए शिक्षा ही काफी नहीं है, सामाजिक बुराइयों से भी लड़ना जरूरी है। उन्हें और ज्योतिबा फुले को विधवाओं की दुर्दशा भी बहुत सताती थी। कम उम्र की विधवाओं को सिर के बाल घोट दिए जाते थे, उन्हें जूठा खाना दिया जाता था और अक्सर वे यौन हिंसा का भी शिकार बनाई जाती थीं। गर्भवती होने पर आत्महत्या या शिशु हत्या के अलावा उनके पास दूसरा रास्ता नहीं होता था। सावित्री और ज्योति राव ने अपने घर को ऐसी विधवाओं के बच्चों के लिए अनाथालय बना दिया। इन दोनों ने विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए भी आवाज उठाई। जब ज्योति राव का देहांत हुआ, तो सावित्री ने ही उनकी चिता को आग दी थी। वह ऐसा करने वाली देश की पहली महिला थीं।
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1897 में पुणे में प्लेग फैला। जो इसका शिकार होता था, उसे परिवार के लोग घर से बाहर निकाल देते थे। लेकिन सावित्री ने ऐसे तमाम मरीजों का इलाज अपने घर में रखकर गोद लिए बेटे डॉक्टर यशवंत के साथ किया। एक दिन, किसी गांव से एक दस वर्ष के बीमार बच्चे को सावित्री अपने कंधों पर उठाकर घर तक ले आईं। बच्चा तो बच गया, लेकिन सावित्री बीमार पड़ गईं और चल बसीं।
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सावित्री बाई को हर वर्ष जनवरी के महीने में देश के अनेक इलाकों में याद किया जाता है। उनके जीवन से समाज में अभी तक व्याप्त समानता और शोषण को मिटाने की लड़ाई को आगे बढ़ाने की प्रेरणा लाखों लोगों को मिलती है। मगर आज के नव-उदारवादी दौर में यह भी समझा जाता है कि इस तरह सेे जीने से समाज के विकास में अड़ंगा लग जाता है। सामाजिक उत्थान, समानता, सार्वजनिक समृद्धि के लिए लड़ना या इनके आधार पर नीतियों को तय करना या इन पर सरकार द्वारा खर्च करना, सब व्यर्थ है। सही रास्ता यह है कि लोग व्यक्तिगत तरक्की को ही अपना सही मकसद मानकर जीएं। इस तरक्की का मापदंड केवल पैसा है। सरकारों को धनाढ्य व्यक्तियों को और भी ज्यादा धनाढ्य बनाने में पूरी ताकत लगा देनी चाहिए-यह सोच तेजी से फैल रही है। नव उदारवादी दुनिया का सरगना अमेरिका है और इस सोच का केंद्र है, वॉल स्ट्रीट, जहां से अमेरिका का शेयर बाजार देशवासियों और दुनिया के तमाम लोगों को अपने जाल में फंसाने का काम करता है। वह पलक झपकते ही करोड़पति बनाने का सपना दिखाकर गाढ़ी कमाई से उनको हाथ धोने के लिए तैयार करता है; बिना किसी प्रकार के उत्पादन के, कागजी दौलत के पहाड़ खड़े कर देता है। और फिर बिना किसी चेतावनी के तिलिस्म की तरह गायब हो जाता है। यह सच छिपा नहीं है, फिर भी वॉल स्ट्रीट का जादू फीका नहीं पड़ता।

संयोग की बात है कि सावित्री बाई फुले के जन्मदिन के मौके पर मुंबई में एक अमेरिकी फिल्म सिनेमा घरों में लगी-द वुल्फ ऑफ वॉल स्ट्रीट (वॉल स्ट्रीट का भेड़िया)। अगर इस फिल्म में दिखाए जाने वाले वॉल स्ट्रीट की 25 फीसदी बात भी सही है, और जैसा कि अनेक लोग कह रहे हैं कि फिल्म में जरा भी अतिश्योक्ति नहीं है, तब तो नव-उदारवादी सोच से उतना ही डरना चाहिए, जितना भेड़िये से।

फिल्म की कहानी एक युवा शेयर दलाल की है, जो किसी भी तरह करोड़पति बनना चाहता है। उसकी जुबान बहुत मीठी है और उसके अंदर कुछ भी बेच डालने का हुनर है। नैतिकता को वह अपने आसपास फटकने नहीं देता। दफ्तर में वह और उसके साथी मनोरंजन का कोई नया तरीका ढूंढते हैं। शराब, ड्रग्स और लड़कियां यह तो आम बात है। एक दिन तय होता है कि बड़ा-सा टार्गेट बनाया जाए, जिसके बीच में बुल्स आई (निशाना) होगा। उस पर गोली नहीं दागी जाएगी और न ही तीर छोड़े जाएंगे। उसकी तरफ एक बौना आदमी बार-बार फेंका जाएगा। एक पूछता है- अगर उसके सिर में चोट लग गई तो? थोड़ी देर के लिए वहां सब चुप हो जाते हैं। फिर एक कहता है, अगर हम यह मान लें कि वह इन्सान ही नहीं, तो? फिल्म का शायद सबसे अधिक परेशान करने वाला पहलू उसमें महिलाओं का चित्रण है। इस फिल्म में महिलाओं के बारे में, सिर्फ उनके शरीर के बारे में बातें होती हैं। महिला पात्र भी पैसे के लिए हर तरह का समझौता करने के लिए तैयार रहती हैं। यह वह दुनिया है, जिसका हिस्सा बनने को हम लालायित हैं। हॉल में बैठे नौजवान स्क्रीन की तरफ श्रद्धा भरी आंखों से देख रहे थे। उनके कान उन गालियों, अश्लील बातों, घटिया चुटकुलों आदि सबका स्वागत कर रहे थे, क्योंकि उन सबके पीछे पैसे की झंकार थी।


2013 के अंत में शेयर बाजार में बड़ा उछाल आया, जिसका फायदा अमेरिका की 10 फीसदी आबादी को हुआ, जो 80 फीसदी शेयरों की मालिक है। फिर भी वॉल स्ट्रीट का जादू कैसे बरकरार रहता है? बस, 90 फीसदी लोगों को इस भ्रम का शिकार बनाए रखने से कि वह दस फीसदी में शामिल हो जाएंगे और दस फीसदी लोगों को आश्वस्त करने से कि ऐसा कभी नहीं होगा। मगर आज जरूरत किसकी है, बीमार बच्चे को बचाने वाली सावित्री बाई की या अपने जबड़ों से बच्चों को चबाकर हजम करने वाले भेड़िये की?

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