{"_id":"5a487c48-ba5e-11e2-811c-d4ae52bc57c2","slug":"wind-take-broken-leaf-from-tree","type":"story","status":"publish","title_hn":"पत्ता टूटा डाल से ले गई पवन उड़ाय","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
पत्ता टूटा डाल से ले गई पवन उड़ाय
यशवंत व्यास
Updated Sat, 11 May 2013 10:45 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
एक था बकरा, एक था पेड़। बकरा रोज पेड़ की छांव में बैठता था और इधर-उधर चरकर आने के बावजूद पेड़ से एक-दो पत्तियां जरूर खाता था। पेड़ से बकरे की दोस्ती हो गई थी। दोस्ती में दो पत्ते नीचे गिरा कर खिलाने की प्रतीक्षा पेड़ की जिंदगी का हिस्सा हो चली थी। वह अपनी डाल हिलाकर कोई ताजा पत्ता गिराने की कोशिश करता था, ताकि बकरे को हरा-भरा आनंद दे सके।
विज्ञापन
बकरा भी बहुत गजब का दोस्त था। उसे भी हर दिन पेड़ की याद सताती थी। वक्त का पूरा ध्यान रखता था। सही वक्त पर आता और तने को चाटकर प्यार करता। पेड़ भी अपनी डालियां हिलाता और कहता कि चलो गले मिलो फिर बकरा आराम से बैठ जाता और दिन भर की कहानियां सुनाता।
विज्ञापन
किसी बकरे की कहानी में क्या हो सकता है? बकरे न दूध के लिए पाले जाते हैं, न उन्हें कोई बच्चा प्रेम से गले लगाता है। जो कुछ भी है, बकरी के हिस्से में जाता है। उसके दूध को कुछ डॉक्टर अद्भुत किस्म का भी बताते हैं। गांधीजी भी बकरी पालते थे। बकरी का होना, होना है, बकरे का होना क्या होना है?
विज्ञापन
एक दिन बकरे ने यह सवाल बड़ी शिद्दत से उठाया। पेड़ ने उसे समझाने की कोशिश की, देखो, अंततः सारी बकरियां तुम्हारी हैं। तुम्हारे बिना बकरियों का क्या परिवार? और बिना परिवार की बकरियों की किसी घर में क्या प्रतिष्ठा? दरअसल तुम्हारे होने से बकरी-समुदाय की इतनी हैसियत है, वर्ना बकरियां किसी काम की न रहतीं।
बकरा जानता था कि पेड़ उसे हमेशा सहानुभूतिपूर्वक बहलाता है। उसी पेड़ के नीचे पहले एक मंडी लगा करती थी। मंडी में बकरे-बकरी बिका करते थे। लोग आते थे और बकरी के दूध या बकरे की गर्दन पर हाथ फिराकर सौदे की बात करते थे। जिसकी गर्दन पर हाथ फिरता था, वही सिहर कर सोचता था, आज कितने में जाऊंगा?
बुजुर्ग बकरियां कहती हैं, कभी इस पेड़ के नीचे ऐसी जगह हुआ करती थी, जहां कसाई बैठते थे। फिर एक मंदिर भी बना। मंदिर का किस्सा आते ही बुजुर्ग बकरियां चुप हो जाती थीं और ऐसा लगता था कि जैसे कसाई वहां बैठते रहते तो ज्यादा आश्वस्ति थी, क्योंकि वे तय करके अपना धंधा चलाते थे और बकरी-समुदाय के सम्मुख जीवन-मृत्यु के बीच की पारदर्शिता भी बनी रहती थी। कसाई का चुनाव व्यवसाय का चुनाव था और तय था कि वह बकरी-समुदाय के साथ क्या सलूक करेगा, लेकिन मंदिर का चुनाव अलग किस्म का चुनाव था और यह कभी भी आश्वस्ति नहीं थी कि पूजा में प्रसाद किसका होगा।
बकरे को बुजुर्ग बकरियों की कहानी में रस नहीं था। वह पेड़ की सहानुभूति से भी विरक्त हो चला था। उसका मानना था कि पेड़ स्थिर है। वह बांहें फैलाए जरूर खड़ा रहता है, लेकिन उसके जीवन का हर अंश किसी और के काम आता है। वह फल वगैरह से भी कभी लद जाता है, लेकिन पत्थर खाकर भी जवाब क्या दे सकता है?
पेड़ बकरे को समझाता, मेरे फलों या छांव को लेकर मैं निश्चिंत हूं।
मेरा इरादा भारतीय संसद की तरह होता है। लोग वंदेमातरम के दौरान निकल जाते हैं, कभी किसी सरकार को बचाने के लिए चीखते हैं, कभी सेंट्रल हॉल में झूठ वगैरह बोलकर काम चला लेते हैं। पर फिर भी देश बचा रहता है। मेरी छांव बची रहती है। मेरे फल खाए जाते हैं।
बकरे को इस थ्योरी में यकीन नहीं होता। आज भी वह जब तने को प्यार करके नीचे बैठा, तो पेड़ ने दो पत्ते गिराए। पत्ते हमेशा की तरह गिरे, लेकिन बकरे ने उन्हें अजीब-सी करुणा से देखा, खाने के लिए लपका नहीं।
पेड़ ने पूछा, तुमने न सीबीआई की नौकरी की, न सीएजी में रहे। तुम्हारे इस तरह पत्तों को छोड़ने का आज क्या मतलब है? तुम किसी बोर्ड के चेयरमेन के लॉन की घास भी नहीं चरने जाते। तुमने न कोयले के टेंडरों में हेराफेरी पर आपत्ति की, न खेलों-जमीनों के धंधे में दिलचस्पी दिखाई।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से तुम्हारे उद्वेलित होने का कारण नहीं है। तुम न सरकार में हो, न सरकार के खिलाफ। न तुम भष्टाचार में हो, न भ्रष्टाचार के खिलाफ। न तुम किसी बजट में सूखे, न किसी फूड सिक्योरिटी बिल के रुकने पर हरे हुए। तुम जंतर-मंतर का अर्थ नहीं जानना चाहते, तुमने कभी मैदान की घास और बबूल के कांटों में फर्क नहीं किया। तुम तो बस अपने में मगन बकरे रहे हो। खामोश न रहो, इन पत्तों को खा लो।
बकरे को पेड़ के अनुभव तथा प्रेम ने प्रेरित कर दिया। वह यह बताना भूल गया कि आज बलि चढ़ते-चढ़ते बचकर निकल आया था।
उसने पत्तों की तरफ मुंह बढ़ाया।
एक पत्ते पर कानून मंत्री लिखा था और एक पर रेलमंत्री। पत्ते चबाने के लिए उसका मुंह उन तक पहुंचता, तब तक तेज झोंका आया और पत्ते हवा में उड़कर न जाने कहां से न जाने कहां चले गए।
बकरे को शगुन समझ में आ गया और वह उधर की ओर चल पड़ा, जिधर से बलि चढ़ते-चढ़ते बच आया था।
दृश्य यह है कि बकरा स्वयं बलिगृह की ओर जा रहा है।
पेड़ के सारे पत्ते झड़ गए हैं। पवन किस-किस पत्ते को उड़ाए, यह पवन को ही समझ में नहीं आ रहा है।
और अंत में
प्रसन्नता का विषय है कि कर्नाटक की जनता ने भाजपा के भ्रष्टाचार के प्रादेशिक मॉडल को अस्वीकार करके कांग्रेस के राष्ट्रीय मॉडल को स्वीकृति दे दी है। उधर, बंसल जी से ज्यादा उनका बकरा नैतिक साबित हुआ है, जिसने अपनी पूजा के बावजूद बंसल जी का साथ नहीं दिया। हम सभी को उस बकरे का आभारी होना चाहिए।
-चंडीगढ़ से एक पाठक का मोबाइल संदेश।