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रणनीति और आर्थिक शक्ति से जीत

Sun, 02 Aug 2020 01:06 AM IST
Alok Mehta आलोक मेहता
Updated Sun, 02 Aug 2020 01:06 AM IST
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Win by strategy and economic power
राफेल एयरक्राफ्ट - फोटो : Amar Ujala

बोफोर्स तोप, राफेल लड़ाकू विमान, एस-400 मिसाइल, एचडीडब्ल्यू पनडुब्बी और परमाणु अस्त्र से शक्ति संपन्न होने पर भी क्या हम युद्ध चाहते हैं? पूर्व राष्ट्रपति एवं दूरदर्शी डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम ने बहुत पहले समझा दिया था कि हमारी यह शक्ति बाहरी आक्रमण को रोकने और युद्ध न करने की परिचायक है। इसलिए राफेल लड़ाकू विमानों से भारत की सैन्य शक्ति नई ऊंचाइयों पर पहुंचने के साथ यह शोर मचाना ठीक नहीं होगा कि बस अब चीन को निपटा देना है, तिब्बत भी उसके हाथ से निकलने वाला है, आदि आदि।


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कहने और लिखने को 'वॉर गेम' हो सकता है, लेकिन व्यवहार में यह खेल नहीं है। भारत के गौरवशाली इतिहास और संस्कृति में 'ब्रह्मास्त्र' और 'सुदर्शन चक्र' का उल्लेख ईश्वर के अवतार श्रीराम तथा श्रीकृष्ण के काल से होता रहा, पर उन्होंने भी संपूर्ण विश्व को नष्ट कर सकने वाले अस्त्रों के उपयोग को अंतिम समय तक रोके रखा।

इसमें शक नहीं कि भारत के सामने हर तरह की चुनौतियां हैं-सीमित सैन्य टकराव से लेकर परमाणु प्रक्षेपास्त्रों के कवच के साथ परंपरागत युद्ध तक की। जम्मू कश्मीर में वर्षों से पाकिस्तान के छद्म युद्ध का सामना हम करते रहे हैं। अब वह हमसे सीधे युद्ध कर सकने लायक नहीं रह गया है और केवल चीन के कंधे पर बैठे उछल-कूद कर रहा है। बड़ी चुनौती चीन है। चीन के साथ हमारी सीमा काराकोरम, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड से लेकर सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश तक करीब 4,056 किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है।

दूसरी तरफ हिंद महासागर में भी चीन अब सैन्य लहरों पर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है। पहले कश्मीर में पाकिस्तान को सबक सिखाने के बाद लद्दाख में भारतीय सेना ने चीन की घुसपैठ को कड़ाई से नाकाम कर दिया। फिर भी कई अति उत्साही और हथियारों की सौदागरी से लाभ उठाने वाले कुछ लोग यह कहने लगे कि  'अपनी तरफ से आगे बढ़कर चीन द्वारा 1962 में हथियाई जमीन वापस ले ली जाए। अब भारत पहले की तरह कमजोर नहीं, फिर परमाणु हथियार किस दिन के लिए बनाए गए?'

यह बड़बोलापन कितना व्यावहारिक कहा जा सकता है? भारत की वायुसेना के पास परमाणु शक्ति संपन्न विमान, मिसाइल्स और नौसेना के पास भी परमाणु शक्ति से लैस पनडुब्बी और जहाज हैं। फिर भी पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल जेजे सिंह ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यह क्षमता युद्ध लड़ने के लिए नहीं, बल्कि भय दिखाने या निवारण के लिए होती है। कभी दुश्मन स्वयं ऐसी नौबत ला दे, तो जवाबी कार्रवाई करने में हम असमर्थ न हों, इसलिए तैयारी रखनी होती है।

असल में चीन हमेशा यह दलील देता रहा है कि दोनों देशों के बीच औपचारिक रूप से सीमा रेखा कभी खींची ही नहीं गई। जबकि भारत यह समझाता रहा है कि भारत-चीन सीमा परंपरागत एवं रीतिबद्ध सीमा रेखा संधि तथा समझौते (ब्रिटिश भारत और तिब्बत के बीच 1914 से लागू) से तय मानी जाए। चीन इन संधियों से मुंह चुराता रहा और उसके माओवादी विस्तारवाद का इरादा कभी खत्म नहीं हुआ है। हमारी सेना को युद्ध के अधिक अनुभव हैं और कई मोर्चे पर वह चीनी सेना पर भारी पड़ेगी।

लेकिन भारतीय सैन्य शक्ति के नेतृत्वकर्ता भी यह मानते हैं कि पिछले वर्षों के दौरान चीन ने अपनी सामरिक परमाणु शक्ति के आधुनिकीकरण के साथ दूर तक मार करने वाली मिसाइलें विकसित की हैं। संख्या की दृष्टि से उसके पास अधिक परमाणु हथियार हैं और वह अंतरराष्ट्रीय नियम-कानूनों की भी अधिक परवाह नहीं करता। पाकिस्तान ने तो उसे कब्जाए कश्मीर का कुछ हिस्सा भी सौंप रखा है। भारत से लगी तिब्बत की सीमा में ही उसने परमाणु हथियारों का अड्डा भी बनाया है।

इसलिए भारत द्वारा पिछले अगस्त में कश्मीर-लद्दाख में सत्ता के विकेंद्रीकरण तथा पाक अधिकृत कश्मीर को मुक्त करवाने के संकल्प से चीन बेचैन हो गया है। बहरहाल भारत ने दृढ़ शक्ति दिखाते हुए संयम के साथ  नियंत्रण रेखा पर वार्ता जारी रखी है। विश्व समुदाय भारत की इस नीति और आतंकवाद और विस्तारवाद के विरुद्ध संघर्ष का समर्थन भी कर रहा है।

समस्या अपने घर की है। लोकतंत्र का फायदा उठाकर राजनीतिक अथवा हथियारों की दलाली से फायदा उठाने वाले तत्व, नेता, अधिकारी, संगठन सामान्य जनता के बीच भ्रम, अफवाहें फैला रहे हैं। यह पहला अवसर नहीं है। हथियार, लड़ाकू विमान, पनडुब्बी, विमान वाहक पोत खरीद के अवसरों पर अमेरिका, यूरोप, रूस, चीन जैसे देशों और हथियार बनाने वाली कंपनियों की प्रतियोगिता में लाभ का कुछ टुकड़ा पाने के इच्छुक सक्रिय हो जाते हैं। युद्धोन्माद से जल्दबाजी में खरीद का दबाव भी बनाते हैं।

हाल में लद्दाख में हुए सैन्य टकराव के दौरान भी आपात खरीद के नाम पर दबाव बनाकर सामान मंगवाने की कोशिश हुई है। संतोष की बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुरक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का नया अभियान शुरू कर दिया है। विभिन्न राज्यों में बड़े पैमाने पर सेना के लिए उपयोगी आवश्यक सामान, हथियार, विमान, हेलीकाप्टर बनाने के लिए देशी-विदेशी पूंजी लगाने की व्यवस्था भी कर दी है। इससे न केवल अरबों रुपयों की बचत होगी, लोगों को रोजगार मिलेगा और भारत की सैन्य सामग्री कई विकासशील देशों को निर्यात करने का लाभ भी होगा।

यह भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीन के हथियार बेचने के धंधे को एक हद तक कमजोर करेगा। भारत को स्वयं हथियारों के युद्ध के बजाय अपनी सामरिक रणनीति तथा आर्थिक शक्ति के बल पर दुश्मनों को पराजित करना है। श्रीकृष्ण से लेकर महात्मा गांधी तक के आदर्शों से विश्व में विजय पताका फहरानी है।

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