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हिंदी: राजभाषा के विकास में कृत्रिम मेधा, क्या सहज हो पाएंगी भाषाएं

Thu, 14 Sep 2023 06:51 AM IST
Umesh Chaturvedi उमेश चतुर्वेदी
Updated Thu, 14 Sep 2023 06:51 AM IST
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सार
यह सच है कि राजनीतिक दांव-पेच और पूर्वाग्रहों के चलते व्यवहारिक तौर पर हिंदी राजभाषा नहीं बन पाई। लेकिन हिंदी देश की भाषा जरूर बन गई है। हिंदी की ताकत समझनी है, तो आपको लंदन और कनाडा के भारतीय समुदायों की आबादी वाले इलाके में जाना होगा, दुबई की सड़कों पर घूमना होगा, ऑस्ट्रेलिया में देखना होगा। 
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Will use of artificial intelligence in development of official language help in correcting languages
हिंदी दिवस 2023 - फोटो : iStock

विस्तार

कृत्रिम मेधा के बढ़ते कदम से सवाल उठने लगा है कि हमारी भाषाओं के स्तर पर इससे कितना अंतर आएगा। क्या भाषाएं सहज हो पाएंगी और क्या उनके बीच आपसी संपर्क पहले की तुलना में सहजता से बढ़ जाएगा? यह उम्मीद की जानी चाहिए कि भाषाओं के संदर्भ में कृत्रिम मेधा के इस्तेमाल को लेकर जो आशंकाएं जताई जा रही हैं, वे निर्मूल ही साबित होंगी। अगर ऐसा हो गया, तो  भाषायी स्तर पर किस तरह के बदलाव आ सकते हैं? हिंदी दिवस पर यह सवाल कुछ ज्यादा ही गहराई से विचार की मांग करता है।



यह सच है कि राजनीतिक दांव-पेच और पूर्वाग्रहों के चलते व्यवहारिक तौर पर हिंदी राजभाषा नहीं बन पाई। लेकिन हिंदी देश की भाषा जरूर बन गई है। हिंदी की ताकत समझनी है, तो आपको लंदन और कनाडा के भारतीय समुदायों की आबादी वाले इलाके में जाना होगा, दुबई की सड़कों पर घूमना होगा, ऑस्ट्रेलिया में देखना होगा। सिर्फ भारतीय समुदाय नहीं, भारतीय उपमहाद्वीप के देशों, मसलन पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान और अफगानिस्तान के लोग भी आपसी बातचीत में हिंदी का प्रयोग करते हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोग तो यूरोप और अमेरिका में खुद को भारतीय ही बताते हैं। भाषाओं को लेकर होने वाली स्थानीय राजनीति को छोड़ दें, तो समूचे भारत में आपसी संपर्क की भाषा हिंदी ही है। इसके बावजूद उत्तर पूर्व और दक्षिण भारत की भाषाओं और संपर्क वाली हिंदी के बीच कई बार बाधाएं आ खड़ी होती हैं। पर लगता है कि कृत्रिम मेधा इस मामले में बड़े सहयोग के रूप में उभरने वाली है। इस दिशा में काम शुरू हो चुका है।


हमारी संसद के दोनों सदनों में सामान्य कामकाज की भाषा अंग्रेजी और हिंदी ही है। पर कई बार सांसद अपनी किसी विशेष बात, किसी विशेष विचार और अपने स्थानीय निर्वाचन क्षेत्र की किसी विशेष स्थानीय समस्या को संसद में उठाते हैं, तब वे अपनी स्थानीय भाषा-जैसे, तमिल, मलयालम, बोडो आदि का प्रयोग करते हैं। सबको पता है कि लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य आम संपर्क के लिए हिंदी या अंग्रेजी में ही सहज हैं। इसलिए ऐसे सांसदों के लिए संसद में भाषा विशेष में होने वाले विशेष उल्लेख या सवाल के अनुवाद की व्यवस्था है। अब तक इस अनुवाद का काम उस भाषा विशेष के अधिकारी विद्वान ही करते रहे हैं। पर कई बार स्थानीय भाषा से तत्काल हिंदी या अंग्रेजी में सहज अनुवाद नहीं हो पाता था। संसद के दोनों सदन अब इसके लिए कृत्रिम मेधा का इस्तेमाल करने की तैयारी में हैं।

इसके नतीजों पर हमें गौर करना होगा। अगर ऐसा होगा, तो भारतीय भाषाओं के बीच कहीं ज्यादा आपसी और सटीक संवाद बढ़ेगा। इसका असर यह होगा कि स्थानीय भाषाओं और राजभाषा के बीच हिचक की जो दीवार खड़ी है, वह दीवार भी धीरे-धीरे गिरने लगेगी। इससे भाषायी आदान-प्रदान बढ़ेगा। हिंदी को राजभाषा के वाजिब सिंहासन पर बैठाने लायक बनाने की जिम्मेदारी जिन हिंदी अधिकारियों या राजभाषा अधिकारियों पर रही है, उन्होंने अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाई। उन्होंने राजभाषा को दुरूह ही बनाया है। ऐसे माहौल में कृत्रिम मेधा से उम्मीद की जा सकती है, जो इस प्रक्रिया को और सहज बनाएगी। जब इसके जरिये भाषाओं के बीच आपसी संपर्क बढ़ेगा, तो उनके बीच राजनीतिक कोशिशों के बावजूद आज जैसी कटुता नहीं रह पाएगी।

इससे भाषाएं आपस में और गहरे तक संपृक्त होंगी। लेकिन हर भाषा का अपना स्थानीय बोध है, अपने क्षेत्र हैं और हर भाषा हर भाषा से सीधे जुड़ती भी नहीं। तब हिंदी की जरूरत और भी ज्यादा होगी और चूंकि कृत्रिम मेधा इस जरूरत में सहज जरिया की भूमिका निभाएगी, इसलिए हिंदी और आगे बढ़ेगी।

 हां, इस बीच हो सकता है कि कुछ पारंपरिक रोजगार खत्म हो जाएं, जैसे संसद में रिपोर्टर और तत्क्षण अनुवाद के काम करने वाले लोगों की नियुक्ति रोकी गई है। लेकिन जिस तरह कंप्यूटर के आने के बाद नए तरह के काम सामने आए, कृत्रिम मेधा भी वैसे ही रोजगार के नए अवसर पैदा करेगी। लेकिन आपसी संपर्क के चलते भाषाएं कहीं ज्यादा सहज, कहीं ज्यादा समृद्ध होंगी और इसका फायदा उनके साथ ही राजभाषा को भी मिलेगा।

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