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पास-पड़ोस: पाकिस्तान एक पहेलीनुमा पड़ोसी, क्या कभी अपनी हरकतों से बाज आएगा?

Tue, 01 Apr 2025 07:02 AM IST
Prashant Dixit प्रशांत दीक्षित
Updated Tue, 01 Apr 2025 07:02 AM IST
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सार
एक ऐसा देश, जहां लोकतांत्रिक मूल्य हमेशा फौज द्वारा कुचले और लूडो के खेल की तरह राष्ट्रपति व न्यायाधीश बदले जाते हों, वह दिवालियेपन और आंतरिक विद्रोह से जूझते हुए भी दूसरे देशों में आतंक फैलाने से बाज न आए, तो फिर इसका तो यही अर्थ हुआ कि वह कभी सुधरने वाला नहीं।
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Will Pakistan ever stop its activities of spreading terror in other countries?
पाकिस्तान चीन। - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

पाकिस्तान  के पहले गवर्नर जनरल मोहम्मद अली जिन्ना का अपने देश के लिए सपना एक मरीचिका ही रह गया। जिन्ना भारत के मुस्लिम समुदाय के लिए एक स्वतंत्र धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की इच्छा रखते थे। 11 अगस्त, 1947 को एक भाषण में उन्होंने अपनी इच्छा जाहिर की, जिसका सारांश था ‘आप स्वतंत्र हैं, किसी भी मंदिर और मस्जिद में जा सकते हैं। आप किसी भी धर्म और जाति के हों, उससे देश की व्यवस्था का कोई संबंध नहीं है।’ लेकिन 1948 में उनके देहांत के बाद पाकिस्तान में बदलाव दिखने लगा। आठ वर्ष बाद 1956 में फील्ड मार्शल अयूब खान की सरकार ने पाकिस्तान को ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ में बदलकर व्यवस्था को धर्म से जोड़ दिया। जनरल याह्या खान, जिन्होंने देश की बागडोर पर कब्जा किया, खुद शौकीन मिजाज के थेे। वास्तविकता में, मुख्य परिवर्तन पाकिस्तानी सेना की समाज में शनै-शनै बढ़ती हुई ताकत में नजर आया।



गणतंत्र और धर्मनिरपेक्षता ताक पर रख दी गई, जब एक सफल चुनाव के बाद मुजीबुर रहमान को जेल में डाल दिया गया। हालांकि, पूर्व पाकिस्तान की अवामी पार्टी के सबसे गणमान्य नेता होने के नाते देश का नेतृत्व उनको सौंपना चाहिए था, लेकिन न तो याह्या खान और न ही उनके विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को यह मंजूर था कि एक बंगाली उन पर राज करे। उसके बाद की कहानी से हम सब परिचित हैं कि कैसे हमने बांग्लादेश को बनते हुए देखा। युद्ध में पाकिस्तान को करारी हार का सामना करना पड़ा और उसके 93,000 सैनिक बंदी बना लिए गए। इस हार की कीमत याह्या खान को चुकानी पड़ी। उनके इस्तीफे के साथ नए राष्ट्रपति भुट्टो ने याह्या खान को घर में नजरबंद करवा दिया था। यह एक सोचा-समझा कदम था, जिसमें सेना और भुट्टो, दोनों शामिल थे।  


पाकिस्तानी सेना के बारे में खबर फैलाई गई कि सेना को बैरकों में भेज दिया गया है और जनतंत्र फिर से साकार होने जा रहा है। भुट्टो सिर्फ दो वर्षों तक आपातकालीन नियम के अंतर्गत राष्ट्रपति रहे और फिर प्रधानमंत्री का पद संभाल लिया। यह दिखावा चार वर्षों तक चला, जब सेना प्रमुख जिया उल हक ने भुट्टो को अपदस्थ किया और चुनाव में धांधली के इल्जाम पर मुकदमा चलाकर फांसी पर चढ़ा दिया गया। साथ ही जिया उल हक ने कट्टरपंथ को बढ़ावा दिया। अहमदिया संप्रदायों पर पूरी तरह रोक लगा दी गई। शिया मुस्लिमों पर चरमपंथी सुन्नी समूहों का अत्याचार एक ढर्रा ही बन गया। पाकिस्तानी सेना ने देश में अपना एक गहरा मुकाम हासिल कर लिया।

पाकिस्तान की ही स्नातक आयशा सिद्दीक के लेखों से काफी पर्दा उठ गया। सेना ने फौजी फाउंडेशन जैसी संस्थाएं खड़ी कर दीं और समाज के हर वर्ग में उसकी पहुंच थी और वह किसी भी चुनाव में दखलंदाजी कर सकती थी। इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) का विवरण काफी विस्तार से सामने आया। ऐसी टिप्पणी सेना को गवारा नहीं थी। इसी कारण सिद्दीक को देश छोड़ना पड़ा। बाहरी ताकतों ने पाकिस्तान की भौगोलिक बनावट और सेना के प्रभाव का भरपूर फायदा उठाया। शुरुआत 1947 में हुई, जब पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ एक सांप्रदायिकता विरोधी सामरिक रिश्ता कायम किया। सोवियत रूस के खिलाफ पाकिस्तान से खुफिया उड़ानें होती थीं। भारत के खिलाफ लड़ाकू विमानों से लेकर असलहा-बारूद तक, सब अमेरिका देता था। अफगानिस्तान केंद्रित सोवियत रूस विरोधी अभियान में पाकिस्तानी की आईएसआई, अमेरिका की सीआईए के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चली। अंततः रूस को अफगानिस्तान से पलायन करना पड़ा।

अफगानिस्तान में सोवियत रूस की उपस्थिति को शीतयुद्ध के दौरान ‘अमेरिकी राष्ट्रपति रेगन डॉक्ट्रिन’ के नजरिये से देखा गया। अमेरिका का उद्देश्य बिना सीधी लड़ाई किए रूस को खदेड़ना था। जाहिर था कि यह अभियान पाकिस्तान की मदद के बिना संभव नहीं था और उसने एक जिहादी इस्लामिक कट्टरपंथी मुजाहिद्दीन की फौज तैयार करवा दी। अमेरिका भारी मात्रा में हथियार, बारूद और खुफिया जानकारी मुजाहिद्दीन गुटों को आईएसआई की मदद से पहुंचाता रहा। अंत में स्टिंगर मिसाइल भी दे दी गई, जो रूसी वायुसेना के विनाश का कारण बनी। सवाल यह है कि पाकिस्तान को इस नीति से क्या लाभ मिला। युद्ध के बाद आईएसआई की नजरों के नीचे से ये सुन्नी मुजाहिद्दीन दस्ते अपने हथियार सहित पाकिस्तान में घुस आए और धार्मिक जिहादी संस्थानों के संपर्क में आ गए।

अमेरिकी स्नातक आयशा जलाल द्वारा वर्णित पार्टिजंश ऑफ अल्लाह : जिहाद इन साउथ एशिया  में बालाकोट स्थित अठारवीं सदी में संस्थापित एक जिहादी संस्था में ही आतंकवादी गुट लश्करे तैय्यबा का जन्म हुआ, जो कि अभी तक जम्मू और कश्मीर में आतंक का कहर ढा रहा है। 2008 का मुंबई हमला और 2019 का पुलवामा विस्फोट इसी ने करवाया था। पाकिस्तान का विकृत जनतंत्र परवेज मुशर्रफ के जमाने में देखने को मिला। इसमें न्यायतंत्र, सरकार और सेना सब शामिल थे। फरवरी 1999 में जब भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ मिलकर खुशी-खुशी लाहौर बस सेवा का उद्घाटन करने में व्यस्त थे, तब सेना प्रमुख मुशर्रफ की फौज कारगिल पर आक्रमण कर रही थी। अचंभित शरीफ ने मुशर्रफ को बर्खास्त कर दिया और कोलंबो से लौटते हुए मुशर्रफ के जहाज को बड़ी मुश्किल से कराची में उतरने दिया गया। आमने-सामने के सिलसिलेवार युद्ध में, मुशर्रफ ने संविधान भंग करके खुद राष्ट्रपति बन बैठा। पाकिस्तान के इतिहास में इसके बाद का वातावरण हास्यास्पद ही कहा जा सकता है। लूडो के खेल की तरह, कभी जजों को हटाया, तो कभी शरीफ को हटाया गया, अमेरिका से बदलते रिश्ते, राष्ट्रपति का बेनजीर भुट्टो को प्रधानमंत्री के पद से हटाना और आखिर में उनका दुखद अंत। अंत में जनरल परवेज मुशर्रफ पर देश का संविधान गिराने के आरोप में देशद्रोह का मुकदमा चला, लेकिन सेना फिर सामने आई और उनकी जान बचा ली।

एक सोच है कि पाकिस्तान को अब चीन की शरण में ही रहना होगा। चाइना-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर देश का इन्फ्रास्ट्रक्चर बदल रहा है, जिसको देने के लिए पाकिस्तान के पास पैसे नहीं हैं। राजनीतिक स्तर सवाल उठते हैं, लेकिन सेना बदलाव नहीं होने देती। पाकिस्तान का समुद्र और होर्मुज की खाड़ी अब चीन के कब्जे में होगी और ग्वादर बंदरगाह में चीनी युद्धपोतों का आधिपत्य रहेगा, लेकिन यह तभी संभव होगा, जब बलूच अभियान को सेना समेट सके।    

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