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दोहरे तर्क: कटघरे में अमेरिकी नीतियां, विश्वसनीयता; खुद जरूरत पड़ी तो रूस से डीजल आयात करने को राजी हुए ट्रंप
Mon, 12 Oct 2026 09:27 AM IST
न्यूज डेस्क
अमर उजाला, नई दिल्ली।
अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: न्यूज डेस्क
Updated Mon, 12 Oct 2026 09:27 AM IST
सार
जिस अमेरिका ने भारत समेत अन्य देशों पर रूसी तेल खरीदने से रोकने का दबाव बनाया, वही अब अपनी जरूरतों के लिए उससे डीजल आयात करने जा रहा है। यह कदम उसकी नीतियों की विश्वसनीयता और उसके पीछे के तर्कों पर सवाल खड़े करता है।
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व्लादिमीर पुतिन और डोनाल्ड ट्रंप (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
विस्तार
जिस अमेरिका ने भारत समेत अन्य देशों पर रूसी तेल खरीदने से रोकने का दबाव बनाया, वही अब अपनी जरूरतों के लिए रूस से डीजल आयात करने जा रहा है। अमेरिका का यह कदम उसकी नीतियों की विश्वसनीयता और उसके पीछे के तर्कों पर सवाल खड़े करता है।
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अगर रूस से ऊर्जा खरीदना उसके युद्ध संबंधी उद्देश्यों को आर्थिक समर्थन देने के समान है, जैसा अमेरिका कहता आया है, तो फिर वह खुद इस खरीद की अनुमति भला क्यों दे रहा है? गौरतलब है कि अमेरिकी प्रशासन ने रूसी तेल खरीदने के कारण भारत पर 25 फीसदी अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क लगा दिया था, जिसे बाद में खत्म किया गया।
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इसके अलावा, हाल ही में ट्रंप ने एक ऐसे कानून को मंजूरी दी थी, जिसके तहत रूस से तेल खरीदने वाले भारत व चीन जैसे देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाया जा सकता है। दरअसल अमेरिका में अगले महीने मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं और वहां चुनावों से ऐन पहले डीजल और ईंधन की कीमतें काफी बढ़ गई हैं।
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इसलिए समझा जा सकता है कि कीमतों को नियंत्रित करने के लिए ट्रंप प्रशासन ने रूस के साथ यह समझौता किया है। समस्या किसी देश के अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने में नहीं, बल्कि दूसरों के लिए अलग मानदंड अपनाने में है। अगर अमेरिका अपनी जरूरतों के आधार पर रूस से डीजल खरीदने का फैसला कर सकता है, तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा संबंधी चिंताओं को भी इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए।
अमेरिका बेशक इसे अस्थायी और आपात स्थिति बता रहा हो, लेकिन ऊर्जा की उपलब्धता और कीमतों का दबाव भारत के लिए भी उतना ही वास्तविक है। आखिर वह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है और अपनी ऊर्जा जरूरतों का 88 फीसदी से अधिक हिस्सा आयात से पूरा करता है।
बहरहाल, अमेरिका के इस कदम से यूक्रेन की नाराजगी तो स्वाभाविक है, लेकिन रूसी डीजल खरीदने पर लगा अमेरिकी प्रतिबंध हटने से अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीजल की उपलब्धता बढ़ती है, तो कीमतों में स्थिरता बढ़ेगी, जिससे भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों को कुछ राहत मिलने की संभावना हो सकती है।
अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत ने रूस से तेल खरीदना कभी बंद तो किया ही नहीं था। जरूरी है कि वह इसी तरह किसी बाहरी दबाव के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर अपनी ऊर्जा नीति पर कायम रहे। दूसरी तरफ, यह उम्मीद भी की जा सकती है कि अमेरिका पर भी अब इस मामले में दूसरे देशों की ऊर्जा संबंधी जरूरतों को लेकर एकतरफा कठोर रुख न अपनाने का नैतिक दबाव होगा।