जानना जरूरी है: मां दुर्गा ने किया महिषासुर-वध, पार्वती जी की तपस्या की रक्षा कैसे हुई?
पार्वती जी की तपस्या की रक्षा के लिए मां दुर्गा ने अरुणाचल की भूमि पर धर्म के शत्रु महिषासुर का संहार किया। उसका वध होते ही देवता व ऋषि हर्षित हो उठे।
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एक समय की बात है। गिरिराज कुमारी पार्वती अरुणाचल पर्वत के समीप एक आश्रम में पहुंचीं। वहां का माहौल शांत और पवित्र था। कौए और उल्लू, शुक और श्येन, मृग और व्याघ्र, हाथी और सिंह, मोर तथा सर्प, चूहे और बिल्लियों में कोई वैर नहीं था और सभी एकसाथ प्रेमपूर्वक रहते थे। वृक्षों के बीच से उठती पवित्र धूमराशि और होम किए हुए पुरोडाश की सुगंध आश्रम को तपोमय बना रही थी। वहां पार्वती जी ने गौतम ऋषि को रुद्राक्ष की माला जपते हुए देखा। मुनि ने उन्हें बताया कि अरुणाचल पुण्य-क्षेत्रों में श्रेष्ठ है तथा वह यहां भगवान त्रिलोचन की आराधना करते हैं। उन्होंने पार्वती जी से भी यहीं आश्रम बनाकर तपस्या करने का आग्रह किया।
पार्वती जी ने तपस्या करने का निश्चय किया। उन्होंने आश्रम की रक्षा का भार सुभगा और धुंधुमारी को तथा वन की रक्षा का दायित्व दुर्गा देवी को सौंपा। इसके बाद उन्होंने अपनी वेणी खोलकर उसे जटाओं का रूप दिया, रेशमी वस्त्र त्यागकर वल्कल धारण किया। प्रतिदिन नदी में स्नान करके वह सूर्य को अर्घ्य देतीं, अरुणाचल की प्रदक्षिणा करतीं, प्रणाम करतीं और स्वयं स्थापित शिवलिंग की विधिपूर्वक पूजा करतीं। पंचाक्षर मंत्र का जप, शिवस्तोत्रों का पाठ तथा अरुणाचलरूपी महादेव का ध्यान उनके नित्य नियम बन गए।
ग्रीष्म ऋतु में वह पांच प्रज्वलित अग्नियों के बीच खड़ी होकर तप करतीं, शीत ऋतु में जल के भीतर खड़ी रहतीं और वर्षा की रातों में भी अचल भाव से साधना करतीं। उनका एकमात्र उद्देश्य महादेव को प्रसन्न करना था। देवताओं का अपमान और धर्म का नाश करने वाले महिषासुर को जब यह पता चला कि माता पार्वती अरुणाचल में तपस्या कर रही हैं, तो उसके मन में उन्हें अपने वश में करने की इच्छा जाग उठी। उसने एक दूती को तपस्विनी के रूप में पार्वती जी के पास भेजा। दूती ने महिषासुर के ऐश्वर्य और सामर्थ्य का वर्णन करते हुए पार्वती जी को तपस्या छोड़कर महिषासुर को पति रूप में स्वीकार करने के लिए समझाना चाहा।
- पार्वती जी की सखी विजया ने दूती की अनुचित बातें सुनकर उसे आश्रम से बाहर निकाल दिया। दूती ने महिषासुर को सारी बात बता दी। यह सुनते ही वह क्रोध से भर उठा।
- महिषासुर चतुरंगिणी सेना लेकर अरुणाचल की ओर चल पड़ा। कराल, दुर्धर, विकराल, वाष्कल, दुर्मुख, चंड, प्रचंड, अमरासुर, महाहनु, महामौलि, विकटेक्षण, ज्वालास्य और दहन जैसे अनेक सेनापति भी उसके साथ थे।
दैत्यों के आने से तपस्या में विघ्न पड़ने की आशंका देखकर पार्वती जी ने दुर्गा देवी को उनका संहार करने का आदेश दिया। मांं दुर्गा, सिंह पर आरूढ़ होकर अस्त्र-शस्त्र धारण किए रणभूमि में पहुंच गईं। उनके अंगों से योगिनियों की मंडली और सहस्रों मातृकाएं प्रकट हुईं। वे सभी दैत्यों पर टूट पड़ीं और भयंकर युद्ध शुरू हो गया। योगिनियों के बाणों से दैत्यों के मस्तक कटने लगे और रणभूमि रक्त से भर उठी। देवी ने चंड और मुंड के मस्तक काट डाले, जिसके कारण उन्हें ‘चामुंडा’ नाम मिला। अंततः महिषासुर, दुर्गा जी के सामने आ गया। उसके साथ प्रचंड, चामर, महामौलि, महाहनु, उग्रास्य, विकटाक्ष और दहन जैसे सेनापति भी थे। देवी ने एक-एक करके उन सभी का वध कर दिया। तब महिषासुर ने कई दिव्य अस्त्र चलाए, किंतु दुर्गा जी ने प्रत्येक अस्त्र को विफल कर दिया। वह कभी सिंह, कभी वराह, कभी व्याघ्र, कभी हाथी और कभी भैंसे का रूप धारण करके देवी से युद्ध करता रहा। उसके तीखे सींगों के प्रहार से देवी और उनका सिंह भी घायल हुए, फिर भी वह विचलित नहीं हुईं।
अंत में, महिषासुर अपने वास्तविक रूप में देवी के सामने आया। तब दुर्गा देवी ने अपनी तलवार से उसके मस्तक को काट डाला और उस कटे हुए मस्तक को हाथ में लेकर रणभूमि में नृत्य करने लगीं। महिषासुर का वध होने के साथ ही देवता और ऋषि हर्षित हो उठे। इस प्रकार पार्वती जी की तपस्या की रक्षा के लिए देवी दुर्गा ने अरुणाचल की भूमि पर धर्म के शत्रु महिषासुर का संहार किया।