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बदलाव तो लाना होगा इतिहास की किताबों में

Sun, 09 Nov 2014 07:44 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 09 Nov 2014 07:44 PM IST
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Will have to change in History books

जब से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नुमाइंदों ने दिल्ली पहुंचकर मंत्रियों के साथ विचार-विमर्श का सिलसिला शुरू किया है, एक सवाल पूछा जा रहा है-यह मोदी सरकार है या संघ सरकार। जवाब आसान है। संघ में क्षमता होती इस देश का प्रधानमंत्री चुनने की, तो भाजपा न 2004 में लोकसभा चुनाव हारती, न 2009 में। संघ तब भी था, उसका समर्थन भाजपा को तब भी था। तो संघ क्यों नहीं अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री बना सका। इसलिए कि संघ की तथाकथित शक्ति को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है सेक्यूलरिज्म के सैनिकों ने। फिर भी कहना जरूरी है कि संघ के बड़े नेता मोदी सरकार पर दबाव डालने का प्रयास कर रहे हैं। बिल्कुल वैसे, जैसे अटल बिहारी वाजपेयी के समय करते थे। तब संघ का हस्तक्षेप दिखा था इतिहास की किताबों में। मुरली मनोहर जोशी मानव संसाधन विकास मंत्री थे, सो आसान था उन पर दबाव डालना। उस समय खूब हंगामा हुआ, और इस बार भी खूब हंगामा होने वाला है, यदि संघ के दबाव में इतिहास की किताबों में छेड़छाड़ की कोशिश होती है।

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पिछले सप्ताह दिल्ली के एक स्कूल में मुझे अपनी किताब दरबार पर चर्चा करने के लिए बुलाया गया। नेहरू-गांधी परिवार की आलोचना है इसमें, सो कई छात्रों ने मुझसे कहा कि इतिहास की उनकी किताबों में इस परिवार की सिर्फ प्रशंसा है। यह भी कहा उन्होंने कि कांग्रेस को अन्य दलों से ज्यादा अहमियत दी गई है। ये बातें अगर सच हैं, तो परिवर्तन लाना होगा इतिहास की किताबों में, पर इस बार संघ अगर हस्तक्षेप करता है, तो सोच-समझकर करेगा।
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इसमें शक नहीं कि सेक्यूलरिज्म के बहाने कांग्रेस से जुड़े वामपंथी बुद्धिजीवियों और इतिहासकारों ने भारत की प्राचीन संस्कृति को तकरीबन अदृश्य कर दिया है। इतिहास की किताबें जो पढ़ाई जाती हैं, उसमें अधिक ध्यान है भारत की मिली-जुली हिंदू-मुस्लिम संस्कृति पर, जो पैदा हुई इस्लाम के आने से। हमारे बच्चों को खूब सिखाया जाता है मुगल बादशाहों की शान के बारे में, वहीं शायद ही कोई बच्चा होगा, जिसको मालूम हो कि चंद्रगुप्त मौर्य के समय पाटलिपुत्र इतना विशाल शहर था कि यूनान के राजदूत मेगास्थनीज ने लिखा कि यह विश्व का सबसे विशाल शहर था। बच्चों को आर्यभट्ट के बारे में इतना ही सिखाया जाता है कि वह न होते, तो शून्य का ज्ञान नहीं होता। क्या किताबों में इससे ज्यादा जानकारी नहीं दी जानी चाहिए ऐसे व्यक्ति के बारे में, जिसने अपनी विद्या से विश्व का भविष्य बदल डाला था?
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प्रधानमंत्री मोदी ने न्यूयॉर्क में इच्छा जताई कि योग दिवस मनाया जाना चाहिए विश्व भर में। पर भारतीय स्कूलों में अगर आप बच्चों से पूछेंगे पतंजलि के बारे में, तो शायद ही कोई सही जानकारी दे पाएगा। सो परिवर्तन तो लाना होगा इतिहास की किताबों में, लेकिन वैसा नहीं, जैसा संघ चाहता है। इसलिए कि संघ के इतिहासकारों की नजरें अक्सर इतनी तंग होती हैं कि धर्म-मजहब के झगड़ों से आगे निकलने की उनमें काबिलियत ही नहीं होती। उनमें ऐसी बात होती है, जिससे मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचती है। ऐसा होगा, तो मोदी सरकार बदनाम हो जाएगी, जैसे वाजपेयी सरकार बदनाम हुई थी। इसलिए संघ परिवार के बड़े नेताओं से विनम्रता से मेरी दरख्वास्त है कि शिक्षा क्षेत्र से वे दूर ही रहें।

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