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मुद्दा : सिंदूर से इतनी तकलीफ क्यों... लगाने वालियों का क्या अपराध, अब रहने भी दो रेडिकल फेमिनिज्म
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विस्तार
पहलगाम में जिस तरह से निहत्थे यात्रियों को धर्म पूछ-पूछकर और उनके कपड़े उतरवाकर मारा गया, बेहद निंदनीय है। समूचे देश में जिस तरह से इस घटना को लेकर आक्रोश फैला, ऐसा शायद इतने दशकों में पहले कभी नहीं देखा गया। भारत सरकार ने कहा ही था कि आतंकवादियों को ढूंढकर मारा जाएगा, इसी को ध्यान में रखकर सिर्फ पच्चीस मिनट में नौ आतंकी ठिकानों को नष्ट कर दिया गया। इसका नाम रखा गया-ऑपरेशन सिंदूर।
अब अपने देश में बहुत से लोग ऐसे हैं, जो चर्चा पाने के लिए दिखाते हैं कि देखिए वे धारा के विरुद्ध बहते हैं, तो साहब कई महिलाएं बताने लगीं कि इसका नाम ऑपरेशन सिंदूर रखने का क्या मतलब। यह तो पितृसत्ता का प्रतीक है। एक अंग्रेजी पत्रिका की संपादक ने लिखा-मैं सैद्धांतिक रूप से ऑपरेशन सिंदूर नाम रखने के खिलाफ हूं। यह स्त्रियों पर किसी और का मालिकाना हक है, इस बात को बताता है। यह ऑनर किलिंग है। शादी की संस्था पर धब्बा और हिंदुत्व है। ऐसी ही बहुत-सी अन्य पोस्ट्स दिखाई दीं।
अफसोस यह कि बहुत से लोग कहते हैं कि किसी भी बात पर हिंदू-मुसलमान नहीं करना चाहिए। सच भी है। लेकिन जब भी कोई ऐसा मुद्दा आता है, ये सबसे पहले मैदान में कूदकर, हिंदू-मुसलमान करने लगते हैं। ऑपरेशन सिंदूर हिंदू-मुसलमान कैसे करने लगा। आखिर सेना द्वारा की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में व्योमिका सिंह के साथ सोफिया कुरैशी भी थीं, जो सेना में महत्वपूर्ण पदों पर हैं।
सिंदूर इनके लिए सिर्फ पितृसत्ता का वाहक है। मजेदार यह है कि पितृसत्ता की परिभाषाएं भी अलग-अलग हैं। ऐसा लगता है कि इस धरती पर पुरुषों को रहने का कोई अधिकार नहीं। हां इनके पिता, भाई, पति, बेटे, देवता हैं। जिनका गान अक्सर ये सोशल मीडिया पर करती रहती हैं। यदि संसार में पुरुष मात्र होना अपराध का द्योतक है, तो आपके घर के पुरुष भी कैसे बचे रहेंगे। और यदि आपके घर के सारे पुरुष देवता हैं, तो शायद हर स्त्री ऐसा ही मानती होगी। फिर वे पुरुष कौन से हैं, जो प्रति पल राक्षस घोषित किए जाते हैं और उनसे मुक्ति चाहिए। क्या सारे पुरुषों को हिटलर की तरह कन्सन्ट्रेशन कैंपस में भेज दिया जाए। और ताली बजाई जाए कि देखो धरती पापों से मुक्त हुई।
आज की कामकाजी महिला, जो अक्सर पश्चिमी परिधान पहनती है, उसके जीवन से सिंदूर लगभग गायब हो गया है। सिंदूर तो क्या, बिंदी भी नहीं रही है। लेकिन इसके बरक्स यदि कोई स्त्री सिंदूर लगाना चाहती है, तो आपको क्या तकलीफ। आप कौन होती हैं रोकने वाली। दीपिका पादुकोण अभिनीत लघु फिल्म-माई चॉइस देखी है न। वैसे भी यदि सिंदूर न लगाना आपकी चॉइस है, चुनाव है, तो सिंदूर लगाना उस स्त्री की चॉइस भी है, जो उसे लगाना चाहती है। उसका मजाक उड़ाने, छोटा करने का हक किसी को नहीं है। यदि हिजाब और बुर्का, जो कि सौ फीसदी पितृसत्ता के प्रतीक हैं, अगर वे अपनी चॉइस के मामले हैं, तो सिंदूर लगाने वालियों ने क्या अपराध कर दिया? आप परंपरा के बोझ को न मानें, शादी के मुकाबले लिव इन में रहना चाहें, यह भी आपकी चॉइस है। लेकिन लिव इन में रहने के लिए भी एक पुरुष चाहिए। हां, समलैंगिक होकर इसका निराकरण करना चाहें, तो कर सकती हैं।
परंपरा के बहुत-से हिस्से शोषक होते हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन सिंदूर तो शृंगार के मामले में होता है। बंगाल और बिहार में बहुत-सी मुसलमान स्त्रियां सिंदूर लगाती हैं। वे इसे अपनी ही परंपरा का हिस्सा समझती हैं। वर्षों पहले एक ईसाई लड़की बस में साथ आती थी। वह मांग भरकर सिंदूर और बिंदी लगाती थी। उसके नाम से भी ईसाई होना ध्वनित नहीं होता था। फिर एक दिन उसने बातों-बातों में ही बताया कि वह ईसाई है, तो अपनी जिज्ञासा को रोक नहीं सकी। सिंदूर लगाने के बारे में पूछा, तो बोली कि यह तो हमारी संस्कृति का हिस्सा है।
इसी तरह बिहार और बंगाल में स्त्रियां खूब सिंदूर लगाती हैं। छठ के अवसर पर तो बिहार में हर स्त्री सिंदूर से सजी दिखाई देती है। तो आपका रेडिकल फेमिनिज्म उनकी भी आलोचना करेगा न। क्योंकि आपको लिबरल फेमिनिज्म बहुत उबाऊ लगता है। आज रेडिकल फेमिनिज्म के दिन अमेरिका में ही लद गए हैं, जहां से वह चला था। ट्रंप ने पहला हमला जेंडर के नाम पर आतताई हो जाने पर बोला था। रोते रहिए कि हाय ये क्या हुआ। टोनी मारिसन के देश में ऐसा कैसे हो सकता है। पहलगाम में जिन स्त्रियों के पति को मार दिया गया, उनमें से एक हिमांशी नरवाल ने हाल ही में कहा कि ऑपरेशन सिंदूर इसी बात का परिचायक है कि मेरे सिंदूर को एक हफ्ते में ही उजाड़ दिया गया।