बस्तर क्यों नहीं है सत्ता के केंद्र में
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मध्य प्रदेश के पुनर्गठन के जरिये छत्तीसगढ़ एक नवंबर, 2000 को नया राज्य बना। क्षेत्रफल की दृष्टि से देश का 9वां और जनसंख्या की दृष्टि से 16वां बड़ा राज्य है छत्तीसगढ़। इसके कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 44 प्रतिशत इलाका वनों से परिपूर्ण है। वन क्षेत्रफल के हिसाब से छत्तीसगढ़ देश का तीसरा बड़ा राज्य है। खनिज राजस्व की दृष्टि से यह दूसरा और वन राजस्व की दृष्टि से तीसरा बड़ा राज्य है। देश के कुल खनिज उत्पादन का 16 प्रतिशत उत्पादन छत्तीसगढ़ में होता है। सरकार का दावा है कि छत्तीसगढ़ में अभी देश का 38 प्रतिशत लोहे का उत्पादन हो रहा है। इसके अलावा कोयला उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 16 फीसदी से अधिक है।
गठन के वक्त, अविभाजित मध्य प्रदेश के हिस्से के रूप में छत्तीसगढ़ के भौगोलिक क्षेत्र के लिए कुल बजट प्रावधान 5,704 करोड़ रुपये था, जो अलग राज्य बनने के बाद क्रमशः बढ़ता गया और अब दस वर्षों में 30 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। प्रति व्यक्ति आय की गणना 2000-2001 में प्रचलित भावों में प्रति व्यक्ति आय 10 हजार 125 रुपये थी, जो वर्तमान में बढ़कर 44, 097 रुपये (अनुमानित) हो गई।
अगर इन आंकड़ों को देखें, तो छत्तीसगढ़ में चारों ओर विकास के प्रतिमान दिखने चाहिए, पर परिस्थिति इसके उलट है। बीते दस वर्षों में बस्तर के कई इलाके इस तरह कट चुके हैं कि वहां सरकार की मौजूदगी ही नहीं है। सुकमा जिले में जगरगुंडा में कड़ी सुरक्षा में बीते आठ वर्षों से 5,000 लोगों के लिए तीन से चार माह का राशन भेजना पड़ता है। इसी क्षेत्र के ताड़मेटला में माओवादियों ने देश के सबसे बड़े हमले को अंजाम दिया था। यहां 76 जवान शहीद हुए थे। सरकार वहां तक नहीं पहुंच पा रही है, तो विश्वास हासिल करने का सवाल ही कहां उत्पन्न होता है। इसे सरकार की कमजोरी मानें या माओवादियों की जीत, समझ नहीं आता।
विधानसभा चुनावों के तुरंत बाद बस्तर के ग्रामीण पत्रकार साईं रेड्डी की बीजापुर जिले के बासागुड़ा में नक्सलियों ने हत्या कर दी। बासागुड़ा का हाल भी जगरगुंडा जैसा ही है। इससे पहले एक और पत्रकार नेमीचंद जैन को नक्सलियों ने मौत के घाट उतार दिया था। दोनों पत्रकार ग्रामीण इलाके की रिपोर्टिंग करते थे। दोनों अपनी पत्रकारिता के कारण प्रशासन और नक्सलियों के निशाने पर थे।
पहले माना जाता था कि माओवादियों की लड़ाई में केवल आदिवासी पिस रहे हैं। अब दायरा बढ़ता जा रहा है। पत्रकार भी सीधे निशाने पर आ गए हैं। बस्तर का सच बाहर निकले, यह न तो सरकार चाहती है और न ही माओवादी! यह स्थिति तालिबानी हालात को बयां करती दिख रही है। देश में पहली बार इस तरह से एक वर्ष के भीतर दो पत्रकारों की हत्या से यही प्रतीत हो रहा है। बस्तर के पत्रकारों ने धरना दिया, नक्सली खबरों के बहिष्कार की चेतावनी दी। इससे पहले भी इस तरह की चेतावनी पत्रकार दे चुके हैं। माओवादियों पर असर सिफर रहा।
इस इलाके में इस बार करीब 20 फीसदी ज्यादा मतदान हुआ। मगर परिणाम राज्य सरकार के खिलाफ गया। इस बार सत्ता की कुंजी बस्तर से निकल कर मैदानी इलाके के हाथ में आ गई है। यहां भाजपा को 12 में से सिर्फ चार सीटें मिलीं। इससे पहले यहां की 11 सीटों पर भाजपा का कब्जा था। इस बार रायपुर इलाके में कांग्रेस को 21 में से केवल चार सीटें मिलीं, यहां भाजपा को नौ सीटों का फायदा हुआ, जिस कारण डॉ. रमन सिंह सरकार बना सके। यानी आदिवासी क्षेत्रों से कम हो रहा विश्वास और मैदानी इलाकों में सरकार के प्रति बदले हुए रुख को इस बार छत्तीसगढ़ की जनता ने प्रतिबिंबित किया है।
क्या बस्तर के लोग इस बात से नाराज हैं कि सरकार ने मैदानी इलाकों में जिस तरह से काम के दावे किए उसकी परछाईं तक बस्तर में नहीं पहुंच सकी? कस्बाई इलाकों को छोड़ दें, तो बड़े इलाके में सुराज आज भी एक सपना है। सवाल केवल उस इंडेक्स का नहीं है, जिसे सरकार पूरी दुनिया को दिखाकर अपनी पीठ थपथपवा रही है, बल्कि यह भी देखना होगा कि विकास की सारी बातें केवल मैदानी इलाकों तक सिमट कर ही न रह जाएं।
(लेखक दंतेवाड़ा के वरिष्ठ पत्रकार हैं)