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मुद्रा : हर बेचारा... मजबूत होते डॉलर का मारा, क्या इससे महान बन सकता है अमेरिका
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सार
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रुपया बनाम डॉलर
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अमर उजाला
विस्तार
बौखलाया और बेचैन विक्रम, हिसाब जोड़ता हुआ पेड़ के नीचे पहुंच गया। विक्रम इधर-उधर देखता, इससे पहले ही बेताल धप्प से कूदकर उसके कंधे पर आ बैठा। विक्रम ने कहा, ‘सुन बेताल, आज अपनी चोंच बंद रखना... कोई बातचीत नहीं होगी। मेरा दिमाग ड्रोन हुआ जा रहा है। शेयर बाजार में चोट, ऊपर से रुपया कमजोर यानी इंपोर्ट महंगा, मांग है नहीं बाजार में, कौन-सा नुकसान बचाऊं... सो चुपचाप बैठ जा।’
बेताल ने ठहाका मारा, ‘तू भी मजबूत होते डॉलर का मारा है? आखिर ट्रंप की जीत के बाद से डॉलर क्यों दहाड़ रहा है? विक्रम कुनमुनाया... ‘वही तो समझने की कोशिश में हूं। रुपये की गिरावट से बड़ी चपत लगी है। विदेशी निवेशक भी शेयर बाजार में नवंबर के महीने में तीन लाख करोड़ की बिकवाली कर गए। बाजार बेचारा क्या करे?’
बेताल बोला, अमेरिकी डॉलर को सब चाहते हैं, मगर इसकी मजबूती कोई नहीं चाहता। जब ट्रंप जीते, तो डॉलर और अमेरिकी शेयर बाजार एक साथ तेजी की सलामी देने लगे। बाजार को लगा कि ट्रंप आए हैं, सरकार का खर्च बढ़ेगा, ब्याज दरें कम होने के संकेत मिल ही रहे हैं, अब ग्रोथ लौटेगी, तो कंपनियां चमकेंगी। इधर दुनिया शेयरों से ज्यादा अमेरिकी डॉलर को देख रही थी। ट्रंप यह वादा करते हुए व्हाइट हाउस पहुंचे हैं कि वह अमेरिकी उद्योगों की क्षमताएं बढ़ाने के लिए आयात महंगा करेंगे। इंपोर्ट पर 25 फीसदी ड्यूटी लगा देंगे। पिछले कार्यकाल में वह ऐसा कर चुके हैं। यह फैसला दुनिया में अमेरिका बनाम चीन, यूरोप और कनाडा की ट्रेड वॉर शुरू करेगा। इन देशों को अमेरिका से आयात महंगा करना होगा।
अमेरिकी उपभोक्ता बाजार आयात पर निर्भर है। वह सबसे बड़ा आयातक है। बीते साल अमेरिका का कुल इंपोर्ट 32 खरब डॉलर था। यह भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (नवंबर 2024) के पांच गुने से भी ज्यादा है। इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ने का मतलब इंपोर्टेड महंगाई। ट्रंप की जीत के बाद अमेरिका के केंद्रीय बैंक ने कहा कि ब्याज दरों में कमी की गति धीमी पड़ सकती है, क्योंकि महंगे आयात से अमेरिका में महंगाई को नई धार मिल जाएगी। तभी तो ट्रंप की आमद के बाद से डॉलर इंडेक्स दो फीसदी बढ़ चुका है। चीन का युआन चार महीने के न्यूनतम स्तर पर है, रुपया गिरने के नए रिकॉर्ड बना रहा है। एसबीआई ने कहा है कि ट्रंप के अगले चार वर्षों में रुपया दस फीसदी तक कमजोर हो सकता है। यूरो, येन, आॅस्ट्रेलियाई डॉलर सब पिट रहे हैं। विक्रम बोला, ‘अमेरिका की महंगाई से दुनिया की जान क्यों सूखती है?’ बेताल ने कहा, ‘दुनिया के बैंक और सरकारें यह हिसाब लगा रहे हैं कि उन पर ट्रंप के कूटनीतिक फैसले ज्यादा भारी पड़ेंगे या डॉलर की ताकत!’
अमेरिकी महंगाई बढ़ने का मतलब है डॉलर की मजबूती। मजबूत डॉलर यानी दुनिया में आफत। विश्व के 40 फीसदी व्यापार का लेन-देन अमेरिकी डॉलर में होता है। इसमें अमेरिका से होने वाला व्यापार शामिल नहीं है। मजबूत डॉलर से आयात महंगा होता है, तो मांग टूटती है। अगर डॉलर एक फीसदी मजबूत होता है, तो दुनिया के देशों के व्यापार में करीब 0.6 फीसदी की कमी आती है। मजबूत डॉलर दुनिया में मंदी की वजह बन सकता है। मांग कम होने से शेयर बाजार में घरेलू कंपनियां पिटती हैं। दूसरी तरफ विदेशी निवेशकों को अमेरिकी बाॅन्ड में ज्यादा रिटर्न मिलता है, तो वे उभरते बाजार से निकलते हैं। भारतीय बाजार में विदेशी निवेशकों की बिकवाली इसलिए बढ़ रही है। विक्रम अचानक बोला, बेताल गुरु, दुनिया की तो लगी पड़ी है, मगर राष्ट्रपति ट्रंप तो अमेरिकी डॉलर की मजबूती से खुश हो रहे होंगे, अमेरिका सचमुच महान बनेगा..?
बेताल ने ठहाका लगाया, ये सवाल तुझे खूब सूझा। ट्रंप की अगुवाई में अमेरिका बड़ी ऐतिहासिक दुविधा में है। डॉलर की मजबूती का मतलब है, अन्य देशों की मुद्राओं का कमजोर होना और उनके निर्यात प्रतिस्पर्धात्मक होना। चीन, कोरिया, जापान, ताइवान, मेक्सिको, कनाडा, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया जैसी निर्यात आधारित अर्थव्यवस्थाएं बाजारों में बढ़त लेंगी। आखिर ट्रंप अमेरिका के घरेलू उद्योग को दुनिया के बाजार में बढ़त के लिए ही तो मजबूत कर रहे हैं, इसलिए वह आयात रोक रहे हैं, मगर इसका उलटा होने का खतरा है। कंपनियों में खलबली है, आयात शुल्क बढ़ने से उनका कच्चा माल महंगा होगा। दूसरी तरफ और दुनिया के बाजार में उनके लिए जगह सिकुड़ जाएगी। बेताल ने विक्रम को चौंकाते हुए कहा कि तुझे पता है, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस एक अरसे से कमजोर डॉलर की हिमायत कर रहे हैं। उनका कहना है कि मजबूत डॉलर से अमेरिकी श्रमिकों की प्रतिस्पर्धा कम होती है। इस साल चुनाव प्रचार में ट्रंप ने भी डेट्रायट में कहा था, ‘बाइडन ने डॉलर की मजबूती बढ़ाकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को तोड़ दिया है। अगर यही हाल रहा तो कंपनियां दूसरे मुल्क में चली जाएंगी।’
विक्रम अपने बाल नोचने लगा...क्या है यह सब? ट्रंप अगर अमेरिका को ग्रेट बनाना चाहते हैं, तो आयात महंगा कर, डॉलर को मजबूत क्यों कर रहे हैं...? बेताल बोला, ‘दुनिया को पता नहीं कि ट्रंप के साथ उसके अगले चार साल कैसे बीतने वाले हैं। अलबत्ता एक पुराना किस्सा सुनकर तो भविष्य का कुछ अंदाज लगा सकता है।’ बेताल ने विक्रम की आंखों के सामने से हाथ घुमाया और विक्रम ने खुद को 1980 के दशक में पाया। यह दौर था, जब फेड प्रमुख पॉल वोल्कर ने ब्याज दर बढ़ाकर महंगाई थाम ली थी, मगर 1980 के 1984 के बीच अमेरिकी डॉलर की कीमत 26 फीसदी बढ़ गई। मेिक्सको, अर्जेंटीना की मुद्राएं इस कदर टूटीं कि विदेशी कर्ज संकट आ गया। महंगे कर्ज के साथ अमेरिका मंदी में धंस गया।
डॉलर की मजबूती राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन की राजनीति पर भारी पड़ी। महीनों की कूटनीतिक पेशबंदी के बाद 22 सितंबर, 1985 में जी-5 देशों (अमेरिका, पश्चिम जर्मनी, ब्रिटेन, जापान और फ्रांस) के बीच ऐतिहासिक समझौता हुआ। रीगन ने अमेरिकी डॉलर का 50 फीसदी अवमूल्यन किया। जापान, फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी की मुद्राओं का मूल्य करीब इतना ही बढ़ गया। इस समझौते को ग्लोबलाइजेशन की शुरुआत माना जाता है, हालांकि यह समझौता जापान पर भारी पड़ा। इसके बाद जापान लंबी मंदी और डिफ्लेशन में धंस गया। क्या ट्रंप इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने के चुनावी वादे से मुकर जाएंगे या रीगन वाले दिन दोहराए जाएंगे? विक्रम का सवाल हवा में गुम हो गया। अब पीठ पर बेताल नहीं था, बस एक ठहाका गूंज रहा था।