पंचायती राज की अनदेखी क्यों
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वस्तु और सेवा कर यानी जीएसटी से संबंधित विधेयक को, जिसे वित्त मंत्री अरुण जेटली अगले सप्ताह संसद में पेश कर सकते हैं, 'सहकारी संघवाद' के प्रति मोदी सरकार की प्रतिबद्धता की पहली बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। यह अलग बात है कि जीएसटी की पहल वास्तव में कांग्रेस ने की थी, जिसे सफल होने में एक दशक से भी ज्यादा समय लगा। इसकी मुख्य वजह थी कि कांग्रेस धैर्यपूर्वक सभी राज्य सरकारों से इस पर सहमति बनाना चाह रही थी। यूपीए सरकार को इसमें सफलता मिलने ही वाली थी कि उसका कार्यकाल खत्म हो गया। नतीजतन वित्त मंत्री अरुण जेटली को यह दावा करने का मौका मिल गया कि यह उनकी सरकार की जीत है। जहां तक मोदी सरकार का संबंध है, छह महीने में उसे एकमात्र सफलता तब मिली, जब उसने कांग्रेस की योजना को स्वीकार किया!
जीएसटी विधेयक का बड़ा महत्व यह है कि इसे नरेंद्र मोदी के योजना आयोग को भंग करने के अविवेकी फैसले के संदर्भ में पेश किया जा रहा है। मोदी ने योजना आयोग को भंग करने का फैसला बिना यह सोचे लिया है कि उसकी जगह कौन-सी संस्था बनाई जानी चाहिए। इस क्रम में उन्होंने हाल ही में राज्यों से परामर्श किया। एक बार फिर उन्होंने सहकारी संघवाद की अवधारणा को यह कहते हुए पलट दिया कि संविधान की उनकी अपनी व्याख्या के अनुसार, भारत 'राज्यों का संघ' है। जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है। जैसा कि डॉ अंबेडकर ने जोर देते हुए कहा था, भारत तमाम संघीय विशेषताओं के साथ 'राज्यों का समुच्चय' है। यह विवादास्पद मुद्दा नहीं है। डॉ अंबेडकर के बाद, दिसंबर, 1992 में राजीव गांधी की पहल पर संसद ने संविधान में दो अध्याय-भाग नौ-पंचायत और भाग नौ ए-नगरपालिका जोड़ने के लिए संशोधन किया था। तबसे संविधान की संघीय विशेषता दो नहीं, बल्कि तीन सहभागियों-केंद्र, राज्य और पंचायत/नगरपालिका पर निर्भर है। फिर भी मोदी का 'सहकारी संघवाद' स्थानीय निकायों को केंद्र एवं राज्यों के साथ समान सांविधानिक हिस्सेदार नहीं मानता है। जब तक इन तीनों को समान स्तर पर नहीं लाया जाता, तब तक सहकारी संघवाद सफल नहीं हो सकता। तब तक स्थानीय निकायों पर सिर्फ केंद्र एवं राज्यों का ही आधिपत्य रहेगा, जिसे कई कारणों से स्वीकार नहीं किया जा सकता।
पहला, अनुच्छेद 243-जी के अनुसार, संविधान पंचायतों को 'स्वायत्त शासन की संस्था' का दर्जा देता है। ऐसा ही दर्जा नगरपालिकाओं को अनुच्छेद 243-डब्ल्यू में दिया गया है। गौरतलब है कि इन स्थानीय निकायों को 'स्व शासक संस्था' नहीं, बल्कि 'स्वायत्त शासन की संस्था' बताया गया है। इसलिए भारत में संघवाद के किसी भी रूप का विस्तार निर्वाचित स्थानीय निकाय तक होना चाहिए, जैसा केंद्र और राज्य के साथ होता है। दूसरा, स्थानीय निकायों से संबंधित दो नए अध्याय संविधान में जुड़ने के बाद से नगालैंड एवं मिजोरम को छोड़कर देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्थानीय निकाय के चुनाव हो रहे हैं। नतीजतन, देश में 2,50,000 से ज्यादा स्थानीय स्वायत्त शासन की संस्थाएं हैं। इनमें 32 लाख से ज्यादा जनप्रतिनिधि चुने गए हैं। इन निर्वाचित सदस्यों की संख्या नॉर्वे और न्यूजीलैंड की कुल आबादी के बराबर है! इसके अलावा, इन जनप्रतिनिधियों में करीब आधा हिस्सा महिलाओं का है। यानी बाकी दुनिया में जितनी महिला जनप्रतिनिधि हैं, उससे कहीं ज्यादा अकेले भारत में हैं। करीब एक लाख स्थानीय निकायों की मुखिया महिलाएं हैं। इसके अलावा स्थानीय निकायों में करीब दस लाख अनुसूचित जाति के जनप्रतिनिधि हैं, जिनमें से करीब 80,000 संबंधित स्थानीय निकायों में ऊंचे पदों पर हैं।
अनुसूचित जनजाति के लिए उनकी आबादी के अनुपात में पंचायत व नगरपालिका में हरेक स्तर पर आरक्षण के अलावा, संसद ने पंचायत (अनुसूचित क्षेत्र विस्तार) अधिनियम,1996 लागू किया, ताकि संविधान में वर्गीकृत जनजातीय इलाकों को पांचवीं अनुसूची क्षेत्र के रूप में अधिनियमित किया जाए। यह कानून पंचायती राज कानून का संभवतः सबसे सशक्त कानून है, क्योंकि यह पंचायत को बस्ती के रूप में परिभाषित करता है, जो हर बस्ती को एक ग्रामसभा मुहैया कराता है और जनजातीय पंचायतों को लाभकारी कार्यक्रमों का चुनाव स्वयं करने पर जोर देने के अलावा जनजातीय ग्रामसभा को जनजातीय पंचायत द्वारा प्रस्तावित योजनाओं, कार्यक्रमों एवं परियोजनाओं को लागू करने से पहले मंजूर करने का वैधानिक अधिकार देता है। उसी तरह, उसे उपयोगिता प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार भी दिया गया है कि पंचायत के खाते से जिस उद्देश्य के लिए रकम निकाली गई, वास्तव में वह उसी पर खर्च हुई या नहीं। यह विशेष प्रावधान जनजातीय ग्रामसभाओं को गैर जनजातीय ग्रामसभाओं की तुलना में पंचायत एवं सरपंच की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए ज्यादा अधिकार देता है। इस प्रकार यह सुनिश्चित करता है कि सिर्फ सरपंच या स्थानीय नौकरशाही में उसके गुर्गे नहीं, बल्कि पूरा समुदाय लाभान्वित होगा।
मोदी का सहकारी संघवाद इन सबकी अनदेखी करता है। राज्यों के हितों पर ज्यादा ध्यान देते हुए स्थानीय निकाय का नुकसान कर मोदी संविधान की संघीय विशेषताओं का झूठा दिखावा करते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री के नाते पंचायती राज के मामले में उनका रिकॉर्ड किसी भी अन्य राज्य की तुलना में बेहद खराब था। यह सच है कि उन्हें प्रबुद्ध कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों के कारण देश की सबसे बेहतर पंचायती राज व्यवस्था विरासत में मिली, लेकिन उन्होंने उनमें सुधार लाने और उन्हें सांविधानिक व्यवस्था के अनुरूप बनाने के लिए कुछ नहीं किया। गुजरात से ज्यादा तरक्की पड़ोसी राज्यों-महाराष्ट्र, राजस्थान और हरियाणा में हुई। चूंकि मोदी मौलिक रूप से केंद्रीकृत व्यक्ति हैं, ऐसे में भला उनसे विकेंद्रीकरण की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
- लेखक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा के मनोनीत सदस्य हैं