टीके से कैसा संकोच

नवीन ठाकर Updated Thu, 08 Feb 2018 07:08 PM IST
टीकाकरण
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टीकाकरण के फायदे दर्शाने वाले सबूत बहुत ज्यादा हैं। टीका एक किफायती हस्तक्षेप है, जिसने असंख्य जीवन को बचाया है और दुनिया भर में स्वास्थ्य और कल्याण में सुधार किया है। वर्ष 2014 में केंद्र सरकार ने पूर्ण टीकाकरण का लक्ष्य हासिल करने के लिए 'मिशन इंद्रधनुष' शुरू किया था। इसकी शुरुआत सबसे कम टीकाकरण वाले 201 जिलों में की गई थी, ताकि यह सुनिश्चित हो कि दो वर्ष से कम उम्र के सभी शिशु और गर्भवती महिलाएं सात जानलेवा बीमारियों के खिलाफ पूरी तरह से प्रतिरक्षित हैं। जुलाई, 2017 तक मिशन इंद्रधनुष के चार चरणों के दौरान यह अभियान देश के 528 जिलों में 2.55 करोड़ बच्चों और करीब 68.7 लाख गर्भवती महिलाओं तक पहुंच गया।
अक्तूबर, 2017 में इसे 173 जिलों और 17 नगरों में तीव्र मिशन इंद्रधनुष (इंटेंसिफाइड मिशन इंद्रधनुष-आईएमआई) के रूप में अंतिम चरण के बच्चों और महिलाओं तक आगे बढ़ाया गया। आईएमआई के अब तक के पहले तीन चरणों में स्वास्थ्यकर्मी 45.28 लाख बच्चों तक पहुंचे और उनमें से 11.1 लाख बच्चों को पूरी तरह से प्रतिरक्षित किया। इसके अलावा, उन्होंने 9.23 लाख गर्भवती महिलाओं को भी टीका लगाया।

सरकार का लक्ष्य दिसंबर,  2018 तक 90  फीसदी तक पूर्ण प्रतिरक्षा कवरेज का लक्ष्य हासिल करना है, लेकिन इसके लिए कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है-जैसे, टीकाकरण की आवश्यकता और महत्ता के प्रति समझ का अभाव तथा टीकाकरण सेवाओं की उपलब्धता और पहुंच के बारे में जागरूकता का अभाव। बचपन की बीमारी और मृत्यु के बोझ को कम करने में टीकाकरण की ऐतिहासिक सफलता के बावजूद इसके प्रति समाज में कुछ चिंताएं एवं अफवाह फैली हुई हैं। ये अफवाहें तेजी से फैलती हैं और टीकाकरण के प्रति लोगों के भरोसे को खत्म करती हैं। इसका बड़ा ही नाटकीय प्रभाव पड़ता है और लोग टीकाकरण से इन्कार कर देते हैं या उसे खारिज कर देते हैं, नतीजतन रोग के फैलने का भारी भय पैदा होता है। 90  फीसदी पूर्ण प्रतिरक्षण कवरेज को हासिल करने की दिशा में सबसे बड़ी बाधा टीकाओं और टीकाकरण के प्रति विश्वास और भरोसे की कमी है, जिसके चलते लोग टीकाकरण कार्यक्रम के प्रति अविश्वास जताते हैं।  टीकाकरण से मना करना या कम लोगों द्वारा टीकाकरण अपनाना कोई नई बात नहीं है। यह प्रवृत्ति कई दशकों से जारी है। इसके तीन प्रमुख कारण हैं-पहला, क्षेत्र तक टीकों की पहुंच बहुत मुश्किल होना। दूसरा, टीकाकरण के अवांछनीय प्रभावों का भय। और तीसरा, लोगों में इस जागरूकता का अभाव कि टीका रोगों की रोकथाम में मददगार है और किस तरह टीकाकरण के जरिये घातक बीमारियों का मुकाबला किया जा सकता है। इसके अलावा और भी कई अज्ञात कारक हैं, जो बच्चों को टीकाकरण से रोकते हैं और जो विभिन्न अफवाहों और मिथकों के जरिये फैल गए हैं।

वर्तमान प्रतिरक्षण अवधि में टीकाकरण प्रतिरोध का मुकाबला करने के लिए एक व्यवस्थित सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण की जरूरत है। टीकाकरण के प्रति माता-पिता के व्यवहार को प्रेरित करने वाला एक महत्वपूर्ण घटक है स्वास्थ्य पेशेवरों के साथ बच्चों के माता-पिताओं की बातचीत। एक प्रभावी बातचीत टीका समर्थक माता-पिता की चिंताओं को दूर कर सकती है और एक संकोची माता-पिता को टीकाकरण को अपनाने के लिए प्रेरित कर सकती है। ज्यादातर मामलों में परिवार के लोग बाल चिकित्सा विशेषज्ञों के संपर्क में सीधे नहीं आते हैं, बल्कि वे अग्रणी स्वास्थ्यकर्मियों के साथ बातचीत करते हैं। इसलिए उन स्वास्थ्यकर्मियों में क्षमता निर्माण, टीकों और टीकों से रोके जाने वाली बीमारियों के बारे में उनके ज्ञान को बढ़ाया जाना तथा अभिभावकों के साथ उनकी बातचीत को मजबूत बनाना महत्वपूर्ण है। यह ग्रामीण और शहरी स्तरों पर संचार के व्यापक सामाजिक और व्यावहारिक परिवर्तन के जरिये किया जा सकता है।

टीकों के प्रति भरोसा निर्माण का एक दूसरा उपाय यह है कि टीकों और टीकाकरण के बारे में पर्याप्त जानकारियां मीडिया को दी जाएं। सेवा प्रदाता पक्ष की ओर से संवाद की कमी लोगों के बीच टीकाकरण के प्रति अफवाह का कारण हो सकती है। खासकर मीडिया के लिए संचार सामग्री की एक शृंखला विकसित की जानी चाहिए और उसे नियमित अंतराल पर साझा करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर टीकाकरण के विशेषज्ञों को टीका के बारे में जानकारी देने के लिए उपलब्ध होना चाहिए। अभी चल रहे रुबेला खसरा अभियान के दौरान मात्र कुछेक राज्यों ने ही टीके और उसके लाभों के बारे में सकारात्मक सूचनाएं प्रसारित कीं। तथ्यों पर ध्यान केंद्रित करते हुए मीडिया को संतुलित तरीके से संकट के बारे में बताना चाहिए। टीकाकरण व्यवस्था में भरोसा पैदा करने के लिए बाल रोग विशेषज्ञ भी अहम भूमिका निभा सकते हैं, और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि टीकाकरण की सेवा उचित, समझ योग्य और स्वीकृत है। वे टीके की महत्ता के बारे में लोगों को सबसे अच्छे से बता सकते है। वे टीकाकरण को लेकर समाज में फैली अफवाहों का निराकरण कर सकते हैं। उन्हें सरकार या आधिकारिक कार्यक्रम की तुलना में ज्यादा निष्पक्ष रूप में देखा जाता है। उन्हें टीकों के प्रति भरोसे का एक मानक संदेश प्रसारित करने के लिए संचार के नजरिये से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए और टीकों के प्रति संकोच को दूर करने की रणनीति को पहचानना चाहिए।

मौजूदा डिजिटल मीडिया के युग में सोशल मीडिया की ताकत को कमतर नहीं आंकना चाहिए। दुर्गम इलाकों तक पहुंचने के लिए सशक्त सोशल मीडिया पहल/गतिविधियों को अपनाना चाहिए। सोशल मीडिया निकट भविष्य में टीकाकरण कार्यक्रम को जनांदोलन बनाने में मददगार साबित हो सकता है।

-लेखक पोलियो पर भारत विशेषज्ञ सलाहकार समूह और वैक्सीन के लिए अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सलाहकार बोर्ड के सदस्य हैं।

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