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केवल सरकारी परियोजनाओं के भरोसे स्वच्छ नहीं होगी, बनाना होगा चुनावी मुद्दा

Wed, 10 Apr 2019 11:46 AM IST
Raman Singh रोहित कौशिक
रोहित कौशिक Published by: Raman Singh Updated Wed, 10 Apr 2019 11:46 AM IST
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Why Ganga Cleanliness is not an election issue
स्वच्छ गंगा मिशन - फोटो : NMCG

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में गंगा को जगह दी थी। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बनारस में अपने चुनाव प्रचार के दौरान गंगा की साफ-सफाई को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की थीं, मगर गंगा को प्रदूषण से मुक्ति नहीं मिल सकी। अलबत्ता प्रयाग में कुंभ के दौरान गंगा में मिलने वाली गंदगी को रोकने में कुछ सफलता जरूर मिली थी।


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पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में गंगा को जगह दी थी। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बनारस में अपने चुनाव प्रचार के दौरान गंगा की साफ-सफाई को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की थीं, मगर गंगा को प्रदूषण से मुक्ति नहीं मिल सकी। अलबत्ता प्रयाग में कुंभ के दौरान गंगा में मिलने वाली गंदगी को रोकने में कुछ सफलता जरूर मिली थी।

समय-समय पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी इस संबंध में कुछ प्रयास करता दिखाई देता है, लेकिन कटु सत्य यह है कि करोड़ों रुपये खर्च करने और अनेक परियोजनाएं बनाने के बावजूद गंगा को प्रदूषण से मुक्ति दिलाने में अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी है। यह सही है कि गंगा के साथ भारतीय समाज की आस्था जुड़ी हुई है, लेकिन हमें ध्यान रखना होगा कि अंध आस्था अनेक नई समस्याओं को जन्म देती है। अगर गंगा के प्रति भारतीय समाज की आस्था सच्ची होती, तो न गंगा प्रदूषित हुई होती और न ही हमें गंगा की स्वच्छता के लिए सरकारी नीतियों के भरोसे रहना पड़ता।

गौरतलब है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण के जवाब तलब करने पर राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) ने जानकारी दी है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल सरकारों ने समुचित जानकारियां उपलब्ध नहीं कराई हैं, जिसके कारण कानपुर से बक्सर और बक्सर से गंगा सागर तक की रूपरेखा तैयार करने में समस्याएं आ रही हैं। हरित अधिकरण ने उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड सरकार से कहा है कि वे प्रमुख स्थलों पर गंगा जल की गुणवत्ता की जानकारी हर महीने सार्वजनिक करें।

हरित अधिकरण ने सख्त निर्देश देते हुए कहा है कि अगर तीस अप्रैल तक गंगा कार्ययोजना की रूपरेखा पेश नहीं की गई, तो वह सख्त कदम उठाएगा। केंद्र सरकार ने गंगा को साफ करने के लिए ‘नमामि गंगे' परियोजना शुरू की थी, लेकिन इस योजना के अंतर्गत भी कम चुनौतियां नहीं हैं। गंगा के प्रदूषण को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट भी अनेक बार दिशा-निर्देश जारी कर चुके हैं, लेकिन इस मामले में अभी तक नतीजा ढाक के तीन पात ही है।

सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरमेंट (सीएसई) के विशेषज्ञों ने कुछ समय पहले कहा था कि गंगा की सफाई का अभियान इसी तरह चलता रहा तो आने वाले 30 वर्षों में भी गंगा साफ नहीं हो पाएगी। गौरतलब है कि गंगा के किनारे अनेक शहर, कस्बे और हजारों गांव स्थित हैं। प्रतिदिन इस आबादी का लगभग 1.3 अरब लीटर अपशिष्ट गंगा में गिरता है। गंगा के आस-पास स्थित सैकड़ों फैक्ट्रियां भी गंगा को प्रदूषित कर रही हैं। पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या विस्फोट के कारण गंगा किनारे की आबादी तेजी से बढ़ी है।

यह विडंबना ही है कि गंगा किनारे बसी इस आबादी ने भी गंगा को साफ-सुथरा रखने की कोई सुध नहीं ली, बल्कि इसे प्रदूषित ही किया। इस प्रदूषण के कारण ही आज हैजा, पीलिया, पेचिश और टाइफायड जैसी जल-जनित बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। एक ओर गंगा का प्रदूषण किसी न किसी रूप में बढ़ता जा रहा है, तो दूसरी ओर गंगा का उद्गम स्थल भी प्रदूषण की चपेट में है। वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के ग्लेशियर अध्ययन केंद्र के वैज्ञानिकों के अनुसार, गंगोत्री ग्लेशियर के माइक्रो क्लाइमेट में तेजी से परिवर्तन हो रहा है।

इसकी सतह पर कार्बन और कचरे की काली पर्त जमा हो गई है। वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड के अनुसार, गंगा विश्व की उन दस नदियों में से एक है, जिन पर एक बड़ा खतरा मंडरा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या गंगा को सिर्फ चुनावी वैतरणी पार करने का जरिया बना दिया गया है? गंगा इस चुनाव में मुद्दा बने या न बने, लेकिन हमें यह समझना होगा कि केवल सरकारी परियोजनाओं के भरोसे ही गंगा को स्वच्छ नहीं बनाया जा सकता है।
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