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जमीन से क्यों नहीं जुड़ता तंत्र

रश्मि शर्मा Updated Tue, 29 May 2018 06:39 PM IST
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मई, 2014 के आम चुनावों के बाद ऐसा लगा कि एक नया महत्वाकांक्षी भारत उभर रहा हैः साफ-सुथरे शहरों और गांवों के साथ एक ऐसा मैन्यूफैक्चरिंग हब होगा, जहां किसानों की आय दोगुना होगी और हर किसी के पास अपना घर और बैंक खाता होगा। इस दृष्टिकोण के साथ हालांकि यह कभी स्पष्ट नहीं किया गया कि इन विचारों को ठोस जमीन पर उतारने के लिए प्रभावी सरकारी तंत्र की भी जरूर होगी।
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किसानों के आंदोलन और बिना उपयोग किए शौचालयों की शक्ल में जब नीतिगत लड़खड़ाहट दिख रही है, यही ठीक समय है जब 'अमल की नाकामियों' को परखा जाए, जोकि भारतीय सार्वजनिक जीवन की एक सच्चाई बन चुकी है। आखिर नीतियों को जमीन पर उतारना इतना कठिन क्यों होता है? इसका जवाब नीतियों पर अमल के लिए जिम्मेदार संस्थानों की खामियों में निहित है, जिन्हें फील्ड एडमिनिस्ट्रेशन (क्षेत्र प्रशासन) के रूप में जाना जाता है। 


क्षेत्र प्रशासन की सर्वोच्च इकाई जिला होता है, जिसकी औसत आबादी 19 लाख है और उसके भीतर औसतन नौ सौ गांव आते हैं। जिले का प्रशासन तीन धाराओं के जरिये होता है। पहली धारा है, राज्य के सरकार के विभिन्न विभागों के कार्यक्रमों पर अमल के लिए विभिन्न स्तरों पर उनके अपने कार्यालय हैं।

दूसरी, जिला कलेक्टर या जिलाधीश, जोकि संपूर्ण प्रशासनिक प्राधिकारी और समन्वयक होता है। कलेक्टर की नियुक्ति राज्य सरकार करती है, लेकिन लोगों से और जमीनी स्तर के अधिकारियों से उसका करीबी संपर्क होता है, नतीजतन उसे शीर्ष से लेकर निचले स्तर तक पड़ने वाले दबावों पर कदम उठाता है। तीसरी धारा है, लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित स्थानीय सरकारें, जिनसे अपेक्षित है कि वे स्थानीय हितों के मुताबिक काम करेंगी। 

प्रशासन की इन तीन धाराओं की सापेक्ष शक्तियों के माध्यम से बनाई गई प्रशासन की संरचना विखंडन, केंद्रीकरण और स्थानीय जरूरतों के प्रति बेरुखी को बढ़ावा देती है। जिला कार्यालयों को राज्य विभागों द्वारा नियंत्रित किया जाता है, जो कार्यक्रमों को निर्धारित करते हैं, कर्मियों के बारे में अधिकतर निर्णय लेते हैं, विस्तृत निर्देश जारी करते हैं और फील्ड कार्यालयों का निरीक्षण करते हैं। इससे केंद्रीकरण को बढ़ावा मिलता है। इसके अलावा जिले में औसतन तीस से अधिक सरकारी विभाग होते हैं। चूंकि प्रत्येक जिला कार्यालय अपने संबंधित विभाग के निर्देशों का पालन करता है, फील्ड एडमिनिस्ट्रेशन में समन्वय का अभाव बढ़ने लगता है। 

जिला कलेक्टर के पास समन्वय की कुछ हद तक क्षमता होती है। लेकिन जिला विभागीय कार्यालयों पर उसका प्राधिकार राज्य विभागों की तुलना में कम होता है। कलेक्टर के पास यों तो प्राकृतिक आपदा, कानून व्यवस्था की समस्या या घनघोर अन्याय की स्थिति के समय कार्रवाई करने का समुचित अधिकार तो होता है, लेकिन सामाजिक-आर्थिक विकास से संबंधित कार्यक्रमों के संबंध में बहुत सीमित अधिकार होता है। विभिन्न विभागों के संदर्भ में कलेक्टर के अधिकारों में भी अंतर होता है।

राजस्व और पुलिस जैसे नियामक विभागों के संबंध में उसके पास समुचित अधिकार होते हैं, लेकिन सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए जिम्मेदार विभागों में उसके अधिकार सीमित होते हैं, जबकि सड़क निर्माण या जलापूर्ति के लिए जिम्मेदार तकनीकी विभागों के संबंध में उसके पास तकरीबन कुछ भी अधिकार नहीं होता। नतीजतन, जिला स्तर पर, संकट के समय तो त्वरित कार्रवाई संभव दिखती है, लेकिन सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए समन्वित कार्रवाई बहुत मुश्किल होती है। जिले से निचले स्तर पर समन्वित कार्रवाई तो और भी कठिन होती है। 

स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधि अमूमन जमीनी स्तर की आवश्यकताओं और समस्याओं से अवगत होते हैं और उन्हें सुलझाने के लिए प्रेरित होते हैं। लेकिन स्थानीय जरूरतों को पूरा करने में स्थानीय सरकारें (निकाय) असमर्थ होती हैं। कानून के मुताबिक स्थानीय सरकारें सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए जिम्मेदार होती हैं।

पर तथ्य यह है कि उनके पास वास्तविक अधिकार बहुत सीमित होते हैं और राज्य सरकारें उनके अधिकार परिवर्तित करती रहती हैं। नतीजतन स्थानीय सरकारों की भूमिका अस्पष्ट होती है और ऐसे में राजनीतिक प्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच टकराव होता है। दूसरे स्तर की समस्याएं सरकार की मानव संसाधन प्रबंधन नीतियों से उपजती हैं। नौकरशाही का ढांचा कुछ इस तरह का है कि उसमें कम से कम कुशल और निम्नतम वेतन वाले कर्मचारियों पर सरकारी कार्यक्रमों को लागू करने का दारोमदार होता है।

जबकि जमीनी स्तर पर बेहतर नतीजे हासिल करने के लिए अक्सर उच्च कौशल की जरूरत होती है। उदाहरण के लिए, कुपोषण कम करने के लिए अत्यंत गरीब परिवारों को समझाना और सक्षम बनाना दोनों शामिल है, ताकि वे अपने बच्चों को अधिक समय दे सकें और उन पर अधिक खर्च कर सकें।

इसकी सफलता तब मुश्किल है, जब इस काम की जिम्मेदारी ऐसे व्यक्ति को दी जाए जो न तो सक्षम हो और न ही उसमें इसकी कोई समझ ठीक से हो। वास्तव में 1990 के मध्य के बाद से कई राज्य सरकारों ने अमल के स्तर पर कम पारिश्रमिक पर अनुबंधित कर्मचारियों को रखना शुरू कर दिया है, जिससे नीतियों में अमल की क्षमता में और गिरावट आई है। 

तीसरी तरह की समस्याएं काम करने के तरीके से जुड़ी हैं। कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी कार्यक्रमों पर अमल के हिसाब से तय करते हैं, न कि कुपोषण में कमी के लक्ष्य के आधार पर। मसलन, कुपोषण को कम करने के लिए अधिकारी क्षेत्र की विशेष की जरूरतों के अनुसार नहीं, बल्कि पूरे राज्य के लिए जारी किए गए दिशा-निर्देशों के आधार पर काम करते हैं। हाल के समय में सूचना का अधिकार,  सोशल आॅडिट जैसे कई कदम उठाए गए हैं, पर ढांचागत बाधाओं के कारण प्रशासनिक क्षमता में बदलाव नजर नहीं आता।

सेवानिवृत्त आईएएस और सीएएसआई की विजिटिंग फेलो 

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