ज्यादा कर क्यों न दें अमीर
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अमेरिका में राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा अमीरों पर अधिक कर लगाने के प्रस्ताव के बाद वहां एक बहस शुरू हुई है। ओबामा कांग्रेस को समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि इससे 1.6 खरब डॉलर का अतिरिक्त राजस्व मिलने से सरकार के बढ़ते घाटे को थामने में मदद मिलेगी। पिछले लगभग चार वर्षों से अमेरिका और यूरोपीय देश भीषण आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। इससे पहले 1930 की मंदी के दौर में न केवल उत्पादन भयंकर रूप से प्रभावित हुआ था, भारी बेरोजगारी और आमदनी घटने के फलस्वरूप लोग भयंकर गरीबी का शिकार हुए। उस भयंकर मंदी से अमेरिका और यूरोप के देशों ने पार पा लिया था। तब अर्थशास्त्री जेम्स स्टूअर्ड केन्स ने एक सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि सरकारी खर्च बढ़ाकर मंदी का समाधान किया जा सकता है। उस राह पर चलकर अमेरिका सचमुच बहुत आगे बढ़ा।
लेकिन चार साल पहले जो मंदी शुरू हुई, वह 1930 की मंदी से अलग है। इस बार भी हालांकि वस्तुओं और सेवाओं की कुल मांग कमजोर हुई। लेकिन इसकी वजह यह थी कि अमेरिका में मंदी के पहले के वर्षों में आर्थिक संवृद्धि के लाभ कुछ अमीरों तक सीमित रहे। मध्यवर्ग पिछड़ गया। यूरोप में भी आर्थिक असमानता बढ़ी, लेकिन वह असमानता केवल वैयक्तिक आय में नहीं, देशों की आयों में भी दिखाई दी है। मसलन, जर्मनी ने यूरोप के शेष देशों की तुलना में ज्यादा तेजी से आर्थिक संवृद्धि की।
इस आर्थिक असमानता का पहला कारण ऐसी कर नीति थी, जो अमीरों के पक्ष में थी। कर की दरों में इस तरह बदलाव किए गए कि अमीरों को पहले से कम कर देना पड़ता था। नतीजतन बड़े व्यवसायियों एवं अमीर लोगों के पास पहले से ज्यादा आय और संपत्ति होने लगी। असमानताओं का दूसरा कारण गरीबों और मध्यवर्ग को मिलने वाली सरकारी सहायताओं में कमी था। यही नहीं, मध्यवर्ग, जो किसी न किसी प्रकार नौकरियों में लगा था, उनके श्रम एवं कर्मचारी संगठन भी पहले से कमजोर कर दिए गए, नतीजतन पूंजीपतियों के साथ सौदेबाजी की उनकी क्षमता भी घट गई। इसी तरह, तकनीकों और कंप्यूटरीकरण के विकास ने रोजगार के जो नए अवसर जुटाए, उनमें से ज्यादातर अत्यंत कुशल एवं उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों के लिए ही थे। नई प्रौद्योगिकी और कंपनियों के अधिकतम लाभ कमाने के रवैये ने असमानताओं को और अधिक बढ़ाया।
इस प्रकार से मध्यवर्ग को जरूरतें पूरी करने के लिए ऋण का सहारा लेना पड़ा। छोटी से छोटी उपभोक्ता वस्तुओं से लेकर मकानों तक के लिए वह कर्ज पर आश्रित हुआ। मकानों की बढ़ती कीमतों से उसे ऐसा लगा कि यह उसकी संपत्ति बढ़ाने वाला है, जिसके कारण उसने और अधिक उधार उठाना शुरू किया। अब जब मकानों की कीमतें धराशायी हो चुकी हैं, और कर्ज में डूबे लोगों को और कर्ज नहीं मिल सकता, मध्यवर्ग की आमदनी पहले से और घटी है।
अमीर लोगों की परिसंपत्तियां और आमदनी मांग बढ़ाने के काम नहीं आ सकती। मांग तो आम आदमी की आमदनी बढ़ने से ही बढ़ सकती है। लेकिन सरकारों का अमीरों के प्रति सहयोग का रवैया आम आदमी की आमदनी बढ़ने के रास्ते में बाधक है। ऐसे अमेरिका-यूरोप के देश मंदी से उबरने के लिए क्या करें? सामान्य तौर पर आमदनी बढ़ाने का एक तरीका यह सुझाया जाता है कि गरीबों को ज्यादा ऋण उपलब्ध कराया जाए। लेकिन पहले से कर्ज में डूबे अमरीकियों को और कर्ज देना न तो उचित है, न संभव।
इसलिए अमेरिका को मंदी से उबरने हेतु उत्पादन और रोजगार बढ़ाने के नए उपाय खोजने होंगे। उसे समझना होगा कि मंदी का कारण मांग में कमी तो है, लेकिन मांग में वृद्धि परंपरागत रूप से सरकारी खर्च बढ़ाकर नहीं की जा सकेगी। मंदी के मूल कारण यानी असमानताओं के कारणों को समझते हुए उन्हें दूर करने के उपाय करने होंगे। इस लिहाज से अमीरों पर कर बढ़ाने का ओबामा का प्रस्ताव सही लगता है। अमीरों पर अधिक कर लगाकर गरीबों और मध्यवर्ग की मदद करने के अलावा अमेरिका को आम आदमी की आय बढ़ाने के तमाम प्रयास करने होंगे। तभी मंदी का दीर्घकालीन समाधान संभव होगा।